फाइनल रिपोर्ट स्पेशल

तो क्या विश्वविद्यालय में टॉपर गैंग कर रहा हैं काम, क्या है डॉ नीलम पांडेय के आरोपो की सच्चाई?

neelam-pandeyगोरखपुर: चौंकना लाजमी है,क्योंकि जब विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक महाविद्यालय की प्राचार्य इस तरह के आरोप लगा रही हो, तो कुछ न कुछ दाल में काला है।
बात कर रहे है दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से सम्बद्ध देवरिया के अमवा सोहनारिया स्थित रेशमा देवी स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्या डॉ नीलम पांडेय की। जिन्हें विगत 25 सितम्बर 2016 को बीए स्नातक टॉपर शिवांगी पाण्डेय उर्फ़ नीलम पाण्डेय पुत्री रामकृपाल पाण्डेय प्रकरण में महज एक समाचार पत्र की खबर पर कार्यवाही करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निलंबित कर दिया गया और जाँच कमेटी की संस्तुति कर दी गयी।
अब बात करें निलंबित प्राचार्या के आरोपों की तो उन्होंने सीधे-सीधे विश्वविद्यालय प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि घटना की जड़ आरोपी छात्रा शिवांगी पांडेय को तीन साल तक पढ़ाने वाली शिक्षिका व परीक्षा लेने वाली सम्बन्धित विभागाध्यक्षा ने पहले क्यों नही बताया कि पंजीकृत छात्रा का नाम गलत है या दूसरे के नाम का प्रयोग कर रही है। उन्होंने कई सवाल उठाये।
पहला क्या इस मामले में उन लोगों की संलिप्तता नही है?
दूसरा प्रश्न कि परीक्षा के दौरान कक्ष परिप्रेक्षक किस आधार पर जाँच और फोटो मिलान किये थे उन लोगो को क्यों नही निलंबित किया गया?
तीसरा प्रश्न परीक्षा की सूचिता बनाये रखने के लिए विवि प्रशासन द्वारा लगाये गए 3-3 उड़ाका दलों ने क्यों नही इसकी रिपोर्ट किया?
चौथा प्रश्न परीक्षा नियंत्रक के अनुसार अगर टॉपर शिवांगी का सत्यापन 3 अक्टूबर को नही हो पाया तो क्यों नही उसके मेडल को निरस्त करने की संस्तुति की गयी?
उन्होंने एक स्थानीय मीडियाकर्मी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बिना जाँच सिमित की रिपोर्ट आये किस आधार पर इस मामले को आपराधिक साबित करते हुए समाचार प्रकाशित किये। इस प्रकरण में सबसे अहम प्रश्न कि क्या उक्त रिपोर्टर द्वारा किस आधार पर केवल वर्ष 2015 -2016 के ही टॉपर का मामला उछाला जा रहा है, जबकि इसी तरह के प्रकरण की जाँच वर्ष 2014-2015 सत्र की टॉपर श्वेता उर्फ़ शालिनी शाही मामले की भी विचाराधीन है,जो उक्त रिपोर्टर के संज्ञान में है।
उन्होंने कुलपति को सवालिया कटघरे में लेते हुए कहा कि कुलपति ये बताएं कि जाँच का विषय क्या है, इन दोनों वर्षो के गोल्डमेडलिस्ट की जब जाँच चल रही है तो समाचार पत्र की खबरों का आधार क्या है और विश्वविद्यालय प्रशासन इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों साधे है। क्या इस प्रकार विश्वविद्यालय प्रशासन खुद कटघरे में नही खड़ा हो रहा है?
उन्होंने उक्त रिपोर्टर का हवाला देते हुए कहा कि उसने मुझे फोन पर धमकी दिया कि आपको जेल भेजवा दूंगा या फिर ख़ुदकुशी करने पर मजबूर कर दूंगा। यदि उनके पास पर्याप्त साक्ष्य है तो क्यों नही मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा रहे।

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