शिल्प के जादूगर भाष्कर विश्वकर्मा: जिसके फन की जमाना मिसाल देता, किसी किसी को खुदा वो कमाल देता

गोरखपुर (हरिकेश सिंह): किसी-किसी को खुदा वह कमाल देता है कि जिसके फन की जमाना मिसाल देता है।।वह शख्श काबिले तहसीन है। जमाने में जिसे उरूज खुदा लाजवाब देता है।

आफाक गाजीपुरी की यह गजल एक ऐसे शख्स पर वाजिब बैठती है।
जो खाक को नायाब बनाने का हुनर रखता है।
दस्त तो दस्त-ए-दरिया भी न छोड़े हमने।

जुमले को भी हकीकत में बदलने का माद्दा इनके रगों में कूट-कूट कर भरा है। मिट्टी से मोहब्बत एक जुनून बन चुकी है। मिट्टी पर जब इनकी उंगलियां चलती है तो मिट्टी एक कलाकृति में तब्दील हो जाती है। हर कोई देखने वाला इस हुनर लाजवाब की तारीफ किये बिना नहीं रह पाता है। मिट्टी पर इनकी फनकारी तो चलती है। लकड़ी, रेत, फाइबर,ग्लास, लोहा, मेटल, प्लास्टर आॅफ पेरिस पर भी इनके उंगलियों का जादू सिर चढ़कर बोलता है। तभी तो यह कहते है कि अंगूठा भी तराशेगे तो फनकारी न जायेगी हमारे खून से बू-ए-कलाकारी न जायेगी। मिट्टी, रेत से लगायत तमाम चीजों पर उम्दा कलाकृतियां चंद मिनटों में बना लेते है।

चित्रकारी भी करते है और अभिनय भी। जो कलाकृतियां यह बनाते है वह लोगों को जागरुक करती है एक पैगाम भी देती है। इनकी कलाकृतियों में विविधता नजर आती है। समाज को कुछ देने की चाह नजर आती है।

आइये हम आपको इस हुनर नायाब से रूबरू करवाते है। नाम है भास्कर विश्वकर्मा। मऊ जिला के ग्राम भरियां निवासी स्वर्ण जयसिंह के घर 5 जून 1989 को पैदा हुये। इस समय शहर के सहारा शहर में रह रहे है। गोविवि में रिटायर्ड प्रो. मनोज कुमार सिंह के साथ कार्य कर रहे है। मिट्टी से लगाव बचपन से ही रहा। गांवों में कोई मेला लगता तो वहां पर जाते ,कोई चीज पसंद आ जाती तो उसे मिट्टी के जरिये मूर्ति की शक्ल दे देते। धीरे-धीरे इनका जुनून बढ़ता गया। दशहरा, दीपवाली पर इनकी मूर्तियां काफी पसंद की जाने लगी। इनके हुनर को देखकर इनके हिंदी के टीचर ने इन पर दोहा लिख डाला।

मूर्तिकार ने दिया मूर्ति को भाव जगत का रंग, मां तेरी यह भक्ति अब सदा रहे भास्कर संग। ।

बाद में इन्होंने इंटर की परीक्षा गणित विषय से उत्तीर्ण की। लेकिन इन्हें बनना तो कुछ और ही था। घर वालों ने कामर्स की पढ़ाई करने पर जोर दिया।लेकिन भास्कर तो अपनी धुन के पक्के थे। इन्होंने 2007 में गोविवि में बीए पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। विषय चुना कला, हिन्दी एवं संस्कृति।फिर इन्होंने गोविवि से ललित कला में एमए की डिग्री हासिल की। शिक्षा के दौरान इन्हें तराशने वाला जोहरी मिला। ललित कला विभाग के

पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार सिंह ने इन्हें तराश कर हीरा बना दिया। फिर तो सिलसिला चल पड़ा। इन्होंने अपने गुरू के सानिध्य में वर्ष 2008 में राप्ती तट पर रेत शिल्प रचना निर्माण द्वारा गोविवि को केन्द्रीय विश्व विद्यालय दर्जा दिलाने का अनूठा प्रयास किया।

भास्कर के कला की खासियत है कि वह समाज में व्याप्त समस्या को दृष्टिगत रखते हुय कलाकृतियों का निमार्ण करते है। इनकी हर कलाकृति समाज को एक पैगाम देती है। लोगों को सोचने पर विवश करती है। इनकी चार एकल व छह ग्रुप प्रदर्शनी लगा चुकी है। दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर में इनकी प्रदर्शनियां लग चुकी है। इन प्रदर्शनियों में वो ढेरों ईनाम जीत चुके है। अभी हाल ही में यह इन्होंने मद्यपान के प्रति जागरुकता करने की ठानी है। जिसकी मूर्ति बनायी तो नाम दिया युवा मद्यप राष्ट्र भंजक। इसी तरह इन्होंने भारत का नक्शे की मूर्ति बनायी।

तमाम प्रदेशों को विभिन्न जीवों का आकार दिया।जिसमे उप्र को गैंडा का रूप दिया। राप्ती,आमी नदी प्रदूषण पर रेत शिल्प के जरिये लोगों को जागरुक किया। इनके पसंदीदा मूर्तिकार, चित्रकार है पेरिस के माइकल एंजिलों, रैफल लिनार्डो द विंसी। जो इन्हें प्रेरणा प्रदान करते है।

इन्होंने अपनी वेबसाइट भी बना रखी है। जिसे गूगल पर www.bhashkarsculptor.com पर इनकी मूर्तियों को देखा जा सकता है। भास्कर ने बताया कि फाइबर मूर्ति बनाने में फाइबर मैट, केमिकल रेजिन, कोबार्ड, एक्सीलेटर का प्रयोग किया जाता है। एक माह के समय में मूर्तियां तैयार हो जाती है। पच्चीस सौ रूपये से तीन हजार रूपये का खर्च आता है। इनके कला के कद्रदान भी बहुत है।

इस समय भास्कर गोविवि के ललित कला एवं संगीत विभाग में प्रो.मनोज कुमार सिंह के साथ कार्य कर रहे है। भास्कर कहते है कि मूर्तिया भले ही खामोश रहती है लेकिन सदा कुछ कहने की कोशिश करती है। हमेशा प्रयास रहा कि समाज से जुड़ी चीजें ही लोगों तक जायें और लोग आकर्षित हो। चित्रकारी में भी इस बात का ध्यान रखा जाता है।

प्रदर्शनी जो इन्होंने लगायी

भास्कर विश्वकर्मा ने वर्ष 2011 में मुक्ता काशी उपवन वाटिका में वाराणसी में, 2012 में अमृता कला विथिका में,2013 में यूपी स्टेट ललित कला एकेडमी लखनऊ में प्रदर्शनी लगयी। इसके अलावा 2009 में उपवन मूर्ति शिल्प प्रदर्शनी गोरखपुर, 2010 में मुक्ता काशी उपवन कला वीथिका गोरखपुर सृजन एक व दो, अखिल भारतीय प्रदर्शनी नई दिल्ली में लगायी।

पुरस्कार जो जीता
भास्कर की मूर्तियां संवाद करती है। जागरुकता के साथ संदेश देती है। कुशीनगर बुद्ध महोत्सव 2009, राज्य स्तरीय चित्रकला व रेत मूर्ति शिल्प शिविर एवं प्रतियोगिता गाजीपुर, 2010 में राज्य अन्तर्रविश्वविद्यालय युवा महोत्सव, इसी वर्ष चौरी-चौरा महोत्सव में, 2012 में ललित कला एवं सगीत विकास परिषद सहित तमाम जगहों पर इन्होंने पुरस्कार जीता व सम्मानित हुये।

कलाकार संपूर्ण नहीं होता है : भास्कर

मूर्तिकला दृश्यकला की प्राचीनतम विद्या के रूप में जानी जाती है। मनुष्य का चाक्षुष रसास्वादन तंत्र श्रव्य से अधिक तेज होता है। जिसे सामान्य संप्रेषण के साथ जोड़ सकते है। मूर्ति माध्यम मानव के लिए त्रियामी स्वरूप को प्रस्तुत करने की एक शैली है। मैं अपनी शिक्षा को एक निश्चित मार्ग प्रदान करना चाहता हूं। व्यक्ति की पहचान विषयए शैली अथवा ज्ञान को आत्मसात् कर निरन्तर प्रयोग करने से बनती है। हमारी कलात्मक संस्कृति भी इससे अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ कर ही बनती है। परन्तु अभी मैं कला के मूर्ति शिल्प शैली का केवल ग्रामर पढ़ने का प्रयास कर रहा हूं। मेरी विभिन्न मूर्तियां आकार को खोजने का प्रयास है। कलाकार कभी सम्पूर्ण नहीं होता इसलिए मेरे प्रदर्शनी में विविधता पूर्ण कला दिखती है। मैं और कुछ करूं, कुछ जानने की कोशिश करूं, यही मेरा प्रयास है।

Martia Jewels
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