विलुप्त हो रहा है ढोल मंजीरा पर फाग गीत

कुशीनगर (मोहन राव): रंगों का पर्व होली आज पुरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। होली देश का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है और अपने आप में भारतीय संस्कृति को समेटे है। लेकिन आधुनिकता की खलल ने इस पर्व के पारंपरिक रिवाज को विलुप्त कर दिया है। ढोल मंजीरो पर फागुन माह में गाए जाने वाला फाग गीत विलुप्त हो रहा है वही उसकी जगह पर फूहड़ दो अर्थी गीत डीजे पर बज रहे हैं।

पुराने समय में यहां पर गांव मे बसंत पंचमी के दिन से ही पर्व शुरू हो जाता था। उस दिन ग्रामीण गाते-बजाते अपने-अपने सीवान में सम्मत गाड़ते थे और इस दिन से ढोल मंजीरा पर फाग गीत शुरू हो जाती थी। इन गीतों में श्रृंगार रस, हास्य रस, वियोग रस, भक्ति रस भरा होता था। रोजी के चक्कर में परदेश गए पिया के लिए भी इस गीत मे भरपूर जगह थी।

एक बिरहन जिसका पिया रोजी के लिए परदेस गया है वह फागुन महीने को बैरी कहती है तथा गीत के माध्यम से कहती है कि- — फगुनवा बैरी भयों मोर पिया परदेश गयो हो। गीत के माध्यम से यहां भी वियोग दिखाया जाता था कि किस तरह परदेश गए नायक की नायिका फागुन महीने में तड़पती है। वही कृष्ण और राम भक्ति शाखा के लिए भी फागुन में गीत गाए जाते थे। होली खेले रघुवीरा अवध में – – – राधा कृष्ण की होली का गीत भी श्रृंगार रस से सरोबार रहता था।

भारतीय संस्कृत में ऋतुओ का अलग-अलग महत्व है। इनमें वसंत ऋतु श्रेष्ठ माना जाता है। खेत खलिहान धानी रंग में सरोवर हो जाते हैं। पेड़ पौधे नए-नए पत्तों से सजे होते हैं मौसम सुहावनी होती है। ऐसी में बरसों से लोग इस पर्व का इंतजार करते हैं। लेकिन प्रकृति के इस खूबसूरत पर्व को आधुनिकता की दौड़ ने पारंपरिक गीतों को छीन लिया है।

वहीँ नयी पीढ़ी के लोग विलुप्त होते अपने परंपरागत पर्व को परंपरागत रूप में मनाने की बजाए आधुनिकता की हवा में बहकर मादक पदार्थों का सेवन डीजे पर फूहड़ गीतों के साथ नृत्य करना अपनी कड़ी में जोड़ लिए हैं। समय रहते अगर इन परंपराओं को प्राचीन रूप में पुनः पुनर्जीवित नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह परंपराएं सिर्फ कागज के पन्नों में ही रहेंगी और विलुप्त भी हो सकती हैं।