किसके सिर पर होगा जनसंघियों के गढ़ बांसी में विजय का सेहरा

बस्ती (हरिकेश सिंह): कहा जाता है कि राजनीति भंवरजाल का समुद्र है। इसमें कब किसकी किश्ती डूब जाये और कौन उछल कर बाहर आ जाये, कोई ठीक नही है। बात हो रही है बीजेपी के सुरक्षित ठिकानों की तो गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र के बाद बस्ती मंडल के सिद्धार्थनगर जनपद का बांसी विधानसभा क्षेत्र भी आजादी के बाद से ही भाजपा (जनसंघ) का गढ़ माना जाता रहा है ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई के जनपद सिद्धार्थनगर की इस बहुचर्चित सीट बांसी में जनसंघी गढ़ के रचनाकार का श्रेय माधव बाबू को जाता है। आजादी के बाद से उनके इस मजबूत किले को कांग्रेस केवल चार बार ही भेद पाई है। जिसमें दो चुनाव सन 52 और 57 के थे, जब कांग्रेस को हराने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, और बाद के 13 चुनावों में सिर्फ दो बार ही कांग्रेस ने इस क्षेत्र में पंजे की ताकत दिखाई है।

बात करें इस विधानसभा क्षेत्र की तो 1962 के चुनाव में जब चारो तरफ कांग्रेस का जोर था तो इस सीट पर जनसंघ ने एलएलबी करके राजनीति का ककहरा सीख रहे माधव प्रसाद त्रिपाठी को युवा नेता के तौर पर कांग्रेस के पूर्व विधायक गाँधीवादी नेता प्रभुदयाल विद्याथी के मुकाबले खड़ा कियां। गाँधीवादी प्रभुदयाल को इस चुनाव में माधव ने कड़ी टक्कर देकर विजय अपने खाते में कर ली।

इसके बाद हुए 1967 के विधान सभा के चौथे आम चुनाव में प्रभुदयाल विद्यार्थी ने 26834 बोट पाकर माधव बाबू को हराते हुए अपनी हार का बदला ले लिया । इसके बाद क्षेत्रीय जनता ने 69 और 74 के चुनावों में माधव बाबू को लगातार अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए जिताया। इसके बाद 1977 के चुनावों में वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए सांसद बने।

माधव बाबु के राष्ट्रीय फलक पर जाने के बाद उनकी रिक्त जगह पर 1977 में भाजपा कोटे के हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव उर्फ हरीश जी ने चुनाव जीता। बाद के 1980 के चुनावों में हरीश को हराते हुए कांग्रेस के दीनानाथ पांडेय ने 33189 वोट पाकर जीत हासिल की, लेकिन 85 के चुनाव में हरीश जी ने कांग्रेस विधायक दीनानाथ पांडेय को हरा कर हिसाब बराबर कर लिया।

इसके बाद से ही 1989 से बांसी की राजनीति में राजा जयप्रताप सिंह का उदय हुआ। बासी राजघराने के सदस्य ने निर्दल उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और 55610 वोट पाकर रिकार्ड वोटों से उन्होंने जीत हासिल किया। 1991 की विजय के बाद उन्होने भारतीय जनता पार्टी के झंडे पर सवार होकर 93, 96, व 2002 में लगातार तीन चुनाव भाजपा के टिकट पर जीते।

किन्तु बांसी में लगातार चल रहे भाजपा के विजयरथ को 2007 के चुनाव में सपा के लाल जी यादव ने गतिरोध लगा दिया। नतीजा लालजी यादव ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए जय प्रताप सिंह को हरा कर बीजेपी खेमे में हड़कम्प मचा दिया। किन्तु लाल जी का विजय रथ अपनी गति पर काबू न रख सका और 2012 के चुनाव में कड़े मुकाबले में बहुत कम मतों के अंतराल से फिर से जयप्रताप सिंह ने उन्हें पटखनी दे ही दिया।

अब 2017 के चुनावों में जहाँ दोनों ही प्रत्याशी अपने अपने मूल पार्टियों के झंडे तले एक बार फिर से एक दूसरे से पंजा लड़ाने को तैयार है। जबकि लालजी की अपनी समाजवादी पार्टी प्रदेश की सत्ता की विकास कार्यो को गिनवाकर और जयप्रताप सिंह अपने दल भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की उपलब्धियों को जनता की थाली में परोसकर लोगों को आकृष्ट करने में जुटे है।

किंतु यह तो तय है कि इस बार जनता दोनों ही सत्ताधारी दलों के कामकाज का अवलोकन करके ही अपना अगला उत्तराधिकारी चुनेगी।

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