फाइनल रिपोर्ट स्पेशल Archives - Page 3 of 28 - Gorakhpur Final Report

GFR DeskSeptember 24, 2017
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गोरखपुर: प्राचीन काल मे महानगर के कुसम्ही जंगल स्थित तुरा नाले पर उस रात बारात को जब एक बुढ़िया ने बारातियों से भरी बैलगाड़ी को रोक कर जब जोकर से नाच दिखाने को कहा तो जोकर ने बुढ़िया का रूप देखकर बांसुरी बजाकर नाच दिखाया। इस घटना में बुढ़िया के आशीर्वाद से जोकर तो बच गया किन्तु बारात भरी बैलगाड़ी नदी में डूब गई। बात कर रहे है गोरखपुर के बुढ़िया माता मंदिर की,जहाँ शारदीय नवरात्रि की धूम देखी जा सकती है।

महानगर से पंद्रह किमी दूर कुसम्ही जंगल में बुढ़िया माई का एक पुराना मंदिर है। यहां दोनों नवरात्र सहित आम दिनों में भी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। यहां जागता-जलपा देवी के रूप में प्रसिद्द बुढ़िया माई की शक्ति चमत्कारी है। कहा जाता है कि बुढ़िया माई को नाच न दिखाने पर एक बैलगाड़ी पर सवार नाच के जोकर को छोड़ पूरी बारात तुर्रानाले में समा गई थी।

महानगर मुख्यालय से दूर गोरखपुर-कुशीनगर नेशनल हाईवे 28 पर कुस्मही जंगल में स्थापित देवी के मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर लाठी का सहारा लेकर चलने वाली एक चमत्कारी श्वेतवस्त्र धारी वृद्ध महिला के सम्मान में बनाया गया था। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि पहले यहां थारू जाति के लोग निवास करते थे। वे जंगल में तीन पिंड बनाकर वनदेवी के रूप में पूजा करते थे। थारुओं को अक्सर इस पिंड के आसपास सफेद वेश में एक वृद्ध (बूढ़ी महिला) दिखाई दिया करती थी। कुछ ही पल में वह आंखों से ओझल भी हो जाती थी।

दन्त कथाओं के अनुसार यह महिला जिससे नाराज हो जाती थी। उसका सर्वनाश होना तो तय था और जिससे प्रसन्न हो जाए, उसकी हर मनोकामना पूरी कर देती थी। इस प्राचीन मंदिर का नाम बुढ़िया माई मंदिर है। कुसम्ही जंगल के अंदर स्थित इस मंदिर में नवरात्रि के दौरान मेला लगता है। इस दौरान दूर-दूर से भक्‍त देवी मां का दर्शन करने आते हैं। मंदिर के पुजारी राजेन्द्र सोखा, रामानंद और राम आसरे बताते हैं कि प्राचीन समय में भी इमिलिया उर्फ बिजहरा गांव में यहां तुर्रा नदी बहती है। इस पर गांव वालों ने पहले पुल बना दिया था।

मंदिर और पुल के रास्ते में एक बुढ़िया बैठा करती थी।बुढ़िया माई से जुड़ी दो प्रमुख कहानी हैं। पहली के अनुसार 600 साल पहले गोरखपुर से कुशीनगर की ओर जाने का पक्का मार्ग नहीं था। कुस्मही जंगल की पगडण्डी से होते हुए जंगल के बीच से होकर गुजरने वाले तुर्रा नाले पर बने काठ (लकड़ी) का पुल पार कर लोग आते-जाते थे। एक बार यहां से एक बैलगाड़ी पर बारात हाटा जा रही थी।पुल पर बैठी एक वृद्ध महिला (बुढ़िया माई) ने बैलगाड़ी पर सवार नाच पार्टी को डांस दिखाने के लिए कहा।

सभी ने कहा बारात को देर हो रही है और बगैर रूके बुजुर्ग महिला का उपहास करते आगे बढ़ गए। इस दौरान सिर्फ जोकर ने नाच कर बांसुरी बजाई थी।बारात जब दूसरे दिन वापस लौटी तो वृद्ध महिला ने फिर से उनसे रूककर डांस दिखाने को कहा। जोकर बैलगाड़ी से उतरकर नृत्य दिखाने लगा।सभी बाराती और नर्तक बैलगाड़ी पर सवार ही रहे और उपहास करते आगे बढे। बीच पुल में बारात की गाड़ी पहुंचते ही पुल अचानक टूट गया और दूल्हे सहित सभी बाराती तुरानाला में डूबकर मर गए।

शारदीय नवरात्र हो या चैत्र का यहां बड़ी भीड़ होती है। मंदिर जंगल परिक्षेत्र में आता है। यही कारण है कि यहां पक्की सड़क नहीं बन सकी थी किन्तु अब प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा इस मंदिर को पुरातत्व और दर्शनीय स्थलों की श्रेणी में रखकर इसका पुनरोद्धार कराया जाएगा। मान्यता है कि मंदिर में जो भी सच्चे मन से मन्नत मांगता है। उसकी मनोकामना माता बुढ़िया जरूर पूरी करती हैं।


GFR DeskSeptember 23, 2017
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गोरखपुर: एक ऐसा देवी मंदिर जहाँ से 1857 की क्रांति में मातृभूमि पर अपने प्राण न्यौछावर करने का आह्वान हुआ था। साथ ही इस मंदिर का प्रसाद भी मांस ही माना जाता है। हम बात कर रहे है गोरखपुर जनपद के चौरी चौरा तहसील क्षेत्र के तरकुलहा देवी मंदिर की।

हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए प्रमुख शक्तिपीठों में एक तरकुलहा देवी का मंदिर गोरखपुर जिला मुख्यालय से 20 किलो मीटर कि दूरी पर तथा चौरी-चौरा से 5 किलोमीटर कि दुरी पर हैं।

क्यों और कैसे हुई इस मंदिर की स्थापना

इस सम्बन्ध में लोगो की मान्यता है कि 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से पहले इस इलाके में जंगल था और पास से ही गुर्रा नदी होकर गुजरती थी। जहाँ नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्ट देवी थी।

अंग्रेजों के जुल्म की कहानियाँ सुन सुनकर जब बंधू सिंह बड़े हुए तो उनके दिल में भी अंग्रेजो के खिलाफ आग जलने लगी। बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसको मार कर उसका सर काटकर देवी मां के चरणों में समर्पित कर देते। पहले तो अंग्रेज अफसर यही समझते रहे कि उनके सिपाही जंगल में जाकर लापता हो जा रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी पता लग गया कि अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के शिकार हो रहे हैं।

अंग्रेजों ने उनकी तलाश में जंगल का कोना-कोना छान मारा लेकिन बंधू सिंह उनके हाथ न आये। अंत में कूटनीति के सहारे उन्होंने इलाके के एक स्थानीय व्यवसाई को अपना मुखबिर बना लिया और उसी की मुखबिरी के चलते बंधू सिंह निद्रावस्था में अंग्रेजों के हाथ लग गए। उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश करके फांसी की सजा सुनाई गयी । 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया।

स्थानीय किवदंतियों के अनुसार अंग्रेजों ने उन्हें 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके बाद बंधू सिंह ने स्वयं देवी माँ का ध्यान करते हुए मन्नत मांगी कि माँ उन्हें जाने दें। कहते हैं कि बंधू सिंह की प्रार्थना देवी ने सुन ली और सातवीं बार में अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने में सफल हो गए। अमर शहीद बंधू सिंह को सम्मानित करने के लिए यहाँ एक स्मारक भी बना हैं। जो अब जीर्णावस्था में है।

सम्भवतः यह देश का इकलौता मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। बंधू सिंह ने अंग्रेजो के सिर चढ़ा के जो बली कि परम्परा शुरू की थी वो आज भी यहाँ यथावत हैं। अब यहाँ पर बकरे कि बलि चढ़ाई जाती है । उसके बाद बकरे के मांस को मिट्टी के बरतनों में पका कर प्रसाद के रूप में बाटी के साथ बाटा जाता हैं । हालाकि इस पर अब काफी विवाद है और इसे बंद कराने के लिए कोर्ट में केस भी चल रहा है।

यहाँ पर मन्नत पूरी होने पर घंटी बाँधने का भी रिवाज़ हैं, यहाँ पुरे मंदिर परिसर में जगह जगह घंटिया बंधी दिख जायेगी।


GFR DeskSeptember 18, 2017
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गोरखपुर: अगर आप गोरखपुर-आनंद विहार हमसफ़र एक्सप्रेस से अक्सर ट्रेवल करते हैं तो यह खबर आप के लिए ही है। देश में चलने वाली पहली हमसफ़र एक्सप्रेस वैसे तो अपने कई कारणों से चर्चा में रहती है, जिसमे देरी से चलना प्रमुख है, लेकिन आज जो हम आपको बताने जा रहे हैं वो इन बातों से अलग है। आज हम इसके डायनामिक किराये के बारे में बताएँगे।

अगर आप इस ट्रेन से अक्सर सफर करने वाले यात्री हैं तो आमतौर पर आप एक या दो दिन पहले टिकट बुक कराते होंगे। त्योहारों के मौसम को छोड़ दिया जाये तो सामान्य दिनों में इसका किराया एक दिन पहले या ट्रेन के चलने वाले दिन के सुबह तक किराया 1800 के आस पास होता है। अंतिम समय में टिकट के मारामारी से बचने के लिए लोग किसी भी किराये पर टिकट बुक कर लेते हैं। लेकिन शायद इस बात पर कभी ध्यान नहीं देते कि ट्रेन का किराया अंतिम वक़्त में कम हो जाता है।

ऐसा ही हुआ है इस ट्रेन से अक्सर ट्रेवल करने वाले एक सोलर कंपनी के मालिक ज्ञानेश्वर मिश्रा के साथ हुआ। श्री मिश्रा ने 17 सितम्बर को गोरखपुर से आनंद विहार के बीच चलने वाली हमसफर एक्सप्रेस में रविवार की सुबह एक ऐसी 3 टियर का टिकट लिया। उन्होंने ऑनलाइन टिकट को 1845 रुपये में बुक कराया।

आगे उन्होंने बताया कि यही टिकट शुक्रवार को 1335 रुपये का था, बाद में 1775 रुपये उसकी कीमत हो गयी। और उसी टिकट की कीमत ट्रेन चलने के कुछ समय पहले तक 1335 रुपये हो गए। मतलब यह है की अगर आपको इस ट्रेन से सफर करना है तो 5 दिन पहले टिकट ले लीजिये या फिर ट्रेन चलने के कुछ घंटों पहले। यही नहीं श्री मिश्रा के अनुसार टिकट की कीमत गिरकर 1165 रुपये तक आ गयी थी।

पूर्णतया एयर कंडीशन थ्री टियर हमसफर एक्सप्रेस गोरखपुर से आनंद बिहार के बीच हफ्ते में तीन बार चलती है। इस ट्रेन के चलने से पूर्व ही रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने घोषणा की थी की देश की पहली हमसफ़र ट्रेन गोरखपुर से दिल्ली के लिए चलाई जाएगी। हमसफर ट्रेनो के चलाने की घोषणा रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने 2016-17 के रेल बजट पेश करते हुए की थी।


GFR DeskSeptember 17, 2017
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गोरखपुर: आज देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा का दिवस है। आज के दिन हर तरह के शिल्प, निर्माण, मरम्मत से जुड़े पेशे और कल कारखानों में भगवान विश्वकर्मा का पूजन बहुत ही मनोयोग से किया जाता है। आज भारत चांद छूने की हसरत दिल में संजोये भले ही विकासशील देशों की कतार में खड़ा है, लेकिन विकसित राष्ट्रों द्वारा किये जा रहे तमाम शोध हिन्दू ग्रंथों में उल्लेखित उन वैज्ञानिक यंत्रों की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं जिसकी रचना सदियों पूर्व की गयी थी।

बड़ी बात ये कि भले ही सभी पर्व,त्यौहारों के दिन हर वर्ष कैलेंडरों में अपनी तारीख बदलते रहते हों, किन्तु विश्वकर्मा दिवस हर वर्ष 17 सितम्बर को ही मनाया जाता है। वेद पुराणों में उल्लेखित विमान और अस्त्र शस्त्रों को कुछ सदी पूर्व तक कपोल कल्पना मानने वाली दुनिया आज इन्हीं शास्त्रों से प्रेरणा लेकर तमाम वैज्ञानिक शोधों को साकार रूप देने में जुटी है।

सृष्टि की रचना से लेकर युगों-युगों तक भूमंडल को एक से बढ़कर एक विलक्षण कृतियों से अविभूत करने वाले भगवान विश्वकर्मा को हिन्दू धर्मग्रंथों में शिल्पकला के आदि प्रणेता माना गया है।

‘कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले भगवान विश्वकर्मा की जयंती देश के औद्योगिक, तकनीकी तथा वैज्ञानिक विकास के रूप में मनाई जाती है। इस पर्व का उद्देश्य भगवान विश्वकर्मा द्वारा मानव जाति के लिए किए गए उपकारों का स्मरण कर उन्हे श्रद्धासुमन अर्पित करना होता है।

शिल्प और वास्तुविद्या के अधिदेवता भगवान विश्वकर्मा निर्माण और सृजन के देवता हैं। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में जितने भी प्रसिद्घ शहर, नगर और राजधानियां थीं, मुख्यतया विश्वकर्मा जी की ही बनाई हुई थीं। यह भी पूरी तरह सच है कि सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेता युग की लंका, द्वापर युग की द्वारिका तथा कलयुग के प्राचीन चर्चित शहर हस्तिनापुर को बनाने का श्रेय भी विश्वकर्मा जी को ही जाता है।

पुराणों में इसका व्यापक विवरण मिलता है। स्पष्ट है कि जब इतने बड़े-बड़े नगर और राज्यों की राजधानियां विश्वकर्मा जी ने बनाईं और अपनी उत्कृष्ट निर्माण कला का प्रदर्शन किया तो वह हमारे सबसे महत्त्वपूर्ण देवता हैं। उड़ीसा में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की निर्माण कथा तो विश्वकर्मा जी का ही गुणगान करती है। इसलिए विश्वकर्मा जी का नित्य स्मरण और पूजा करना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है, जिससे उसे धन-धान्य और सुख-समृद्वि निरंतर प्राप्त होती रहे। साथ ही विश्वकर्मा जी द्वारा निर्मित वास्तुशास्त्र के उपयोग से अपने मकान,दुकान का वास्तु करवा कर, विश्वकर्मा जी की पूजा करके आ रही परेशानियों से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए।

पौराणिक मान्यताओ के अनुसार विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के परिवार के सदस्य हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे। धर्म की वस्तु नामक स्त्री, जो दक्ष की कन्याओं में से एक थी, से वास्तु के रूप में, सातवें पुत्र के रूप में उन्होंने जन्म लिया। इन्हें शिल्पशास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ।

अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तुकला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ इनके पुत्र हैं। इन पांचों पुत्रों को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है। मनु को लोहे, मय को लकड़ी, त्वश्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और देवज्ञ को चांदी और सोने के कार्यों में महारत हासिल है। अपने भक्तों की पूजा से विश्वकर्मा जी जब संतुष्ट होते हैं तो उनकी मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण करते हैं।

एक कथा के अनुसार काशी में एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। धार्मिक कार्यों में बराबर रुचि रहने के बावजूद उनको पुत्र और धन का अभाव बराबर खलता था। बहुत-सी पूजा-पाठ और संतों के दर्शन के बावजूद उनके कष्ट दूर नहीं हुए। देवयोग से उनके एक ब्राहमण पड़ौसी से उनका यह दुख देखा नहीं गया। उसने रथकार दंपति को सुझाव दिया कि तुम अमावस्या तिथि को व्रत करो और भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा करो। वे ही तुम्हारे कष्टों को दूर करेंगे।

दंपति ने ऐसा ही किया और भगवान विश्वकर्मा जी की कृपा से उनके कष्ट दूर हुए। वे संतानवान और धनवान हुए। सृष्टि की रचना के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने विश्वकर्मा का रूप धारण किया था। शिल्पकला के व्यापक ज्ञान को उद्धृत करने के लिए सृष्टि के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ने ब्रम्हर्षि अंगिरा के कुल में महर्षि भुवन के रूप में जन्म लिया। पुराणों में उन्हे प्रजापति माना जाता है।

भगवान विश्वकर्मा की पत्नी ब्रम्हवादिनी के गर्भ से मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी तथा देवज्ञ नामक पांच पुत्र हुए जो क्रमशः लोहे, लकड़ी, तांबा, पीतल, पत्थर और सोने, चांदी का कार्य करते थे। पंचकला में निपुण विश्वकर्मा की संतानों को पांचाल ब्राह्मण के रूप में आज भी जाना जाता है।

वेदों के अनुसार सतयुग में स्वर्गलोक का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था जहां देवों के राजा इंद्र का शासन हुआ करता था। त्रेतायुग में रामायणकाल में सोने की लंका का जिक्र है जिसके बारे में किवदंती है कि भगवान शिव ने पार्वती से विवाह करने के उपरांत भगवान विश्वकर्मा से एक भवन बनाने का आग्रह किया। विश्वकर्मा जी ने बड़े जतन से सोने से सुसज्जित लंका का निर्माण किया। नये घर में प्रवेश से पूर्व शिव ने महान प्रकांड पंडित रावण को गृहप्रवेश समारोह को सम्पन्न कराने का आमंत्रण भेजा और समारोह के उपरांत रावण से मनवांछित दीक्षा मांगने को कहा। भवन की सुंदरता पर मोहित रावण ने महादेव से सोने की लंका ही मांग डाली जिसे स्वीकार करते हुए शिव पार्वती के साथ हिमालय की ओर चले गये।

पुराणो के अनुसार विश्वकर्मा ने द्वापर युग में भगवान कृष्ण की सुरम्य द्वाराकापुरी का निर्माण किया था जिसे कृष्ण ने अपनी राजधानी बनाया और लंबे समय तक यहां राज किया। कृष्ण की कर्मभूमि होने के नाते द्वारका हिन्दुओं के चार धाम में से एक में गिना जाता है।

महाभारत काल में भगवान विश्वकर्मा की अद्वितीय कृतियों का उल्लेख मिलता है। कौरव और पांडव की राजधानी हस्तिनापुर का निर्माण विश्वकर्मा ने ही किया था। दुर्योधन और शकुनि के प्रपंच जाल में उलझ कर धृतराष्ट्र ने खांडवप्रस्थ नाम का एक मरूस्थल पांडव कुमारों को सौपां। पांडव के फुफेरे भाई कृष्ण ने इस नगर को इंद्रप्रस्थ का नाम दिया और विश्वकर्मा जी से इसे बसाने का आग्रह किया।

भगवान विश्वकर्मा ने शिल्पकला के अद्वितीय नमूना पेश करते हुए इस स्थान पर ऐसे महल का निर्माण किया जिसका फर्श जल से भरे कुंड और फव्वारों का अनुभव देते थे जबकि इसके विपरीत जल कुंड चिकने संगमरमरी फर्श से जान पड़ते थे। पांडव की दयनीय स्थिति का जायजा लेने दुर्योधन इस महल की भव्यता से दंग रह गया और गलती से उसका पांव जलकुंड पर पड़ गया। पैर फिसल कर गिरे दुर्योधन को देखकर पांचाली ठठाकर हंस पड़ी और उसने कहा कि ‘अंधे का पुत्र अंधा’ और उसका यह व्यक्तव्य महाभारत का कारक बना।

वेदों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं की रक्षा के लिये उनके मुखियाओं को अस्त्र शस्त्र से सज्जित कर दिया था। विष्णु को चक्र, शिव को त्रिशूल, इंद्र को वज्र, हनुमान को गदा और कुबेर को पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किये थे।

हिन्दुओं के महान ग्रन्थ रामायण के अनुसार सीता स्वयंवर में जिस धनुष को श्रीराम ने तोड़ा था वह भी विश्वकर्मा के हाथों बना था और जिस रथ पर निर्भर रह कर श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन संसार को भस्म करने की शक्ति रखते थे उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे।

इसके अतिरिक्त शास्त्रों में भगवान विश्वकर्मा के अनेकों उदाहरण मिलते है। इनका अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि भारतवर्ष में कला उस समय चरम पर थी जब विश्व के लोगो को यह भी पता नही था कि कला किसे कहते हैं। वेद पुराण, महाभारत और रामायण इस तथ्य के साक्षी है।

भगवान विश्वकर्मा ने मानव जाति ही नही बल्कि देवी देवताओं तक को कर्म की शिक्षा प्रदान की। विश्वकर्मा दिवस पर मशीनों, औजारों की स्वच्छता तथा भविष्य में कठिन परिश्रम करने का संकल्प लेना ही इस पर्व की महत्ता को सिद्ध करता है।


GFR DeskSeptember 17, 2017
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गोरखपुर(संदीप त्रिपाठी): हाई कोर्ट के जाने-माने वकील गोरखपुर के लाल राहुल चतुर्वेदी को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। राहुल चतुर्वेदी की नियुक्ति पर कॉलोनी के लगों ने अपार हर्ष व्यक्त किया। शनिवार से ही उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है।

राहुल चतुर्वेदी के पिता स्व प्रो वाई यन चतुर्वेदी गोरखपुर विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र विभाग में प्रोफेसर थे। श्री चतुर्वेदी 1997 में विश्वविद्यालय से रिटायर हुए थे।

राहुल चतुर्वेदी ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से 1983 में बीएससी करने के बाद 1988 में विधि की पढ़ाई पूरी की।

विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग के प्रोफेसर यू एन त्रिपाठी ने Gorakhpur Final Report को बताया कि राहुल चतुर्वेदी की नियुक्ति पर रसायन शास्त्र विभाग, विधि विभाग के साथ साथ विश्वविद्यालय परिवार में अपार हर्ष है।

उन्होंने बताया कि राहुल के पिता स्वर्गीय प्रोफेसर वाई यन चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर थे। श्री त्रिपाठी ने बताया कि चतुर्वेदी परिवार का विश्वविद्यालय से काफी पुराना संबंध है।

उन्होंने यह उम्मीद जताई कि आगे भी विश्वविद्यालय के निकले हुए छात्र आगे चलकर देश से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर इस यूनिवर्सिटी का नाम रोशन करेंगे।


GFR DeskSeptember 16, 2017
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गोरखपुर(संदीप त्रिपाठी): ईंट गारे से बनी महानगर के कलेक्ट्रेट की दीवारे अब कुछ बोल रही हैं। इस 110 मीटर लंबी दीवार पर गोरखपुर का अक्स दिखाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। कल तक मजबूती से चुपचाप खड़ी ये दीवारें अब शहर में ‘वॉल ऑफ़ चेंज’ बन चुकी हैं। और इस काम को मूर्त रूप दे रहे हैं देल्ही स्ट्रीट आर्ट कलाकार। इसमें अपने दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के फाइन आर्ट के छात्र दे रहे हैं अपना अमूल्य सहयोग।

ऐस्प्रा ग्रुप के सहयोग से शुरू हुई इस मुहीम में दीवार पर मुंशी प्रेमचंद,पंडित राम प्रकाश बिस्मिल, गोरखनाथ मंदिर और भगवान बुद्ध से जुड़े प्रसंग को चित्रित किया गया है। दीवार पर अभी पेंटिंग का काम चल रहा है और आशा है कि रविवार तक यह पूरी दीवार वाल ऑफ़ चेंज के रूप में परिवर्तित हो जाएगी।

दिल्ली स्ट्रीट आर्ट के साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर के फाइन आर्ट विभाग के 70 से अधिक छात्र सुबह से लेकर शाम तक दीवाल पर अपनी कल्पनाओं के रंग भर रहे हैं। दिल्ली स्ट्रीट आर्ट के योगेश सैनी के नेतृत्व में 15 चित्रकारों की टीम कलेक्टेट मुख्य गेट से लेकर शास्त्री चौक तक के दीवार को नया रंग देने में जुटा हुआ है। स्टूडेंट रागनी, विष्णु ,संदीप मौर्या पूरे दिन वाल पेंटिंग करते देखे गए।

दीवार पर योगा से लेकर गोरखपुर मेरी जान, ऐतिहासिक स्थल चौरी चौरा, गीता प्रेस, के साथ अमृता शेरगिल की पेंटिंग भी दिख रही है। कलेक्ट्रेट से लेकर कलेक्ट्रेट चौराहे तक की सड़क की दीवार पर चित्र कला की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ललित कला विभाग के छात्रों को मिली है।

शुक्रवार को विभाग के लगभग 40 छात्र-छात्राएं पूरी तरह से दीवारों पर रंग देने में मशगूल थे। दिल्ली के छात्र आदित्य शर्मा ने बताया कि एक पेंटिंग को सोशल मीडिया की लत को लेकर पेंटिंग बनाई गई है। यह पेंटिंग संदेश देती है कि किस प्रकार सोशल मीडिया के चक्कर में फस कर परिवार के सदस्य आपस में ही कट गए हैं।

कलेक्ट्रेट की दीवार पर 55 ब्लाक है। इन ब्लाकों में विभिन्न चित्र बनाए गए हैं। इंस्टीट्यूट के योगेश सैनी ने बताया कि इस पर एशप्रा की इस पहल के माध्यम से दीवार पर पेंटिंग शहर को अपने अतीत और वर्तमान से जोड़ेगी साथ में स्वच्छता का संदेश भी देगी। और लोग ऐतिहासिक धरोहर को भी पहचान सकेंगे।

Gorakhpur Final Report से बातचीत में गोरखपुर विश्वविद्यालय की दृश्य कला विभाग की प्रोफेसर उषा सिंह ने बताया स्वच्छता अभियान के माध्यम से समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा। उन्होंने बताया कि सिर्फ झाड़ू से ही सफाई नहीं हो सकती सफाई के कई और भी माध्यम है। जैसे गली चौराहों पर लोग खाली दीवारों पर कूड़े कचरे फेंक देते हैं या पान मसाला खाकर थूक देते हैं।

उन्होंने बताया कि वॉल पेंटिंग के बाद लोग ऐसा करने से खुद व खुद आपस में आत्मग्लानि महसूस करेंगे और इससे हमारे शहर और मोहल्ले की दीवारों पर ऐसा होने से बचा जा सकता है। उन्होंने बताया कि दृश्य दृश्य कला विभाग के छात्र बृजेश कुमार अमित पटेल परा स्नातक प्रथम वर्ष संजय आदित्य शैलेंद्र के छात्रों ने अपनी कला का हुनर प्रदर्शित किया है।

वहीँ योगेश सैनी ने बताया कि हमारी टीम भारत के विभिन्न बड़े शहरों जैसे मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, भोपाल आदि में वॉल पेंटिंग के माध्यम से जन जागरुकता अभियान फैला रहे हैं।


GFR DeskSeptember 15, 2017
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गोरखपुर (राकेश मिश्रा): आप सभी ने रफ़्तार, बादशाह, हार्ड कौर, हनी सिंह और मीका सिंह का नाम केवल सुना ही नहीं होगा बल्कि इनके गाये हुए गाने गुनगुनाते भी होंगे। पार्टी-फंक्शन में इनके गाये हुए रैप का क्रेज युवाओं के बीच देखते ही बनता है। लेकिन जरा सोचिये की आने वाले वक़्त में ऐसा हो की हम अपने ही शहर के किसी गायक या रैपर द्वारा गाये गए रैप पर पार्टियों में झूमे तो कैसा मजा आएगा। जी हाँ अब ऐसा संभव है।

अपने ही शहर गोरखपुर के तीन युवाओं ने अपनी ही माटी अपनी संस्कृति को समर्पित करते हुए एक रैप सांग गाया है। तीन युवाओं का गोरखपुर के लिए ही गाया हुआ यह रैप ‘तिरपन’ इस समय सोशल मीडिया पर धूम मचाये हुए है। इन तीन प्रतिभाशाली युवाओं का नाम है–शुभम त्रिपाठी (श्रेयमान), रचित श्रीवास्तव और अपूर्व त्रिपाठी (ट्रिप्पी)। शुभम त्रिपाठी शहर के राजेंद्र नगर के रहने वाले हैं तो वहीँ रचित सूरजकुंड और अपूर्व रुस्तमपुर के रहने वाले हैं।

शुभम ग़ाजियाबाद के इंद्रप्रस्थ इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक कर रहे हैं। 20 वर्षीय रचित भी लखनऊ के आईईटी कॉलेज से बीटेक कर रहे हैं वहीँ 22 वर्षीय अपूर्व शहर के ही इस्लामिआ कॉलेज से कॉमर्स ग्रेजुएट हैं। बीते कई वर्षों में गोरखपुर में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं और यह रैप भी उसी परिवर्तन का एक खूबसूरत उदहारण है। आमतौर पर अपने द्विअर्थी भोजपुरी गाने के लिए विख्यात पूर्वांचल के लिए यह रैप निश्चित रूप से एक बदलाव लेकर आया है।

Gorakhpur Final Report से बात करते हुए 20 वर्षीय शुभम ने बताया कि ’53’ (UP53 #गोरखपुर) उन सभी के द्वारा अपने शहर गोरखपुर को समर्पित एक छोटा सा प्रयास है। उनका कहना था कि इस रैप के माध्यम से उन तीनों ने गोरखपुर को विश्व के हिप-हॉप मैप पर लाने का एक प्रयास किया है। शुभम ने बताया कि प्रोफेशनल रूप से यह इनका पहला रैप है और आनेवाले दिनों में गोरखपुर, वहां की संस्कृति और लोगों को समर्पित कई और रैप भी यह लोग लेकर आएंगे।

इस रैप की एक खास बात और है कि इसके गीतकार और संगीतकार यही तीनों हैं। इन्होने इस रैप को संगीतबद्ध करने के लिए किसी और की मदद नहीं ली। अगर आप अपने शहर से बाहर रहते हैं तो 53 अपने संगीत के माध्यम से आपको गोरखपुर ले जायेगा। इसके बोल आपको गोरखपुर की एक-एक बात से वाकिफ कराएँगे। 53 को आवाज तीनों–शुभम, रचित और अपूर्व ने दी है। इस रैप का संगीत रचित ने दिया है वहीँ इसका वीडियो शुभम ने बनाया है।

शहर के ही स्प्रिंगर पब्लिक स्कूल के छात्र रह चुके शुभम ने बताया कि रैप सिंगर रफ़्तार और बादशाह इनके आदर्श हैं। इन्हीं दोनों को रैप गाते देख इन्हे भी इस क्षेत्र में कुछ करने की प्रेरणा मिली। शुभम ने कहा कि जैसे रफ़्तार, बादशाह और अन्य रैपर अपने क्षेत्र की बातों को अपने रैप के माध्यम से उजागर करते हैं वैसे ही 53 भी गोरखपुर को हाईलाइट करने का एक प्रयास है।

किसान पिता गोपाल त्रिपाठी और गृहिणी माता आशा त्रिपाठी के बेटे शुभम का कहना है कि इस रैप सांग के बाद आने वाले समय में यह तीनों भोजपुरी में भी एक रैप सांग का निर्माण करेंगे। शुभम का कहना है कि पूर्वांचल के बाहर भोजपुरी गीतों के द्विअर्थी शब्दों के कारण इस भाषा को बड़ी हिकारत भरी निगाह से देखा जाता है और यही कारण है कि उनका अगला रैप भोजपुरी में होगा।

रचित ने खोराबार स्थित संट जोसफ स्कूल से 12 वी तक की पढाई की है। रचित के आदर्श राकीम, Dr Dre, एमिनेम, लील वायने जैसे रैपर हैं। इनके पिता रजनीश श्रीवास्तव प्राइवेट जॉब करते हैं तो माता अलका श्रीवास्तव गृहिणी हैं। नवल अकादमी गोरखपुर से 10वी और 12वी तक की पढाई किये अपूर्व के आदर्श हनी सिंह और बादशाह जैसे रैपर हैं। इनके पिता अलोक त्रिपाठी एक डॉक्टर हैं तो माता उषा त्रिपाठी एक गृहिणी।

53 रैप सांग आपको यूट्यूब पर तो मिल ही जायेगा। इसके अतिरिक्त संगीत के अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे itunes, Saavn, Amazon पर भी उपलब्ध है। इस गीत को Google Play Store के द्वारा भी सुना जा सकता है।


GFR DeskSeptember 15, 2017
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गोरखपुर: अगर आप गोरखपुर के निवासी हैं तो आपके लिए एक बुरी खबर है। दोस्तों बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इंसेफ्लाइटिस मरीजो के जरूरतमंद परिजनों के लिए चल रहा निशुल्क भोजन अभियान ‘पहल’ संकट में है। बीते दिनों अन्नदान की कमी और मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण यह अभियान संकट में है।

पहल के संचालक मेडिकल कालेज में कार्यरत डॉक्टर विजय कुमार श्रीवास्तव ने एक मार्मिक अपील करते हुए कहा है कि अगर लोग आगे नहीं आये तो शायद पहल का संचालन बंद करना पड़े। उन्होंने कहा चुकि पहल कोई संस्था नहीं है और पूरी तरह से अन्नदान पर निर्भर है। यही कारण है कि बीते दिनों मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी और दान की संख्या में आयी कमी के कारण वह मरीजों के परिजनों का पेट नहीं भर पा रहे हैं।

डॉ श्रीवास्तव ने लोगों से अपील करते हुए कहा है कि,”कृपया आगे आइये। पहल कोई संस्था नही है, यह अभियान पूरी तरह से अन्नदान पर निर्भर है। आपसे प्रार्थना है कृपया अपने राशन का एक छोटा सा हिस्सा इन जरुरतमंदो के लिए हमे दान दे।”

गौरतलब है कि पहल के माध्यम से बीआरडी मेडिकल कालेज में भर्ती इंसेफ्लाइटिस मरीजो के जरूरतमंद परिजनों (प्रतिदिन लगभग 200 से 250 व्यक्तियो) को भिक्षा में प्राप्त अन्न से निशुल्क भोजन कराया जाता है। ‘पहल अन्नपोष अभियान’ के द्वारा इनसेफेलाइटिस पीड़ितों के मुसीबतजदा तीमारदारों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है। खास बात ये है की यह संस्था ना तो कोई एनजीओ है और न ही इसका फंड कहीं से आता है।

पूर्वांचल का अभिशाप बन चुके इंसेफेलाइटिस रोग की चपेट में अपने नौनिहाल को हर कोई आनन फानन में मेडिकल कालेज की तरफ लेकर भागता है। ऐसे वक्त में उसे पहनने और खाने की चीजों को लेकर आने की फुर्सत नही रहती है। ऐसे में जब तीमारदार अपने बच्चे को अस्पताल में भर्ती कर देता है तो उसके सामने जो समस्या मुंह खोले खड़ी रहती है वह है पेट भरने और कपड़े बदलने की। कुछ इसी तरह की समस्याओं से निपटने के लिए उन्हें दुसरो का मुंह ताकना पड़ता है।

कुछ इसी तरह की समस्याओं को बारम्बार देख कर इसी मेडिकल कालेज में कार्यरत एक डॉक्टर विजय कुमार श्रीवास्तव का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने ऐसे लोगों के बारे में सोचना शुरू कर दिया। अपने कुछ शुभेच्छुओं से बात चित के बाद उन्होंने दृढ प्रतिज्ञ होकर एकला चलो की तर्ज पर अपने फेसबुक पेज पर लोगो से मदद की अपील की।

उन्होंने अपने अपील में लिखा कि अगर एक-एक आदमी केवल 300 रूपये के कच्चे भोज्य पदार्थ उन्हें भिक्षास्वरूप दे दे तो वह कुछ जरूरतमन्दों की सेवा कर सकेंगे। नतीजा सामने आया और पहले कुछ लोगो ने फिर धीरे धीरे अन्य लोगों ने इसमें हाथ बंटाना शुरू कर दिया। होता ये है कि जब कोई अपनी दैनिक रोजमर्रा की वस्तुएं लेने किराना की दुकान पर जाता है तो पहल के लिए भी 300 रूपये की आटा, चावल, दाल आदि भी ले लेता है ,जिसे वह संस्था को दे देता है।

डॉक्टर विजय कुमार श्रीवास्तव के अनुसार वह भिक्षास्वरूप मिले इन भोज्यपदार्थों को मेडिकल कालेज परिसर में ही रैन बसेरा में चल रहे अन्नपूर्णा कैंटीन में देते है। जहाँ सुबह दोपहर शाम एक समयावधि तक ताजा भोजन मिलता है। इस दौरान सम्बन्धित जरूरतमंद तीमारदार को एक पर्ची दे दी जाती है और तीमारदार उस पर्ची को कैंटीन में देकर मुफ्त भोजन ग्रहण कर लेते है। जिसमे 6 रोटी, हाफ प्लेट चावल, दाल, सब्जी, प्याज व अचार दिया जाता है।

डॉक्टर श्रीवास्तव के अनुसार 30 अगस्त 2016 से शुरू किये गए इस अभियान को पहले तो केवल दो माह के लिए ट्रायल के तौर पर चलकर देखा जाना था, जिसमे प्रतिदिन 100 लोगों को भोजन कराया जाता था, जिसे बाद में बढ़कर भोजकों की संख्या 150 हो गयी है। इस संस्था द्वारा 30 अगस्त से शुरू हुए अन्नपोष अभियान में 14 अक्टूबर तक 6000 लोगो को भोजन कराया जा चूका है।

इमरजेंसी में लगा है हेल्पडेस्क

मेडिकल कालेज के इमरजेंसी कक्ष में पहल संस्था द्वारा हेल्प डेस्क की स्थापना की गयी है। जहाँ 8-8 घंटे की शिफ्टवाइज ड्यूटी के लिए 3-3 वालंटियर्स लगाये गए है। जो इंसेफेलाइटिस पीड़ित को पर्ची बनवाने से लेकर एडमिशन, जाँच ,दवा और भोजन उपलब्ध कराने की मदद करने को तत्पर रहतें हैं।

इच्छुक व्यक्ति डॉ वी के श्रीवास्तव से 9415378716 नंबर पर संपर्क कर अन्नदान कर सकते हैं। आगे आईये आपकी छोटी सी पहल मेडिकल कॉलेज में चल रहे एक बड़े पहल को खत्म होने से बचा सकती है।


GFR DeskSeptember 6, 2017
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गोरखपुर: कहते हैं कि मौत और मुसीबत बिन बुलाए मेहमान है। किन्तु जब गाढ़े वक्त में भी कोई अपने साथ खड़ा हो तो फिर इन मुसीबतों को भी पार पाया जा सकता है। जनपद में बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकी बाढ़ और उसकी तबाही से निपटने के लिए कुछ ऐसी ही सोच सकारात्मक विचारों से लबरेज गोरखपुर के युवाओं की देखने को मिली। जो मुसीबत के दौरान अपने जनपदवासी मुसीबतजदा भाइयों की सेवा में निस्वार्थ भाव से दिन रात जुटे हैं।

एक तरफ प्रकृति का नंगा नाच और दुसरी तरफ युवा हौसले। एक तरफ बाढ़ की आपदा से जूझते बेबस परेशान नागरिक दुसरी तरफ उन परेशान चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करती युवाओं की जूझारू टीम। हम बात कर रहे है टीम यूथ युटिल वेलफेयर एसोसिएशन (युवा इण्डिया) की। जिसमें गोरखपुर पर बाढ़ के रूप में आई विभीषिका से जूझते लोगों की मुसीबतों को कम करने और उन्हे हर सम्भव सहायता देने की लगातार कामयाब कोशिश कर रही है।

इसके अध्यक्ष रत्नेश तिवारी के अनुसार ऐसी विपदा देखकर कुछ अलग तरह की मदद करने का विचार आया, किन्तु अकेले यह सब सम्भव न था। लिहाजा एक दो मित्रों से इसकी वार्ता हुई, फिर क्या एक से दूसरे और तीसरे तक बात पहुंची तो सबने मिलकर इसे अंजाम तक अनवरत पहुंचाने की ठान लिया, और अपनों का हाथ मिलता गया, अभियान का कारवां बनता गया।

बिना किसी बड़े आर्थिक स्त्रोत के भी टीम के ही सदस्यों व आम जन के सहयोग से टीम युवा इण्डिया ने बाढ़ पीड़ितों के लिए 16 अगस्त से ही लगातार पूरे समय न केवल भोजन और अन्य खास सामग्रियों की व्यवस्था करना शुरू कर दिया, बल्कि वहीँ दूसरी तरफ़ टीम के अमित सिंह पटेल के नेतृत्व में स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए मेडिकल कैम्प भी लगवाकर उसमें योग्य चिकित्सकों के माध्यम सेे बाढ़ पिड़ितों का स्वास्थ्य परिक्षण कर रहे एवं साथ में दवायें मच्छरदानी, छाता भी वितरित किया जा रहा है।

संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष रत्नेश कुमार तिवारी ने बताया की चार-चार सदस्यों की छह ग्रुप बनाई गई है जिनका काम बाढ़ प्रभावित इलाको का निरक्षण कर जरूरतमंद लोगों का पता लगाना, बाजार व आम जन से राहत सामाग्री जुटाना, खाना बनवाना, राहत सामाग्री पैक करना, सदस्यों को एकत्र कर राहत सामाग्री वाहन पर लादना व चयनित गाँव तक पहुंचना आदि। जिसका नेतृत्व देवा जायसवाल व गौरव शर्मा ने किया।

इस दौरान मनीष पाठक, सुकन्या सिंह, अखिलदेव त्रीपाठी, गोविन्द जायसवाल, कृष्णा सराफ, दीपक मद्धेशिया, मिथलेश यादव, इस्लाम, मीन्नतुल्लाह, जय त्रीपाठी, आशिष मगहीया, शैलेन्द्र कुमार, अतुलदेव, कपिल त्रीपठी, अनुप भारत, विशाल जायसवाल, अभिषेक सिंह, प्रणव दुबे, मनीष यादव सिद्धार्थ अजय, सहित काफी संख्या में युवाओं ने अपनी सेवा दी।

जानते हैं इस टीम के जुझारुओं का संक्षिप्त परिचय:-

रत्नेश कुमार तिवारी- डिरेक्टर सॉफ्टको टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड,
देवा जायसवाल – मालिक जायसवाल होटल,
गौरव शर्मा – M tech स्टूडेंट (MMMTU)
अमित सिंह पटेल- मेडिकल बिजिनेस,
कृष्णा सर्राफ- मालिक राजकोट ज्वेलर्स ,
सुकन्या सिंह:- प्रेस रिपोर्टर,
गोविंद जायसवाल – मालिक जायसवाल प्रोविजन स्टोर,
दीपक मद्धेशिया- बिजिनेस मैन,
अखिलदेव त्रिपाठी:- उपाध्यक्ष डीडीयू यूनिवर्सिटी,
सिद्दार्थ और मनीष यादव एक इंस्टिट्यूट के संचालक,
मनीष पाठक, मिथलेश यादव, इस्लाम,अनूप भारत, शैलेन्द्र कुमार, आशीष मगहिया, कपिल, अतुलदेव आदि स्टूडेंट्स हैं।


GFR DeskSeptember 5, 2017
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गोरखपुर (संदीप त्रिपाठी): रेलवे पुलिस बल प्रशिक्षण केंद्र को हाईटेक बनाया जाएगा। इसके लिए पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक को चार करोड़ रुपए का प्रपोजल भेजा गया है। उम्मीद है कि जल्द ही मंजूरी मिल जाएगी और RPF के जवान ट्रेनिंग लेकर देश तथा रेल यात्रियों की सुरक्षा के लिए हाईटेक हो जाएंगे।

Gorakhpur Final Report से बातचीत करते हुए पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य सुरक्षा आयुक्त राजाराम ने बताया कि यात्रियों एवं रेल की सुरक्षा एवं संरक्षण के मद्देनजर आरपीएफ 50 जवानों को कमांडो की ट्रेनिंग देगी।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, होली, दशहरा और दीवाली सहित सभी महत्वपूर्ण त्योहारों पर यात्रियों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए RPF हमेशा मुस्तैदी से काम करता है।

उन्होंने कहा कि भीड़ को ध्यान में रखते हुए जवानों की छुट्टियां निरस्त कर दी जाती हैं ताकि यात्रीगण को कोई दिक्कत ना उठानी पड़े। आईजी ने बताया कि आने वाले दिनों में आतंकवादी गतिविधियों को देखते हुए जवानों को और सख्त बनाया जाएगा। जिसके लिए 50 जवानों को छत्तीसगढ़ के कोकेड में कमांडो ट्रेनिंग कराने की योजना बनाई गई है ।

उन्होंने बताया कि ईस्टर्न रेलवे में ऐसे ही Commando तैयार किए जा चुके हैं और इसलिए पूर्वोत्तर रेलवे भी जल्द ही अपने जवानों को ट्रेनिंग के लिए भेज देगा।

आईजी ने बताया कि बारिश के मौसम में फील्ड गीली हो जाने के कारण जल जमा हो जाने के कारण ट्रेनिंग देने में दिक्कत आती है इस योजना के पास हो जाने के बाद नई तकनीक के साथ जवानों को प्रशिक्षण किया जा सकेगा।