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बुलंदशहर घटना: गोरखपुर के युवा कवि प्रभात ने कविता के माध्यम से तथाकथित सेक्युलरों पर किया जबरदस्त कटाक्ष

image-for-representation-2गोरखपुर: बुलंदशहर की दर्दनाक घटना ने भले ही साहित्यकारों को अवार्ड वापस करने के लिए पर्याप्त न लगता हो या फिर इस ह्रदय विदारक घटना ने राजनीतिज्ञों को आपसी छीटा कशीं का एक और मौका भले ही दे दिया हो लेकिन इस घटना ने कुछ लोगो को अंदर तक झकझोर के रख दिया है।
ऐसे ही एक शख्स हैं गोरखपुर के प्रभात त्रिपाठी। पेशे से अध्यापक प्रभात ने इस कविता में न केवल बुलन्दशहर के पीड़ितों की मनोदशा बयान की है बल्कि उन्होंने सभी तथाकथित सेक्युलर लोगों पर भी जबरदस्त कटाक्ष किया है।
पढ़े उनकी कविता को
साहित्यकारों की काली स्याही..
कलम खामोश हैं
वापस क्यू तमगे नही हुए
खून खराबा नही सही
वाणी से क्यू दंगे नही हुए
माँ बेटी के सपनों का कोई अधिकार नही है क्या
फिर कहाँ खो गयी वो चौरस अब ये वॉर नही है क्या
बस चुनते हो तुम राजनीति
और दोष कलम पर आती है
कुछ चम्मच के कारण
तीखी स्याही भी मिट जाती है
क्या इतना लुटने पर वो भिखमंगे नही हुए
कलम खामोश है…
उस पिता, भाई के नूर का क्या
उस राखी और सिन्दूर का क्या
जब तार हुई सडकों पर गरिमा
फिर शासन हो मशहूर तो क्या
प्रभात कितना मौन बने
जब कोई संगे नही हुए
कलम खामोश है…
नाम बुलंद से क्या होता
कायरता रग रग फैली थी
दामन साफ़ कहे कैसे
जब मन की दुनिया मैली थी
अब ख्वाब सजाने क्यू सतरंगे नही हुए
वापस क्यू तमगे नही हुए।
प्रभात गोरखपुरी
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