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कुशीनगर पुलिस नहीं मनाती जन्माष्टमी, पुलिसकर्मी नहीं भूल पाएं हैं 1994 के उस दर्दनाक हादसे को

कुशीनगर: भगवान कृष्ण का जन्म बंदी गृह में होने के कारण जहां पूरे प्रदेश के थानों में कृष्ण जन्माष्टमी बड़े धूम धाम से मनाई जाती है वहीँ कुशीनगर जनपद के थानों के लिये जन्माष्टमी का दिन मनहूस है।

21 साल पूर्व इसी अष्टमी की काली रात को कुबेरस्थान थाने के पचरूखिया घाट पर जंगल पार्टी के डकैतों से मुठभेड़ में दो इंस्पेक्टर सहित पांच पुलिसकर्मी शहीद हुए थे। तभी से जन्माष्टमी को कुशीनगर की पुलिस मनहूस मानती है और किसी थाने और पुलिस लाईन में जन्माष्टमी नहीं मनाई जाती है। एक साथ सात पुलिस जवानों के शहीद होने का दर्द आज भी जनपद पुलिस के चेहरे पर चस्पा है…।

बता दें कि देवरिया जनपद से अलग होकर कुशीनगर जनपद के अस्तित्व में आने के बाद सरकारी महकमों में जश्न का माहौल था। 1994 में पुलिस महकमा पहली जन्माष्टमी पडरौना कोतवाली में बड़े धूमधाम से मनाने में लगा था। जहां पुलिस के बड़े अधिकारियों के साथ ही सभी थानों के थानेदार और पुलिस कर्मी मौजूद थे। किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक ही घटना ने पूरे जश्न पर पानी तो फेरा ही साथ ही कुशीनगर पुलिस के लिये जन्माष्टी के त्यौहार को हमेशा के लिये खत्म कर दिया।

दरअसल पुलिस को कुबेरस्थान थाने के पचरूखिया घाट के पास उस समय के आतंक पर्याय बन चुके जंगल पार्टी के आधा दर्जन डकैतों के ठहरने और किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए योजना बनाने की सूचना मिली। इस सूचना पर आलाधिकारियों के निर्देश पर कुबेरस्थान थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेन्द्र यादव और उस समय के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट तरयासुजान थाने के एसओ अनिल पाण्डेय आठ पुलिस के जवानों के साथ पचरूखिया घाट के लिये रवाना हो गये। उस समय नदी को पार करने के लिये कोई पुल नहीं था नाव ही एक मात्र साधन था।

पुलिस ने एक प्राईवेट नाव की सहायता से बांसी नदी को पार कर डकैतों के छिपने की जगह पर पहुंची तो शायद किसी अंदर के व्यक्ति के खबर देने के कारण डकैत वहां से फरार हो कर नदी के किनारे छिप गये। सघन तलाशी के बाद पुलिस टीम फिर से नाव के सहारे नदी पार कर ही रही थी। नाव जैसे ही नदी की बीच धारा में पहुंची तभी डकैतों ने पुलिस पर अंधाधुध फायर झोंक दिया।

पुलिस ने जवाबी फायरिंग किया लेकिन इस बीच नाविक को गोली लगने से नाव बेकाबू हो गयी और नदीं में पलट गयी। नाव पर सवार सभी 11 लोग नदी में डूबने लगे। डूब रहे लोगों में से तीन पुलिसकर्मी तो तैर कर बाहर आ गये लेकिन दो इंस्पेक्टर, सहित पांच पुलिसकर्मी और नाविक शहीद हो गये।
इस घटना के बाद कुशीनगर पुलिस के लिये जन्माष्टमी अभिशप्त हो गया। इस दर्दनाक घटना की कसक आज भी पुलिसकर्मियों के जेहन में है जिसके कारण किसी थाने और पुलिस लाईन में जन्माष्टमी नही मनाई जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश्वर पाण्डेय भी उस घटना को याद करके सिहर जाते हैं। उनका कहना है कि चूंकि जिला सृजन होने के बाद पहली जन्माष्टमी थी इस लिये पडरौना कोतवाली में बहुत भव्य आयोजन था और जिले सभी प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौजूद थे लेकिन एकाएक पांच पुलिसकर्मियों की मुठभेड़ में मौत की सूचना से हम सभी का हृदय द्रवित हो गया था। तब से लेकर आज तक जन्माष्टमी की वो खौफनाक घटना अपने आप याद आ जाती है।

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