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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव: ‘गंगा से गधे’ तक

गोरखपुर (राकेश मिश्रा): हिंदी साहित्य के छात्रों को अपवादस्वरूप मान ले तो वर्तमान पीढी शायद ही महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन और उनकी रचना ‘वोल्गा से गंगा’ से परिचित होगी। 1943 में रचित राहुल की यह महान रचना 20 कहानियों का संकलन है। राहुल एक घुमक्कड़ साहित्यकार थे और उन्होंने यह रचना रूस, जापान, चीन सहित कई देशों की यात्रा करने के बाद की थी।

हालांकि राहुल सांकृत्यायन की तुलना किसी भी रूप में वर्तमान राजनीतिज्ञों से करना उस महान साहित्यकार की महानता को काम करना है और ऐसा हम कर भी नहीं रहें हैं है। हाँ एक बात तो है की चुनाव के इस मौसम में राजनीतिज्ञ घूम तो रहें ही हैं और यदि उनके द्वारा कहे गए बातों की एक पोथी तैयार की जाए तो आने वाली पीढी को यह एहसास तो हो ही जायेगा की कैसे हम वास्तविक मुद्दों से भटक कर गंगा से होते हुए गधे तक पंहुच गए।

खैर राहुल की इस रचना का वर्तमान में उत्तर प्रदेश में चल रहे विधान सभा चुनाव से कोई लेना देना नहीं है सिवाय गंगा शब्द के। गंगा शब्द और उससे जुडी भावनाओं का किस तरह से सदुपयोग और दुरुपयोग हो रहा है यह बात भी किसी से छुपी नहीं है। एक पक्ष और पार्टी गंगा जहाँ गंगा की सफाई के नाम पर वोटों की मांग कर रही है तो वहीँ दसूरी पार्टी उसी गंगा के नाम पर कसम खा कर सच बोलने की बात कर रही है। माँ गंगा के बुलावे पर 2014 में काशी पंहुचे नरेंद्र मोदी अब अपने आप को प्रदेश का दत्तक पुत्र बता रहें हैं तो वहीँ उनके विरोधियों ने कहा की यहाँ प्रदेश के जैविक पुत्रों की कमी ही नहीं है तो दत्तक पुत्र की क्या जरुरत।

हलाकि दत्तक पुत्र तो गुजरात से हैं लेकिन कई जो जैविक पुत्र होने का दावा कर रहें हैं वो कहा से हैं यही क्लियर नहीं है और जो हैं भी उन बेचारों का कितना समय प्रदेश में बीतता होगा और अपनी माँ के कष्ट या यूँ कहें कष्टों के प्रति कितने जागरूक हैं ये कहा नहीं जा सकता लकें प्रदेश के हालात सब कुछ खुद बा खुद बयान कर रहें हैं।

खैर लगता है की हम मुख्य मुद्दे से भटक गए। मामला तो गंगा का था और गंगा से कब गधे तक पंहुच गए उसकी बात करनी थी। सूबे के मुखिया अखिलेश यादव (भैया) जिनका काम आज कल सोशल मीडिया पर बहुत बोल रहा है (ये बात दीगर है की जब जमीन पर उस काम को खोजने की कोशिश की जा रही है तो कुछ दिखता नहीं है) को कुछ और नहीं मिला तो गधे को ही चुनाव मैदान में उतार दिए। ये बात और है की जिन गधों (माफ़ कीजियेगा गुजराती गधों) को उन्होंने चुनावी मैदान में अपने भाषण के माध्यम से उतारा है उन गधों को सदी के महानायक ने आम गधा नहीं बल्कि स्पेशल गधा करार दिया है।

अब जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे के मुखिया ने गधों को चुनावी मैदान में उतार दिया तो हमारे न्यूज़ चैनल कैसे पीछे रह सकतें हैं। अपनी सुविधानुसार कुछ ने उन गधों पर स्पेशल स्टोरी करते हुए उन्हें स्पेशल गधा करार दिया तो वहीं कुछ ने उनकी गधों को उनकी औकात दिखाते हुए गधा ही करार दिया। गनीमत ये है की चुनावी मौसम है और मेनका गाँधी केंद्र में मंत्री है वरना अब तक कुछ लोगों के खिलाफ गधों के नाम का दुरुपयोग करने या गधों को गधा बताने के चक्कर में कई मुकदमे तो हो ही गए होते।

वैसे अगर हम ये सोचें की क्यों अखिलेश भैया गधों तक पंहुच गए तो उसका कोई वास्तविक कारण नजर नहीं आता। बस एक बात क्लियर होती है की उन्होंने अपने विरोधियों को ये सन्देश दिया है अगर तुम नीम चढ़ी बातें करोगे तो मैं उस पर करेला मलूंगा। मतलब की कौन कितना नीचे गिर सकता है इस बात की प्रतियोगिता है।

गोरखपुर की खजनी विधान सभा सीट पर अपने प्रत्याशी का समर्थन कर रहें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अब कांग्रेस, सपा और बसपा को एक नया नाम कसाब दे दिया। चुनावी लड़ाई में नीचे गिरने की कोशिश में अमित शाह यह भूल गए की कसाब नाम की बिरियानी का इस्तेमाल कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने अपने ढंग से भरपूर कर लिया है और जनता शायद ऐसे जुमलों को अब ज्यादा तरजीह न दे।

खैर बात अगर जुमलों पर आ गयी है तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख न हो ये भला कैसे हो सकता है। चुनावी लड़ाई में कब्रिस्तान, शमशान और ईद पर बिजली और दिवाली पर अँधेरा जैसी बातें कर उन्होंने पूरी कोशिश की है की भाजपा को हिंदुओं का मत एकमुश्त मिले। क्यों की मुस्लिमों ने तो भाजपा को हराने की ठान ही ली है है। ये बात अलग है इस चुनाव में उनके सामने भी दुविधा की स्थिति पैदा हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट भले चीखता रहे की धर्म के नाम पर वोट माँगना ठीक नहीं है लेकिन उत्तर प्रदेश में लड़ाई तो धर्म के नाम पर ही हो रही है। उसी धर्म के नाम पर मुलायम सिंह बार-बार ये कहते फिर रहें हैं की बाबरी मस्जिद बचाने के लिए उन्होंने हिन्दूओं पर गोली चलाई थी। और अब हिंदुओं का क्या इतनी जनसँख्या है की 500-1000 मर ही गए तो क्या उखड जाएगा।

खैर हम लगता है की फिर भटक गए। बात गधे से शुरू हुई थी और आ गयी थी धर्म पर। ये ठीक नहीं है। गधे की बात गधे पर ही ख़त्म होनी चाहिए। अखिलेश भैया गुजरात के गधों की बात तो कर रहे हैं लेकिन अपने यहाँ के दो पैर वाले गधों की बात भूल जातें हैं। ये वही गधे हैं जो भाभी (डिंपल यादव) के लाख कहने के बाद भी चुप नहीं हुए और उन्होंने दिखा दी की क्यों अखिलेश भैया के हज़ार दावों के बाद भी गुंडागर्दी और समाजवादी पार्टी एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। भाभी ने तो यहाँ तक कहा की भैया से शिकायत करुँगी लेकिन वो नहीं माने और अपनी औकात दिखाते रहे। अब ऐसे में पता नहीं क्यों किसी नेता का ध्यान अपने यहाँ छोड़ कर किसी अन्य प्रदेश के गधों पर चला जाता है।

जो भी गधा संबंधी इस लड़ाई में अंतिम बाज़ी पीएम मोदी के हाथ जाती दिख रही है। जिस तरह से उन्होंने अपने को सब से बड़ा सेवक बताते हुए लोगों के लिए गधे की तरह काम करने की बात की है ऐसे में लगता है की अखिलेश भैया अब गधे वाली बात कह कर निराश ही होंगे।

खैर इन सब बातों में गधों का तो फ़ायदा हो गया। कहाँ उन्हें आलसी जानवर मान कर हमेशा तिरष्कृत किया गया और कहा इस समय देश के सबसे बड़े सूबे के चुनाव में वो इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। वैसे जो भी हुआ अच्छा ही हुआ क्यों की आमतौर पर चुनावी चर्चा और वोट बटोरने का अब तक सब से बड़ा माध्यम गाय माता ही हुआ करती थीं। अब उस चर्चा में गधों को लाने के लिए अखिलेश भैया को एक लेखक (या कुछ लोग गधा भी कह सकतें हैं) का धन्यवाद।

(ये एक व्यंग है और अगर लेख से किसी भी इंसान या जानवर की भावना को ठेस पंहुचती है तो क्षमा )

GFR Desk



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