नहीं रहे प्रसिद्ध कथाकार बादशाह हुसैन रिजवी

गोरखपुर: अपनी कहानी संग्रह ‘टूटता हुआ भय’, ‘पीड़ा गनेसिया की’, ‘चार मेहराबों वाली दालान’ काफी चर्चा में रहे प्रसिद्ध कथाकार और जनवादी लेखक संघ गोरखपुर के अध्यक्ष बादशाह हुसैन रिज़वी नहीं रहे। 80 वर्षीय रिजवी काफी दिनों से बीमार चल रहे थे।

उनका अंतिम संस्कार उनके गाँव हल्लौर जिला सिद्धार्थनगर में किया गया।बादशाह हुसैन रिज़वी की कहानियाँ नयी कहानी आंदोलन से प्रभावित हैं। ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका में छपी उनकी कहानी ‘खोखली आवाजें’ काफी चर्चित हुई थी।

मूलतःजनपद सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज तहसील के हल्लौर कस्बे से जीवन शुरू करने वाले बादशाह हुसैन रिजवी ने 1958 में पूर्वोत्तर रेलवे के गोरखपुर स्थित लेखा विभाग में कार्यभार ग्रहण किया था। तब से उनका नाता गोरखपुर से बना रहा था। सामाजिक सरोकार व साहित्य से जुड़े भाई बादशाह हुसैन रिजवी जीवन भर अपने मित्रों के दुख से दुखी और उनके सुख में सुख की अनुभूति करते रहे।

वर्ष 1995 में रेलवे से रिटायर होने के बाद वह महानगर के जाफरा बाजार क्षेत्र में अपना मकान बना कर रहने लगे थे। एक साल से बीमार चल रहे बादशाह हुसैन रिजवी ने 80 वर्ष की उम्र में गोरखपुर के अपने आवास पर ही अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव हल्लौर में पूरे रीति रिवाज के साथ किया गया।वह अपने पीछे 5 पुत्र, 1 पुत्री और नाती-पोतों का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं।

बादशाह हुसैन रिजवी की कहानी संग्रह ‘टूटता हुआ भय’, ‘पीड़ा गनेसिया की’, ‘चार मेहराबों वाली दालान’ काफी चर्चा में रहे। उनका उपन्यास ‘मैं मोहाजिर नहीं हूँ’ पाठकों में लोकप्रिय हुआ था। उनके निधन की सूचना पाकर स्तब्ध साहित्य अकादमी, दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ तिवारी ने अफसोस जताते हुए कहा कि मेरे लिए यह सूचना स्तब्ध करने वाली है।‘‘मैं अभी दिल्ली में हूं। उनके निधन पर गहरा शोक प्रकट करता हूं। वह हम लोगों की पीढ़ी के बेहद विनम्र लेखक थे। बड़े अच्छे कहानीकार थे। उनकी कहानियां दिल को छू लेने वाली थीं।

आज के लेखकों में आक्रोश बहुत दिखता है मगर बादशाह रिजवी शुरू से विनम्र लेखक थे। हम लोगों के समय जितनी भी साहित्यिक गोष्ठियां या आयोजन होते थे, उनमें वह जरूर शामिल रहते थे। उनका एक उपन्यास भी आया था।’’जनवादी लेखक संघ बादशाह हुसैन रिज़वी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए अपनी भाव-भीनी श्रद्धान्जलि अर्पित किया है।

रिजवी के निधन की खबर के बाद गोरखपुर के साहित्यजगत में शोक की लहर है। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय संगठन सचिव अशोक चौधरी, वरिष्ठ साहित्यकार रामदेव शुक्ल, कवयित्री अनिता अग्रवाल, अनिल राय, हर्ष कुमार सिन्हा ने शोक वक्त किया।

प्रोफेसर केसी लाल ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि हिंदी -उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार बादशाह हुसैन रिजवी हिंदी -उर्दू के ऐसे सेतु थे जिसको सबका प्यार हासिल था। वे बेहद खुशमिजाज और आत्मीयता से भरे इंसान थे। उनकी सहजता, रहमदिली बेमिसाल थी।

“टूटता हुआ भय”, पीड़ा गनेसिया की “,”चार मेहराबों वाली दालान” उनके उल्लेखनीय कहानी संग्रह हैं। वे प्रेमचंद की कथा परम्परा के कथाकार थे किसानों मजदूरों की जिंदगी से उनका गहरा नाता था। प्रगतिशील सोच के धनी बादशाह भाई सबके बीच लोकप्रिय थे। उनकी दिवंगत आत्मा को ईश्वर चिर शांति प्रदान करें।

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