फाइनल रिपोर्ट स्पेशल

मखमली आवाज व अल्फाज के जादूगर थे खूनीपुर के उमर कुरैशी (पुण्यतिथि विशेष)

Umar-Qureshiगोरखपुर: सुनते हैं बज्में शेरों सुखन है बहुत उदास।
शायद उमर का दौर निजामत नहीं रहा।।
शहर की सरजमीं लम्बे दौर से गंगा जमुनी तहजीब का गहवारा रहा है, जिसको हिन्दू व मुसलमानों ने अपने खून से शेरो अदब को सींचा। आलमी जगत की अजीम हस्तियों डा अल्लामा इकबाल, फिराक गोरखपुरी ने मुशायरों के प्रसिद्ध संचालनकर्ता उमर कुरैशी को अल्फाज व आवाज का महान जादूगर बताया था। उमर ने आजादी के बाद उर्दू भाषा को शेरो अदब से जोड़कर मुशायरों के जरिए अपने अन्दाजें बयां से देश की कौमी एकता और संस्कृति को ऊंचाईयों तक पहुंचाया। गुमनाम अदीबों, शायरों की प्रशंसा कर उन्हें लोगों के सामने लाते रहे।
उमर कुरैशी ने तमाम शायरों को बा कमाल ऊंचाईयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जिसका कोई उदाहरण कहीं और नहीं मिल सकता। आज अपने देश के अलावा अन्य देशों में जो मुशायरों के लिए बेहतरीन माहौल उमर कुरैशी की कोशिशों का भी पूरा-पूरा योगदान है। उनकी अजीम अदबी कुर्बानी मुशायरों के अध्याय में एक अहम वरक है।
उमर कुरैशी किसी पहचान के मोहताज नहीं है। इसी शहर के पढ़े लिखे इज्जतदार कुरैशी खानदान के अली बख्श के घर मुहल्ला खुनीपूर में 16 सितम्बर 1924 को पैदा हुए। बचपन में ही बाप का साया सिर से उठ गया। मां के खुद्दार आगोश ने परवान चढ़ाया। अरबी, फारसी, उर्दू व अंग्रेजी की उच्च शिक्षा हासिल कर रेलवे में क्लास वन अफसर तक की शानदार मुलाजिमत में खूब नाम कमाया।
इल्मों अदब शायरी से उमर कुरैशी का रिश्ता शिक्षा हासिल के दौरान से ही रहा। खुदा ने उन्हें आवाज और अंदाजें बयां दोनों में कमाल अता फरमाया था। दोस्तों, अदीबों और शायरों के साथ अदबी सरगर्मियों, महफिलों और शेरी नशिस्तों में अपनी निजामत और शायरी के साथ जो कदम रखा तो महाना मुशायरों, रियासतगी, आल इण्डिया और आलमी मुशायरों में अपनी शानदार निजामत की धूम मचाते चले गए।
हिन्दुस्तान के बेमिसाल खतीबुल अस्त को हर मौजू, हर उनवान पर खेताबत की बड़ी महारत हासिल थी। वह अपनी जात में खुदएक अंजुमन थे। अजीम शोराये किराम जैसे मौलाना अबरार हुसैनी, अख्तरूल, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, मौलाना शेरी भोपली, फिराक गोरखपुरी, मुशीर झुनझुनवी, अनवर साबरी, साहिर लुधियानवी, शकील करहानी, शकील बदायूंनी, जानिसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, अहमद फराज, कतील शिफाई, कुंवर महेन्द्र सिंह सेहर, आनन्द नारायन मुल्ला, गोपीनाथ अमन, सेवाकर राही के साथ तमाम तारीखी मुशायरों की निजामत की और उनके निजामत का डंका चारों तरफ बजने लगा।
जश्न-ए-दिल्ली, उर्दू क्लब मैदान, बज्में, गवर्नर, फिल्मी हस्तियों, विवि, कालोनी, नुमाईशों और मेलों वगैरह में तमाम रहनुमाओं व अदब नवाजों की सदारत में गुलजार देहली पदम श्री बेकल उत्साही, निदा फाजली जुबेर रिजवी, जफर गोरखपुरी वगैरह के साथ तमाम मुशायरों कवि सम्मेलनों, नातिया मुशायरों, अदबी जलसों सेमिनारों और अज्म तकारीब में शहंशाहे निजामत अदब का एक हिस्सा है और उमर कुरैशी बेमिसाल खतीब और नाजिमें मुशायरा के साथ बेहतरीन शायर भी थे। उनकी निजामत सुनकर लोग झूम उठते थे।
उनकी निजामत के दीवाने कुली से क्लर्क और संतरी से क्लेक्टर तक जवान, अधेड़ और बूढें खींचे चले आते थे। उनकी खनकदार आवाज पन्द्रह बीस हजार की भीड़ पर भी पड़ जाती थी। बेपनाह इज्जत शोहरत, जश्न, इस्तकबाल, शील्ड, एवार्ड ओर करोड़ों के दिलों पर 45 साल तक हुक्मरानी की। उनके यौमे वफात 18 मई 2010 खिराजे अकीदत के साथ जिंदा रहेगी। निजामत की रिवायत कल भी थी। आज भी है, और आने वाले कल में भी कायम रहेगी।
उन्होंने निजामत को एक फन की तरह बरता और आखिर तक इसको फन की तरह ही लोगों से रूबरू करवाते रहे। ये साबित कर दिखाया कि अगर शायरी एक फन है तो निजामत भी एक मजबूत फन है।
उमर कुरैशी की याद में उमर कुरैशी एकेडमी 2011 में बनायी गयी। इनके दामाद खुर्शीद कुरैशी ने बताया कि इस संस्था का मकसद नए शायरों को एक मंच प्रदान करना है। अदबी महफिलों की नशिस्ते मुनक्किद करना है साथ ही संस्था सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती है। इस संस्था के अध्यक्ष वरिष्ठ चिकित्सक डा. अजीज अहमद, उपाध्यक्ष मशहूर शायर कलीम कैसर है। संस्था अब तक तमाम तरह की महफिलों का आयोजन कर चुकी है
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