देवरिया / कुशीनगर

कुशीनगर: आखिर कब तक पुल के अभाव में एक बड़ा भू भाग सहता रहेगा नारायणी का प्रकोप

आदित्य कुमार दीक्षित
कुशीनगर: जनपद से सटे बिहार और नेपाल के बीच एक नदी बहती है जिसका नाम नारायणी है। बाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम अपनी शादी कराने अपने ससुराल जनकपुर इसी नदी को पर करके गए थे। सैकड़ों साल पूर्व जब यहां अंग्रेजों का शासन हुआ करता था तब अंग्रेज इस नदी के पश्चिम में स्थित पश्चिमी चंपारण के खेतिहर भूमि पर वहां के किसानों से नील की खेती कराते थे तथा उस पर तिनसुकिया नामक कर लगाते, और उस नील को विदेशों में बेच कर ब्रिटिश सरकार के खजाने भरा करते थे।

इसके कुछ वर्ष बाद जब गांधी जी विलायत से अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस लौटे तो उन्होंने इस कर का विरोध किया और एक सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की, आगे चलकर यही सत्याग्रह अंग्रेजी हुकूमत की ताबूत में कील ठोंकने का काम किया और उन्हें भारत को आजाद करने पर मजबूर होना पड़ा।

अब सोचने वाली बात यह है कि जिस चंपारण ने भारत को आजादी दिलाने में अपनी महती भूमिका निभायी है उसी चंपारण के लोग आजादी के 70 साल बाद भी अपने अस्तित्व को हर साल बचाने के लिए सरकार से गुहार लगाते हैं और सरकार पश्चिमी चंपारण को बचाने के लिए हर वर्ष अरबों रुपया खर्च कर देती है।

आजादी के 70वें दशक मेँ जटहाँ बगहां पुल निर्माण की उठी मांग

आजादी के 70वें दशक में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले और बिहार पश्चिमी चंपारण के बगहां जिले के युवाओं ने उत्तर प्रदेश और बिहार प्रान्त को जोड़ने वाले जटहाँ बगहां पुल निर्माण के लिए हुंकार भरी है।

क्यों जरुरत है पुल की?

दरअसल नारायणी नदी के किनारे दोनों प्रान्तों को मिलाकर सैकड़ों गांव और लगभग 5 लाख की जनसंख्या निवास करती है। सैकड़ों गांव और लाखों की जनसंख्या को हर वर्ष नारायणी द्वारा वर्षा के मौसम में अपना रौद्र रूप धारण कर अपने आगोश में समा लिया जाता है। जिससे कि हर वर्ष लगभग हजारों एकड़ फसल तथा लाखों की मात्रा में जान माल की क्षति होती है। लेकिन अगर यह जटहाँ बगहां पुल का निर्माण हो जाता है तो नारायणी नदी के प्रकोप से हर वर्ष होने वाली यह भीषण तबाही थम जायेगी और देश के इन दोनों प्रान्तों में खुशी की लहर दौड़ उठेगी।

इसके अलावा इस पुल के न होने से कुशीनगर जिले के जटहाँ बाजार से बिहार के बगहां प्रान्त में जाने के लिए वर्तमान समय मे लगभग 70 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है और जब यह पुल बन कर तैयार हो जायेगा तो यही दूरी घटकर मात्र 7 किमी हो जायेगी जिससे दोनों प्रान्तों की जनता को आने जाने के लिए कम समय और कम व्यय लगेगा।

जटहाँ बगहां पुल निर्माण के कर्णधार

जटहाँ बगहां पुल निर्माण आंदोलन के अध्यक्ष उदित नारायण स्नातकोत्तर महाविद्यालय पडरौना के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष गौरव तिवारी हैं। जब हमने उनसे इस मामले पर बात की तो उनका कहना था कि एक दिन उन्होंने सोशल मीडिया पर जटहाँ बाजार के रहने वाले पत्रकार प्रमोद रौनियार की एक पोस्ट देखी जो कि इस पुल से और इस क्षेत्र की जनता के समस्याओं के संदर्भ में थी। फिर क्या था मेरे मन में एक बेचैनी सी उठने लगी कि इस संदर्भ में और अधिक जानना चाहिए। मैं वहां गया उनकी समस्याओं को सुना जाना और मुझे लगा कि इस पुल का बनना दोनो प्रान्तों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जब तक यह पुल बन नहीं जाता वो चैन से नहीं बैठेंगे। श्री तिवारी बताते हैं कि इस पुल के निर्माण से भारत की ऐतिहासिक धरोहर तथा पौराणिक स्थल बाल्मीकिनगर व्याघ्र परियोजना, लवकुश जन्मस्थली, जनकपुर, तथा भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली कुशीनगर आपस मे जुड़ जायेंगे।

जटहाँ बगहां पुल का नामकरण “बुद्ध बाल्मीकि सेतु”

जटहाँ बगहां पुल निर्माण मंच के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र के आमजनमानस से विचार विमर्श करने के बाद पुल का नाम बुद्ध बाल्मीकि सेतु कर दिया है। इस नाम के पीछे का कारण जानने पर पता चला की बिहार प्रान्त के बाल्मीकि आश्रम में भगवान राम की कथा रामायण के रचयिता गुरु महर्षि बाल्मीकि जी का आश्रम है तथा कुशीनगर में भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली है और यह पुल इन दोनों पुण्य धराओं को जोड़ता है अतः इस पुल का नामकरण “बुद्ध बाल्मीकि सेतु” किया गया है।

अब इस आंदोलन को जनपद सहित बगल के बिहार राज्य के युवाओं का भी समर्थन प्राप्त होने लगा है। इस आंदोलन में इनके साथ मनोज विश्वकर्मा, प्रमोद रौनियार, बुंदल पांडेय, मनोज चौरसिया, आलोक, सिद्धार्थ कुशवाहा, आशुतोष उपाध्याय, रितिक शुक्ला, आलोक मिश्र, कृष्णा, प्रिंस, अमित सिंह, राहुल यादव, नवनीत तिवारी, रविशंकर पाठक, रवीकेश पाठक, राजन सोनी, विशाल मोदनवाल, शुभम प्रताप शाही, प्रदीप ओझा, प्रदीप गुप्ता, ध्रुवनारायण यादव आदि सहित सम्पूर्ण क्षेत्रवासियों के साथ-साथ जनपद और बिहार प्रान्त के बगहां का भी अपार जनसमर्थन प्राप्त है।

 

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