फाइनल रिपोर्ट स्पेशल

हरिशंकर तिवारी: 81 के हुए पूर्वांचल की राजनीति के एक ध्रुव, आज भी है युवाओं से ज्यादा रसूख

राकेश मिश्रा/अरविन्द श्रीवास्तव
गोरखपुर: पंडित हरिशंकर तिवारी केवल पूर्वांचल ही नहीं बल्कि उत्तरी भारत में एक जाना पहचाना नाम है। यदि आप इस क्षेत्र के हैं तो आप पंडित हरिशंकर तिवारी से प्यार कर सकते हैं, नफरत कर सकते हैं, लेकिन इग्नोर नहीं कर सकते। पूर्वांचल में उम्र के इस पड़ाव में शायद ही किसी राजनीतिज्ञ का इतना जलवा होगा जितना चिल्लूपार के पूर्व विधायक हरिशंकर तिवारी का है। क्षेत्र के ब्राह्मण राजनीति के सिरमौर हरिशंकर तिवारी आज भी युवाओं के चहेते हैं।

80 के दशक में देश में जेल के सींखचों के भीतर से चुनाव जीतकर रिकार्ड बनाने वाले पं. हरिशंकर तिवारी आज 81 वर्ष के हो गए हैं, लेकिन रसूख अब भी किसी नौजवान से ज्यादा है। बाहुबल की दुनिया से राजनीति में आये और कई बार प्रदेश के मंत्री रह चुके पंडित हरिशंकर तिवारी के परिवार में आज एक पूर्व विधान परिषद सभापति (गणेश शंकर पांडेय), एक पूर्व सांसद (भीष्म शंकर तिवारी) और एक विधायक (विनय शंकर तिवारी) भी हैं।इनमे से श्री पांडेय हरिशंकर तिवारी के भांजे हैं तो वहीँ भीष्म शंकर और विनय शंकर उनके बड़े और छोटे बेटे हैं। यदि यह कहा जाए कि ये सभी लोग जहाँ आज हैं वहां पंहुचाने में किसी और का नहीं बल्कि हरिशंकर तिवारी का हाथ है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

1980 के दशक से लगातार पूर्वांचल की क्षितिज पर चमकने वाले पंडित हरिशंकर तिवारी का आज भी जोशोखरोश जस का तस है। बीते वर्ष हाता पर पुलिस के छापे के विरोध में अपने परिवार के सम्मान के लिए जब वह पैदल ही धरनास्थल पर पहुंचे थे तो उन के शुभेच्छुओं का ताँता लग गया। बीता समय ऐसा रहा कि 1980 में राजनीति में उतरने के बाद से केवल दो बार 2007 और 2012 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। वरना जब वो विधायक थे तो कमोबेश हर सरकार के राजनीतिक गलियारों में बेरोकटोक सत्ता के काबीना मंत्री तक का सफर कर चुके हैं।

जेल की सलाखों के पीछे रहकर विधायक बनने के बाद वो न सिर्फ़ लगातार 22 वर्षों तक विधायक रहे, बल्कि साल 1997 से लेकर 2007 तक लगातार मंत्री भी रहे। इस दौरान प्रदेश में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन हर पार्टी की सरकार में तिवारी मंत्री बने रहे। श्री तिवारी भाजपा के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में 1997 से 1999 तक मंत्री रहे। उसके बाद वो मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में 2003 से 2007 तक प्रदेश में मंत्री रहे। 1997 में हरिशंकर तिवारी ने जगदम्बिका पाल, राजीव शुक्ला और श्यामसुंदर शर्मा के साथ मिल कर कांग्रेस से अलग अखिल भारतीय लोकतान्त्रिक कांग्रेस की स्थापना की।

1985 में चिल्लूपार विधान सभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप चुनाव जीत कर शुरुआत करने वाले हरिशंकर तिवारी को ऐसा नहीं है कि राजनीति में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा या इनके सामने दिक्कतें नहीं आयीं। 1985 में तिवारी के चुनाव जीतने से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने माफियाओं पर शिकंजा कसना शुरू किया। हरिशंकर तिवारी भी गिरफ्तार हुए। जेल जाना पड़ा। हालांकि तब की कार्यवाई को स्थानीय लोग ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई में हुई करवाई का नाम देते हैं।

उसके बाद लगभग दो दशकों तक पंडित हरिशंकर तिवारी का चिल्लूपार में एकक्षत्र राज रहा। उन्हें पहला झटका 2007 में मिला। जब इलाके के ही एक अनजान से नेता राजेश त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी को उनके गढ़ चिल्लूपार में ही पटखनी दे दी। वो भी एक नहीं दो-दो बार। यहाँ तक की हरिशंकर तिवारी को चुनावी लड़ाई में तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। राजेश त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी को 2007 और 2012 में चिल्लूपार से हराया। उस हार के बाद से हरिशंकर तिवारी ने कोई चुनाव नहीं लड़ा। जानकारी के अनुसार इस बाहुबली नेता के खिलाफ 26 से ज्यादा मुक़दमे दर्ज हैं। इन्समे हत्या, हत्या की कोशिश, सरकार कार्यों में बाधा डालने जैसे संगीन आरोप भी हैं।

हरिशंकर तिवारी को उनके जन्मदिवस पर बधाई देते हुए आज के पूर्व संपादक, गोजए अध्यक्ष और अधिवक्ता रत्नाकर सिंह का कहना था कि,”पंडित हरिशंकर तिवारी का गोरखपुर की सरजमीं पर जब प्रादुर्भाव हुआ, गोरखपुर की राजनीति गोरखपुर विश्वविद्यालय से संचालित होती थी, जो स्पष्टत: क्षत्रिय ब्राह्मण के बीच वर्चस्व की जंग थी। ऐसे में बड़हलगंज के टांडा गांव निवासी हरिशंकर तिवारी, कब पंडित हरिशंकर तिवारी हो गए, वह खुद भी नहीं बता सकते। यद्यपि उनकी शुरुआती पहचान एक माफिया के रूप में हुई, पर कालांतर में अपनी जन्म स्थली चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में 5 बार की विधायकी उनकी लोकप्रियता को स्पष्ट दर्शाती है। एक राजनीतिज्ञ और एक शिक्षाविद के रूप में उन्होंने गोरखपुर को बहुत कुछ दिया। आदतन गोपालक पंडित हरिशंकर तिवारी के पास जातिगत आरोपों को नकारते हुए आते सभी धर्म संप्रदाय और जातियों के लोगों की भीड़ समाज में उनकी उपादेयता को ही दर्शाती है।”

कई बार ऐसा लगा की हरिशंकर तिवारी की राजनीति खत्म हो गयी। लेकिन ऐसे वक़्त में स्थानीय राजनीति का यह खिलाडी जिसने बाहुबल और राजनीति का संयोग कराया, और मजबूती से उभरा। 2017 विधान सभा चुनाव में उनके छोटे बेटे विनय शंकर तिवारी की चिल्लूपार सीट पर जीत दर्ज करना उसी का एक उदहारण था। भाजपा लहर में चिल्लूपार सीट जीत कर यह दिखाया इस क्षेत्र में अभी भी हरिशंकर तिवारी एक बड़ी सियासी ताकत हैं। 2017 के चुनाव में जहाँ भाजपा ने जनपद की 8 सीटों पर जबरजस्त जीत दर्ज की वहीँ उसे प्रतिष्ठित चिल्लूपार सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा। वो भी तब जब सूबे के वर्तमान मुखिया और गोरक्षपीठाधीस्वर योगी आदित्यनाथ ने चिल्लूपार के ही तत्कालीन विधायक राजेश त्रिपाठी को बसपा से भाजपा में लाकर मैदान में उतारा था।

इसमें कोई शक नहीं कि यह इलाका ब्राह्मण और राजपूत बिरादरी के बीच के जंग की कई इबारत लिखता रहा है, और पंडित हरिशंकर तिवारी उन इबारतों के मुख्य कथाकार हैं। राजनीति का अपराधीकरण गोरखपुर से शुरू हुआ था। हरिशंकर तिवारी इसके सबसे बड़े अगुवा थे। एक जमाने में पूर्वांचल की राजनीति में तिवारी की तूती बोलती थी। रेलवे से लेकर पीडब्ल्यूडी की ठेकेदारी में हरीशंकर तिवारी का कब्जा था। उसके दम पर तिवारी ने एक बहुत बड़ी मिल्कियत खड़ी कर ली।

स्थानीय भाषा में लोग यह भी कहते हैं कि कई लोग जो कभी हाता में हरिशंकर तिवारी का झोला उठाते थे आज मंत्री पदों को सुशोभित कर रहे हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है। चाहे वो पूर्व मंत्री और अब मधुमिता शुक्ला हत्यकांड में जेल काट रहे अमरमणि त्रिपाठी हों या सूबे में वर्तमान में कानून मंत्री पद को सुशोभित कर रहे बृजेश पाठक हों, इन सभी ने राजनीति का ककहरा पंडित हरिशंकर तिवारी के साथ रह कर ही सीखा। ऐसे अनगिनत नाम हैं जिन्होंने हाते में ही रहकर अपराध अपर राजनीति दोनों का पाठ पढ़ा।

हरिशंकर तिवारी की पूर्वांचल की राजनीति में अभी भी कितनी प्रासंगिकता है वो इस बात से समझा जा सकता है कि तिवारी परिवार के दो सदस्य अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव में दो लोक सभा सीटों से प्रबल दावेदार हैं। ऐसा माना जा रहा है कि खलीलाबाद लोक सभा सीट से श्री तिवारी के बड़े पुत्र पूर्व सांसद भीष्म शंकर तिवारी महागठबंधन के प्रत्याशी लगभग तय हो चुके हैं। वहीँ भांजे गणेश शंकर पांडेय की भी दावेदारी महराजगंज से सीट से बहुत पुख्ता मानी जा रही है।

स्थानीय निवासी और मुंबई में रहकर व्यवसाय करने वाले देवेश त्रिपाठी का कहना है कि 81 वर्षीय हरिशंकर तिवारी को प्रदेश का हर ब्राह्मण अपना आदरणीय और एक गार्डियन के रूप में देखता है। उनका कहना था कि पंडित हरिशंकर तिवारी अभी भी अपार क्षमताओं से परिपूर्ण है। पूर्व मंत्री को जन्म दिवस की बधाई देते हुए देवेश त्रिपाठी ने कहा कि पंडित हरिशंकर तिवारी के अंदर पुरे समाज को समेट कर चलने की क्षमता है।

एक प्रशंसक के नाते देवेश बहुत बढ़ा चढ़ा कर बोल सकते हैं। लेकिन ऐसे कई मौके आये जब हरिशंकर तिवारी को चूका हुआ मान लेने वाले गलत साबित हुए। सक्रिय न सही लेकिन अपरोक्ष रूप से वो पूर्वांचल की राजनीति को आगे भी प्रभावित करते रहेंगे यह मानने में अब शायद किसी को शंका नहीं है। 2017 में योगी सरकार द्वारा पूर्व मंत्री के निवास स्थान हाता पर छापा मरवाना, पंडित हरिशंकर तिवारी के लिए एक संजीवनी का काम कर गया। राजनीति के माहिर इस खिलाडी को विपरीत परिस्थियों को भी अपने पक्ष में करना बखूबी आता है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *