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बिस्मिल की जमीन पर है भूमाफियाओं की नज़र; पत्रकार श्यामानंद श्रीवास्तव सम्भाल रहें हैं धरोहर

Shyamanad-Srivastava-and-Bismil-statuteगोरखपुर: जब पूर्वांचल में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की लहर चल पड़ी तो पूर्वांचल की महत्वपूर्ण सैन्य छावनी गोरखपुर में भी क्रान्तिकारियो का जत्था चोरी छिपे अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए इकट्ठा होता था। जिसे स्टेशन के समीप रहने वाले निचलौल के व्यापारी व जमींदार रामनाथ साहू अंदरुनी तौर पर साजो सामान मुहैया कराते थे।
फौजी छावनी गोरखपुर रेलवे स्टेशन के समीप की तकरीबन सारी 13 एकड़ 63 डिसमिल जमीन इन्ही के नाम पर थी। जिसे अंग्रेजों ने इनपर देशद्रोहियों का साथ देने का आरोप लगाकर जब्त कर लिया था और वे सपरिवार वापस निचलौल चले गए।
Bismilबाद में इस जमीन पर सिविल कोर्ट गोरखपुर में 1880 में मालिकाना हक के लिए वाद दायर हुआ। जिसमे यूनाइटेड प्रोविन्स सरकार अपनी जमीन बताकर मुकदमा लड़ती रही। जिसे बाद के दिनों में 1980 के दशक में जनपद के कई धनाढ्यों व रसूखदारों ने प्रशासनिक खानापूर्ति करके लीज पर ले लिया। जिसमे सिविल लाइन्स स्थित बिस्मिल भवन और आसपास की लगभग दश एकड़ जमीन को लेकर काफी विवाद रहा।
इसमें बिस्मिल भवन के पास की भूमि को वर्ष 2005-2006 में अपने जिलाधिकारी कार्यकाल में तत्कालीन डीएम डॉ हरिओम ने अपने कालेज जे एन यू के सहपाठी के पति सय्यद सिद्दीक हसन को लीज पर देते हुए फ्रीहोल्ड कर दिया था।जिसमे बढ़ रहे विवाद को देखते हुए तत्कालीन कमिश्नर पी के मोहंती ने अग्रिम आदेशों तक रोक लगा दिया। आज भी उक्त जमीन पर वाद चल रहा है।
Bismil-1एक नज़र इतिहास पर
पं राम प्रसाद बिस्मिल के नाम पर बिस्मिल भवन है। सिविल लाइन में बिस्मिल पार्क के निकट स्थित यह भवन कभी क्रांतिकारियों की आरामगाह हुआ करती थी। यहां अंग्रेजों का भी ठिकाना रहा। करीब 51 वर्षों से यहां पर वरिष्ठ पत्रकार श्यामानंद श्रीवास्तव साप्ताहिक अखबार बिस्मिल निकाल रहे है।
उन्होंने बताया कि बिस्मिल भवन से सटे रामनाथ साहू का खपडै़ल का घर था। वह आजादी के मतवालों के लिए मदद किया करते थे। वहां पर कई आजादी के दीवानें आते थे। अंग्रेजों को जब इसकी खबर हुई तो उन्होंने मकान ढा दिया। बाद में साहू निचलौल चले गये।
Bismil-newspaperश्री श्यामानंद ने बताया बिस्मिल भवन आजादी के मतवालों का गवाह है। यहां पर चन्द्र शेखर आजाद, पं. राम प्रसाद बिस्मिल की छोटी बहन शास़्त्री देवी, उनके भांजे हरिश्चन्द्र, रामकृष्ण खन्ना, योगेशचन्द्र चटर्जी आदि यहां पर ठहर चुके हैं।
उन्होंने बताया कि 19 दिसम्बर 1963 को बिस्मिल भवन में पुस्तकालय स्थापित किया। जहां तमाम तरह के साहित्य हर विषय में मौजूद हैं इसके साथ ही क्रांतिकारियों की दुर्लभ तस्वीरें आकर्षण का केंद्र है। क्रांतिकारियों का वतन के लोगों को दिया गया पैगाम, क्रांतिकारियों के युवा अवस्था से अंतिम यात्रा तक , प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख लीडर आदि की तस्वीरें मौजूद है। यह संग्रह दुर्लभ है।
इन्हें पं. रामप्रसाद बिस्मिल के शहादत दिवस पर लोगों के दर्शन के लिए लगाया जाता है। उन्होंने बताया कि चाचा लल्लन क्रांतिकारियों मूवमेंटों को सपोर्ट करते थे। उन्हीं की प्रेरणा से मेरे अंदर क्रंातिकारियों के प्रति असीम श्रद्धा का भाव जाग्रत हुआ।
1963 में बिस्मिल साप्ताहिक समाचार पत्र निकालना शुरू किया जो आज भी अपने उसी अंदाज से निकल रहा है। इन्हें सच लिखने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। कई बार इन्हें जिंदा जलाने की नाकाम कोशिशें की गयी। प्रेस को जलाने का प्रयास किया गया। लेकिन यह अपने मिशन पर कायम रहे और आज भी है।
गोरखपुर में क्रांतिकारियों के आमद रफ्त के बारे में बताया कि मूलतः कोलकाता के रहने वाले हरि नाथ सन्याल आजादी के लिए जीवन पर्यतन लगे रहे। अपने चार पुत्रों शचीन्द्र नाथ, रविन्द्र नाथ, जीतेन्द्र नाथ, भूपेन्द्र नाथ सन्याल को भारत भूमि को समर्पित कर दिया। कोलकाता की अनुशीलन समिति जो क्रंातिकारी आंदोलनों को संचालित करती थी। उसके सुपुर्द अपने चारों लड़कों को कर दिया।
उसी की एक शाखा वाराणसी में खुली। यहीं पर यह क्रांतिकारी बंगाली परिवारों में रहते थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद शचीन्द्र नाथ का सम्पर्क भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों से हो गया। इसी परिवार के सारे भाई गोरखपुर आ गये। कैंट थाना के बगल में निवास स्थान बनाया। इस तरह क्रांतिकारियों का आना जाना शुरू हुआ। देश के क्रांतिकारी यहां आकर जुटते थे। पं. रामप्रसाद बिस्मिल का यहां आना जाना लगा रहता था। चूंकि तराई का क्षेत्र था और पड़ोस मंे नेपाल था।
इसलिए गोरखपुर क्रांतिकारियों के लिए महफूज स्थान बन गया। मैनपुरी षड़यंत्र में जब पं. रामप्रसाद बिस्मिल का नाम आया तो वह गोरखपुर में भी आये। इस तरह पं. रामप्रसाद बिस्मिल का ताल्लुक गोरखपुर से हुआ।
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