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बांसगांव का दुर्गा मंदिर, जहाँ 12 दिन के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक करते है अपने खून से माँ को तिलक

bansgaonगोरखपुर: अभी तक तो नवरात्री पर्व पर आपने माँ दुर्गा को चढ़ावा में पशु बलि देते देखा होगा। किन्तु पूर्वांचल का एक उपनगर बांसगांव, जहाँ के श्रीनेत वंशी राजपूत नवरात्री पर्व के नवमी के दिन अपने शरीर से रक्त निकाल कर माँ को समर्पित करते है।
रक्त की बलि, बरसो की परम्परा, सदियों की मान्यता, छोटा मासूम बच्चा हो या फिर कोई वृद्ध सभी के अंगो से बहते रक्त की माता को चढ़ती है बलि। आँखों के पलकों से बहते, लहू के लहर को जरा गौर से देखिये माथे पर से, हाथो पर से, पैरो पर से बहते रक्त प्रवाह को देख कर आप भयभीत मत होइए। क्योकि ये रक्त इनकी मर्जी से माँ के चरणों में अर्पित करने के लिए बहाए जा रहे है।
जी हां सुन कर अजीब तो लग रहा होगा, ये कैसी परम्परा की एक मासूम के माथे से इतना खून, ये नजारा गोरखपुर के बांसगांव के दुर्गा मंदिर का है। जहा माँ दुर्गा को खून की बलि दी जा रही है। चाहे वो बच्चा हो या बड़ा बुजुर्ग सभी के अंगों से खून माता को चढ़ाया जाता है।
bansgaon-212 दिन का नवजात शिशु हो या फिर कोई बड़ा बुजुर्ग। बच्चो के अंगों से एक बार और बडो के शरीर से नौ जगह से खून निकाल कर माँ दुर्गा को खून की बलि चढाते है।
हर साल नवरात्रि में नवमी के दिन यहाँ लोगो का हुजूम उमड़ पड़ता है। इस गांव के हर एक श्रीनेत राजपूत परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अंगों से खून की बलि माँ दुर्गा को अर्पित करता है।
मंदिर पर अपने रक्त को माँ के चरणों में समर्पित करते अनूप कुमार (भक्त) ने बताया कि इनके इस भक्ति से माँ दुर्गा इनके व इनके परिवार के ऊपर हमेशा ही अपना आशीर्वाद बनाये रखती है। लोगो के शरीर से किस तरह से खून की धार बह रही है ।लेकिन ये लोग माँ दुर्गा के भक्ति में इतने लीन है कि इनको इस रक्त का कोई परवाह नहीं।
bansgaon-1इनकी ये भी धारणा है कि इस रक्त को निकालने के बाद ये इस रक्त को पीपल के पत्ते से पोछ कर उस पर माँ दुर्गा के हवन का भभूत लगाते है और रक्त का बहन बंद हो जाता है।
उस्तरे से रक्त निकालने में कितना भी गहरा से गहरा घाव हो, ये श्रद्धा ही है कि ये घाव दो दिन में ही ठीक हो जाता है। कुछ लोगों के तो शरीर से इतना रक्त निकलता है कि उनके पुरे शरीर पर लाल रक्त ही दिखाई देती है। यहाँ के भक्तो की माने तो ये दो सौ साल पुरानी मान्यता है।
यहाँ आये बुजुर्गों ने बताया कि आरम्भ में यहाँ पशुओं की बलि दी जाती थी, सैकडो के तादाद में भैसे कटते थे। जिसका हमारे आदि पूर्वजो ने विरोध किया। तब से हमने स्व रक्त से माता के अभिषेक की परम्परा की नीव डाली।
सदियों से चलने वाली इस परम्परा में क्या बच्चे क्या बूढ़े, सभी एक ही रंग में रंग जाते है। एक मासूम बच्चा जिसने अभी दुनिया को ठीक ढंग से देखा भी नहीं उसे भी सदियों की परम्पराओं के चंगुल में फसना पड़ता है। इन मासूम बच्चो को भले ही इस परम्परा के बारे में कुछ नहीं मालुम, बस इतना मालूम है कि खून की बलि देनी है, सो देनी है।
bansgaon-3और जो माँ बाप अपने बेटे के आँखों में कभी आंसू भी नहीं देख सकते, आज वो अपने बेटे के माथे से खून की धार देख खुश होते है। क्योकि इससे उनकी सदियों की परम्परा कायम रहती है।
इस तरह की भक्ति शायद ही कही देखने को मिलती है। इस गांव का रहने वाले कोई कही भी रहे, लेकिन आज के दिन माता की भक्ति उन्हें अपने पैतृक भूमि पर माँ की चरणों में खीच ही लाती है। खून की ये प्रथा अनोखी ही नहीं अविश्वसनीय भी है। 12 दिन के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक के अंगों से खून निकाल कर माता को चढाई जाती है।
अब इसे आस्था कहे या, अंधविश्वास लेकिन इनके लिए ये इनकी आस्था और परम्परा है।

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