देवरिया / कुशीनगर

कुशीनगर: मां गंजेश्वरी के दरबार में नवमी को होती है भारी भीड़

–चमत्कारी फल मिलने के वजह से पूरे क्षेत्र मे चर्चित है देवी का स्थान
–नवमी के दिन पुजारी पर आता है देवी का आसन
–प्रसाद के रूप मे बटता है लौंग और नीम की पत्ती

मोहन राव
कुशीनगर: नेपाली भगवती मां गुंजेश्वरी की यश की प्रसिद्धि जग जाहिर है। भक्तों की दुःख हरण करने वाली मां गुंजेश्वरी का दरबार कुशीनगर जनपद के रामकोला से 4 किलोमीटर पश्चिम दक्षिण दिशा में ग्राम- कुसम्हां टोला चकिया में स्थित है। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्तों द्वारा कढ़ाई में चुनरी चढ़ाया जाता है। इस देवी का विशाल मंदिर काठमांडू में स्थित है।

मां गुंजेश्वरी के दरबार में पूरी आस्था एवं निष्ठा के साथ जो भक्त मत्था टेकने पहुंचता है उस भक्तों की मुरादें माता रानी पूर्ण करती है। उनको निराश नहीं करती, उनकी झोली खुशियों से भर देती हैं। मां गुंजेश्वरी ने अपने दरबार आये दीन- दुखियों को अनेक चमत्कारी फल दिया है। गांव के बुजुर्गों के द्वारा सुनने को मिलता है कि जीवन से निराश हुए व्यक्ति जब भी श्रद्धापूर्वक मां के दरबार में पहुंचा है उनको जीने की नई जिंदगी मिली है। नवरात्र शुरू होते ही यहां भक्तों का आवागमन शुरू हो जाता है।

वर्ष में दो बार शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में रात के समय देवी भाव को देखने के लिए नवमी के एक दिन पूर्व से ही मां के दरबार में नेपाल, बीरगंज, रक्सौल, छपरा, लखनऊ, इलाहाबाद सहित दूर-दूर से भक्तों का गांव में आना शुरू हो जाता है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि हम लोगों के पूर्वज बताते थे कि जिनके घर देवी मां के पिंडी का स्थापना हुआ है। उनके पूर्वज रामनिवास राव ताजिया देखने कप्तानगंज के पास साहबगंज गए हुए थे। साहबगंज छोटी गंडक पर पुल नहीं था और आने जाने के लिए सवारी का कोई साधन नही था । ताजिया देखकर लौटते समय रात हो गई थी, नदी को पार करना था। मीठे स्वर में गीत गुनगुनाते हुए नदी को पार करने लगे।

उसी दौरान नेपाली भगवती मां गुंजेश्वरी का शायर जा रहा था। रामनिवास राव के मीठे स्वर की वजह से मां ने अपने पुजारी के रूप में एक नया अध्याय जोड़ा और मां का साया उस देहाती ग्रामीण के ऊपर पड़ गया । घर आने पर उनकी तबीयत खराब हो गयी । चार-पांच महीने तक घरेलू उपचार होता रहा लेकिन उनकी तबीयत में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ फिर उनके ऊपर देवी का आसन आया और आसन के दौरान घर में पिंडी स्थापित कराने को मां का आदेश प्राप्त हुआ।गुंजेश्वरी देवी का पिंडी उनके झोपड़ी में स्थापित हुई। इस घटना को हुए करीब 400 साल से अधिक हो गया होगा। तभी से उनका पूजा -अर्चना शुरू हो गया और देवी मां द्वारा कल्याण होने की प्रसिद्धि दूर-दूर तक पहुंचने लगी। फिर यहां आने वाले भक्तों का भीड़ शुरू हो गई।

रामनिवास राव के बाद पीढी दर पीढी यदुनाथ राव ,जलेसर राव,सरजू राव,अर्जुन राव,रामाशंकर राव के बाद अब रवीन्द्र राव सेवक के रूप में मां भगवती का सेवा कर रहे है। नवरात्र के पहले दिन से ही शाम ढलने के बाद पुजारी द्वारा देवी पचरा शुरू हो जाता है नवमी तिथि को रात में पुजारी के ऊपर जब मां का आगमन होता है तो पुजारी देवघर के बाहर निकलते है। जहां हजारों की संख्या में जुटे भक्त उनकी आने का राह देख रहे होते हैं। देवघर से निकलने के बाद गांव के उत्तर काली मंदिर जाना और अॅकवार देना और नेपाली भाषा में कुछ बात करना फिर गांव के बाहर बने डीह स्थान जाकर भेंट करना वापस आना होता था उनके साथ मलहोरी,कल्छूल में कपूर का उजाला लिए एक आदमी तथा उनके खाने के लिए नीम की पत्ती एवं चावल लिए पंडित पीछे- पीछे दौड़ लगाते थे। मां गुंजेश्वरी कभी अपने भक्तों को निराश नहीं कि सदैव उनके पीड़ा एवं दुख का निवारण की। भक्तों द्वारा कपूर जलाकर मां को प्रसन्न किया जाता है।

गांव में मौजूद बुजुर्गों का कहना है कि हम लोगों के होश की बात हैकि देवी मां की आसन आने पर पुजारी नेपाली भाषा में कुछ बात कर जब हाथ ऊपर करते थे तो उनके हाथ में लौंग की डाली आ जाती थी। यह चमत्कार पुजारी सरजू राव के समय तक रहा। कई ऐसी घटनाएं हुई थी अगर किसी ने देवी का अपमान करना चाहा तो पुजारी ने देवी का नाम लेकर छड़ी के साथ- साथ उसे भी जमीन से बिना छुए उठाकर देवी के शक्ति का एहसास कराया। मां भगवती का जैसे ही भाव समाप्त होता। लोंग एवं नीम की पत्ती प्रसाद स्वरूप भक्तों को दिया जाता। अब लोंग की डाली तो नहीं लेकिन जो भक्त आस्था पूर्वक अपनी मनोकामना एवं कष्ट निवारण हेतु मां के दरबार में आते हैं उनकी मनोकामना मां गुंजेश्वरी पूरा करती हैं। अपने भक्तों को कभी निराश नहीं की।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *