देवरिया / कुशीनगर

हाटा विधानसभा: राज्य मंत्री की प्रतिष्ठा दांव पर

कुशीनगर (मोहन राव): जनपद की हाटा विधानसभा ने लगभग सभी प्रमुख सियासी दलों को अवसर दिया है। 2012 विधानसभा चुनाव में यह सीट सपा की झोली में आई। यहां से सपा के तेज तर्रार किसान नेता राधेश्याम सिंह चुनाव जीते और राज्य सरकार में कृषि चिकित्सा शिक्षा मंत्री बने। सपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा वाली सीट है। यहां मुख्य मुकाबला सपा के राधेश्याम सिंह, बसपा के वीरेंद्र सिंह सैथवार और भाजपा के पवन केडिया के बीच है।
पिछली विधानसभा चुनाव से पूर्व हाटा विधानसभा सुरक्षित थी। पूर्व मे राधेश्याम सिंह रामकोला विधानसभा से दो बार विधायक रहे हैं। रामकोला उनकी कर्मभूमि मानी जाती है यहीं से उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की थी। 1992 की गन्ना किसान आंदोलन से राधेश्याम सिंह गन्ना किसान नेता के रूप में मशहूर हो गए। जनता के बीच कड़क नेता की छवि है। 2012 में जब रामकोला सुरक्षित सीट हुआ तो राधेश्याम सिंह हाटा विधानसभा में चुनाव लड़ने चले गए।
पहली बार श्री सिंह सपा प्रत्याशी के रूप में 2012 में वहां से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के वीरेंद्र सिंह सैंथवार को लगभग 17000 वोटों से पराजित किया। इस बार भी राधेश्याम सिंह अपने विकास कार्यों के बलबूते जनता के बीच में जबरदस्त जनसंपर्क में लगे हैं। वह हर हालत में यह सीट खोने नहीं देना चाहेंगे। चुनाव के समय में तीनों राजनीतिज्ञ राधेश्याम सिंह, वीरेंद्र सिंह, और पवन केडिया अपना परचम लहराने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।
हाटा विधानसभा में सैथवार मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। बसपा ने हाथी के पूर्व के महावत वीरेंद्र सिंह सैंथवार पर विश्वास जताकर पुनः मैदान में उतारा है और ये दलित, मुस्लिम और अपनी स्वजातीय मतदाताओं के सहारे जीत पक्की मान रहे हैं। वहीं भाजपा के पवन केडिया भाजपा की परंपरागत वोट तथा मोदी लहर के सहारे अपनी नैया पार करना चाह रहे हैं।
यहां ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका परिणाम बदलने में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। तीनों सियासी दलों में कांटे की टक्कर चल रही हैं। जनता की खामोशी इन की बेचैनी बढ़ा रही है। अब देखना है कि जनता 4 मार्च को अपना क्या निर्णय देती है। हाटा विधानसभा में लगभग 350000 मतदाता है। जो 2017 के चुनाव में मैदान में उतरे कुल 12 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे।

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