फाइनल रिपोर्ट स्पेशल

इंसान बिकता है बोलो खरीदोगे! मजदूर दिवस पर खास

Image-for-representation-5गोरखपुर: कहने को तो इंसान आज़ाद है और हो भी क्यों न, जब इस देश का संविधान उन्हें आज़ादी का अधिकार दिया हुआ है किन्तु ये सब बातें महज किताबों या भाषणों में अच्छी लगती है। जी हां बात कर रहे है इन्सानो की मंडी की जहां हर रोज लगाई जाती है जीते जागते इन्सानो की बोली। जहा हर दिन अपनी मर्जी से या यूँ कहे की अपने और आश्रितों के पापी पेट को भरने के लिए मज़बूरी के कारण इस बाजार में बिकने के लिए आते है, देखिये और गौर कीजिये वर्ल्ड लेबर डे पर फाइनल रिपोर्ट की खास रपट …………….
बाजार और बाजारों में बिकने वाले सामानो को उसे मोल भाव कर खरीदारी करते हुए लोगो को आपने बहुत देखा और सुना होगा, लेकिन आज हम आपको जिंदगी की एक ऐसी मंडी दिखाने जा रहे है, जिसे आपने पहले कभी नहीं देखा होगा, एक ऐसा बाजार जहा बिकने वाले भी इन्सान है, और खरीदने वाले भी इन्सान, जी हां बस फर्क सिर्फ इतना है, की खरीदने वाले एक दिन के लिए मालिक बन जाते है, और बिकने वाला एक दिन के लिए मजदूर।
आज जहाँ पूरा देश मजदुर दिवस मना रहा है, और आज के दिन मजदुरो के लिए कुछ शब्द कहता है, खास कर ये सफेदपोश नेता जो आज के दिन किसी कार्यक्रम या जलसे में खड़े होकर इन मजदूरो के लिए कुछ शब्द कह कर इनके इस मज़बूरी का मजाक उड़ा कर चलते बनते है। लेकिन इन मजदुरो की सुध लेने वाला कोई नहीं है, अब ऐसे में ये हर रोज बिकने को मजबूर रहते है |
ये वाकया किसी एक शहर कस्बे का नही बल्कि पुरे देश में रोज ब रोज देखने को मिलता है।ऐसी ही कुछ मण्डियां अपने महानगर में भी है मसलन मोहद्दीपुर, नंदानगर, चरगावां,फलमंडी आदि |ये मज़दूर यूँ कहें राजनीतिज्ञों का वोटबैंक जिनके लिए सरकारें कुछ न कुछ नए नियम कानून बनती है किन्तु यथार्थ के धरातल पर इसे लागु करने और करवाने में उनके पसीने छूट जाते है। यहां तक कि सरकार ने इनके लिए बाकायदा एक विभाग भी बना रखा है वाबजूद इसके स्थितियां जस की तस हैं।
आज मजदूर दिवस पर की गयी पड़ताल में महेवा मण्डी में जब एक मजदूर प्रहलाद से मण्डी में आने और लेबर डे के बारे में पूछा गया तो कहा कि बाबू ये सरकारों के चोचलें है जब लोगो को वोट लेना होता है तो बहुत कुछ वादा करते है और नियम कानून की बात करते है लेकिन बाद में कोई नही पूछने आता है। क्या करें रोज इसी तरह घर से निकलते है दो वक्त की रोटी की तलाश में, और जितने में बोली तय हो जाती है, चले जाते है, और पुरे दिन काम कर शाम को घर लौटते है, फिर अगले दिन के लिए बिकने के लिए बाजारों का रुख कर लेते है।
ये केवल एक प्रह्लाद या रामकृपाल की कहानी नही है बल्कि हज़ारो कृपाल आज भी गुलामी की इबारत बने जिंदगी का फलसफा पढ़ रहे है। अब ऐसे में जरूरत है, आज क दिन इन मजदूरो के लिए कुछ करने की ताकि ये बाजारों में ऐसे बिकने को मजबूर न हो सके.
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