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अपना गोरखपुर: चकाचौंध से दूर एक NGO संवार रहा है झुग्गी-झोपडी में रहने वाले बच्चों का भविष्य

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: आज से लगभग चार वर्ष पूर्व महानगर के एक NGO ‘अपना गोरखपुर’ ने शिक्षा के माध्यम से गरीब, झुग्गी-झोपडी में रहने वाले बच्चों का भविष्य संवारने का प्रण लिया था। संस्था के अध्यक्ष नितिन जायसवाल को तब बहुत बड़े परिणाम की उम्मीद भी नहीं थी। अगर कुछ था तो बस मन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना और कीचड़, गंदगियों में पलते और बिखरते बचपन को शिक्षा दिलाने की एक धुन।

उनकी यही धुन आज चार साल बाद रंग बिखेरती नजर आ रही है। महानगर के कुछ मोहल्लों में सक्रिय इस NGO के ही सार्थक मेहनत का परिणाम है कि आज हजारीपुर प्राचीन जैसे क्षेत्र में स्कूल जाने वालों बच्चों की संख्या में जबरदस्त रूप से इजाफा हुआ है। नितिन बताते हैं कि कुछ दिनों पहले उनके पास प्राथमिक विद्यालय हजारीपुर प्राचीन से एक नयी शिक्षिका का फ़ोन आया। टीचर ने बताया कि उन्हें सरकार की तरफ उन 40 बच्चों की लिस्ट को तैयार करनी है जो या तो विद्यालय जाते ही नहीं हैं या फिर उन्होंने विद्यालय छोड़ दिया हो।

नितिन का कहना था कि उनकी खुशी का तब कोई पारावार नहीं रहा जब वो और शिक्षिका मिलकर इन सारे जगहों पर घूमे। लेकिन उन्हें बमुश्किल 10-15 बच्चे ही ऐसे मिल पाएं जो या तो स्कूल नहीं जा रहे हैं या जाना छोड़ दिया है।

हमारे यह पूछने पर की इस काम की शुरुआत करने की कैसे सोची पर नितिन बताने लगे कि एक दिन महानगर के सुमेर सागर के पोखरे के पास अपनी बाइक बनवाते समय कुछ बच्चों को नाली में बैठकर पानी भरते और पीते हुए देखा, तो वो चौंक गए। उन्हें यकीन नहीं हुआ कि वो महानगर के मुख्य बाज़ार में खड़े होकर ये दृश्य देख रहे हैं। उत्सुकतावश उन्होंने इन बच्चों के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि पोखरे जो कि काफी हद तक मिट्टी से पट चुके हैं, उसमे पचासों परिवार झोपड़ी में रहते हैं।

नितिन के अनुसार ये सभी परिवार सड़कों से कूड़ा बिन कर अपना गुजारा करते हैं। जब उनके बीच जाकर और पता किया तो ये मालूम हुआ कि इनके बच्चे भी उनके इस काम में मदद करते हैं, और शिक्षा से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। नितिन ने तब वहां के बच्चों को पढ़ाने की और इन लोगों को समाज के मुख्य धारा में लाने की ठान ली। प्रयास शुरू हुआ। उद्देश्य और लक्ष्य बहुत छोटा सा रखा। नितिन ने सोचा कि अगर अपना गोरखपुर एक भी बच्चे या परिवार की जिंदगी में कोई परिवर्तन ला सका तो उनका जीवन सार्थक हो जायेगा।

नितिन आगे बताते हैं कि जोश तो बहुत था कुछ कर गुजरने का। लेकिन आने वाली समस्याओं का अंदाजा नहीं था। पहली समस्या यह आयी कि इन बच्चों को कहाँ पढाया जाए। स्कूल कहाँ बनाया जाये। दूसरी यह कि इन परिवारों को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिये कैसे राजी किया जाए। क्योंकि यह लोग अपने बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहते थें। उसका बड़ा कारण यह था कि वो सभी बच्चे अपने परिवार के लिए एक अर्निंग मेंबर थे। सभी बच्चे कूड़ा बिन कर अपने-अपने परिवार के व्यवसाय में मदद करते थें।

लेकिन वो कहावत है ना ‘जहाँ चाह, वहां राह।’ नितिन बताते हैं कि दोनों समस्याओं का समाधान निकला। नए तरह के स्कूल का कांसेप्ट निकाला। मात्र 100 रुपये वाला स्कूल। उसी जगह एक टूटी-फूटी झोपडी को ठीक करके उसी में पढ़ाने की शुरुआत हुई। बांस पर ABCD, क,ख, ग,घ आदि चार्ट लगाकर एक सबसे सस्ते स्कूल की शुरुआत की। फिर लैपटॉप लगाकर स्मार्ट क्लास की तर्ज पर पढ़ाना शुरू किया। नितिन कहते हैं कि पहले 1-2 बच्चे ही बहुत मुश्किल से मिले। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढती गयी।

ऐसा नहीं था कि नितिन के लिए यह सब कुछ करना आसान था। नितिन बताते हैं कि समस्या आती रही और गुस्सा भी आता था। क्योंकि उनके वहां से चले आने के बाद बच्चों के घर वाले उन्हें पढने के लिये नहीं भेजते थें। वो कहते हैं कि रोज 30-45 मिनट तो सिर्फ इन बच्चों को घर से निकलने में लगता था।

नितिन ने इस समस्या का भी समाधान निकला। वो कहते हैं कि बच्चों को स्कूल की तरफ आकर्षित करने के लिये कुछ समयांतराल पर कुछ ना कुछ खाने पीने की सामग्री देनी शुरू की। कॉपी-किताब बांटना शुरू किया। यह काम केवल अपने पैसे से करना आसान नहीं था। नितिन ने फिर दूसरों से सहयोग लेना भी शुरू किया। बच्चों का मन लगा रहे इसलिए पढाई के साथ-साथ खेल-कूद भी शुरू हुआ।

नितिन बताते हैं कि एक जगह सफलता मिलने पर आस-पास के अन्य इलाके जैसे तरंग चौक के आस-पास, पुर्दिलपुर, बक्सीपुर, जुबिली रोड, धर्मशाला के गरीब बच्चों को भी यहाँ बुलाने लगा। इनमे अधिकतर बांसफ़ोड़वे, फल-सब्जी आदि के विक्रेता के बच्चे थें। कई बच्चे तो ऐसे भी थें जिनके पिता नहीं थें और माँ घरों में बर्तन मांज कर घर चला रही थी।

नितिन ने हमें बतया कि उन्हें इस काम में 65 वर्षीय श्रीनारायण मालवीय ने कुछ महीने सहयोग दिया। उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बहुत बढने लगी तो उन्हें लगा कि अब ऐसे इन बच्चों का काम नहीं चलेगा। ऐसे तो बच्चे नहीं सीख पायेंगे। उन्होंने सोचा कि क्यों ना RTE एक्ट के तहत इन बच्चों का एडमिशन प्राइवेट स्कूलों में करवा दें। इसके लिये वो सर्व शिक्षा अभियान के संयोजक और नगर शिक्षा अधिकारियों से मिला और उन लोगों ने बहुत ही पॉजिटिव रिस्पांस दिया। असली समस्या तब आयी जब इन परिवारों से उनके आवश्यक डॉक्यूमेंट मांगे गए। कोई भी परिवार सारे डाक्यूमेंट्स उपलब्ध नहीं करा सका। उसको बनवाने में उन लोगों को बहुत वक्त लगता।

नितिन का कहना था कि ऐस में उन्हें किसी ने पूर्व प्राथमिक विद्यालय, हजारिपुर प्राचीन के बारे में बताया। वहां उन्होंने जाकर देखा तो पाया कि विद्यालय तो बड़ा है लेकिन बच्चे बहुत कम। उन्होंने तुरंत वहां के एक शिक्षक से बात की। टीचर ने सहर्ष बच्चों का एडमिशन विद्यालय में ले लिया। नितिन आगे कहते हैं कि उसके बाद बड़ी प्रॉब्लम यह सामने आयी कि कोई भी स्कूल में भी सिर्फ उन्ही से पढना चाहता था। उन्होंने स्कूल जाना बंद कर दिया। जब उन्हें इस बात की जानकारी स्कूल के शिक्षकों के माध्यम से हुई तो उन्होंने वहां भी जाकर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

नितिन कहते हैं कि इन बच्चों को किसी भी तरह स्कूल भेजने के लिए उन्होंने धीरे-धीरे समाज से भी मदद लेनी शुरू की। उन्होंने अब ना केवल इस विद्यालय बल्कि शहर के हर प्राथमिक विद्यालय की तरफ आमजन और सरकारी अधिकारियों , राजनीतिज्ञों का ध्यानाकर्षित करना शुरू किया। इन सभी लोगों को उन्होंने विद्यालय के कार्यक्रम में बुलाना शुरू किया।

नितिन कहते हैं कि आज महानगर में ‘अपना गोरखपुर’ के अभियान से प्रेरित होकर कुछ और लोग भी इसी तर्ज पर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बच्चों को मन स्कूल में लगा रहे इसके लिये नितिन ने अपने दोस्तों और सोशल मीडिया के माध्यम से अन्य लोगों से अपील किया की वो लोग यदि हो सके तो अपने बच्चों का जन्मदिन इन स्कूलों में मनाये। इससे उनके बच्चे भी समाज के लिये जिम्मेदार बनेंगे और गरीब बच्चों को खाने-पीने का सामन भी मिला।

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