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गोरखपुर-आजमगढ़-वाराणसी रेल: आज़ादी के बाद से लोग लगाए बैठे हैं उम्मीद, अभी तक केवल आश्वासन

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: आज़ादी के बाद से ही लोग गोरखपुर-वाराणसी वाया आजमगढ़ रेल लाइन की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन अभी तक वो सपना हकीकत में नहीं बदल पाया है। बार-बार लगता है कि अब सपना सच हो जायेगा। लेकिन इंतजार है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता। आलम यह है कि लगभग तीन साल पहले रेल राज्य मंत्री और गाजीपुर से सांसद मनोज सिन्हा द्वारा इस रूट को लेकर भरोसा दिलाये जाने और जमीनी सर्वे के बाद भी अभी तक इस मांग को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।

वाराणसी-आजमगढ़-गोरखपुर रेलवे लाइन सात लोक सभा क्षेत्रों और तक़रीबन 25 विधान सभा क्षेत्रों के सीधे जोड़ेगी। यह रेल रूट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्रों क्रमशः वाराणसी और गोरखपुर के अलावा बाँसगाँव, घोषी, आजमगढ़, लालगंज और मछलीशहर संसदीय सीटों को जोड़ेगी। इसमें आजमगढ़ सीट को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी 6 सीटों पर वर्तमान में भाजपा का कब्ज़ा है। आजमगढ़ सीट से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं।

गोरखपुर-वाराणसी वाया आजमगढ़ रेल लाइन गोरखपुर अथवा वाराणसी के लोगों से ज्यादा आजमगढ़ के निवासियों के लिए एक मुलभुत जरुरत है। यहाँ के कई गाँव ऐसे हैं जहाँ के लोगों ने ट्रेन तक नहीं देखी है। देश के किसी अन्य महानगर में जाने के लिए आजमगढ़ के लोगों को वाराणसी या गोरखपुर जाकर ट्रेन पकड़ना पड़ता है। आजमगढ़ से वाराणसी की दुरी 110 किमी की है तो वहीँ यहाँ से गोरखपुर की दुरी लगभग 50 किमी है। ऐसे में यहाँ के लोग जो दूर दराज के क्षेत्र में कमाने के लिए जाते हैं उन्हें तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ट्रेन रूट ना होने के कारण वाराणसी या गोरखपुर से बिज़नेस के सम्बन्ध में आजमगढ़ आने वाले लोगों को शाम होने के बाद अपने गंतव्य वापस जाने के लिए कोई अच्छी सुविधा नहीं मिलती है।

बताते चलें कि आजमगढ़ एक मंडल है। इसमें तीन जिले–बलिया, मऊ और आजमगढ़-शामिल है। इनमे से बलिया और मऊ के वाराणसी रेल रूट पर होने के नाते अच्छी ट्रेनों की भरमार है। बलिया में तो राजधानी ट्रेनों का भी ठहराव है। केवल मुख्यालय आज़मगढ़ ही रेल के मामले में पिछड़ा हुआ है। किसी जगह का अच्छे रेल रूट से जुड़ना वहां की अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। सीधे किसी बड़े रेल रूट से ना जुड़े होने के कारण इस क्षेत्र के उद्योग धंधों को उसकी क्षमता के हिसाब से पहचान भी नहीं मिल सका। ट्रेनों की अच्छी सुविधा ना होने के कारण मुबारकपुर के रेशम उद्योग, निज़ामाबाद के काली पटरी उद्योग, और रानी की सराय के जूट उद्योग अपनी क्षमता के हिसाब से विकास नहीं कर सके।

कितनी ट्रेनें हैं आजमगढ़ से गोरखपुर और वाराणसी के लिए

गोरखपुर से आजमगढ़ होकर वाराणसी का कोई सीधा रूट नहीं है। बतादें कि आजमगढ़ से वाराणसी के लिए केवल दो ट्रेन है तो वहीँ गोरखपुर के लिए केवल एक ट्रेन। वाराणसी से आजमगढ़ को आने वाली ट्रेनें मऊ और मुहम्मदाबाद होकर आती हैं। वहीँ गोरखपुर से गोदान एक्सप्रेस हफ्ते में केवल चार दिन आजमगढ़ आती है।

कब उठी थी इस रेल रूट के लिए पहली आवाज

सबसे पहले आजमगढ़ से वाराणसी के लिए रेल मार्ग की मनाग 1960 में हुई थी। 1960 में लालगंज पश्चिमी से सांसद रहे कलिका सिंह ने इस मुद्दे को संसद में जोर शोर से उठाया था। उन्ही की पहल पर रेलवे ने इस रूट के लिए सर्वे कराया था। इस प्रोजेक्ट को तब कलिका प्रोजेक्ट का नाम दिया गया था। उसके बाद लगभग 54 सालों तक किसी स्थानीय जनप्रतिनिधि ने इस मुद्दे को जोर शोर से नहीं उठाया।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी की थी मांग

2012 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी इस रूट पर रेल लाइन बिछाने की मांग की थी। उन्होंने तत्कालीन रेल मंत्री पवन बंसल को पत्र लिख कर वाराणसी-गोरखपुर वाया मुबारकपुर रेल लाइन बनाने की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि मुबारकपुर में बड़ी संख्या में बनारसी साडी के बुनकर रहते हैं। इन बुनकरों को सूरत, मालदा जैसी जगहों से कच्चा माल मगाने में तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने पत्र में लिखा था कि यह रेल लाइन बन जाने से बुनकरों की समस्या समाप्त हो जाएगी।

रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने भी दिलाया था भरोसा

मई 2015 में रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने आजमगढ़ में आयोजित एक सम्मान समारोह में कहा था कि वाराणसी-आजमगढ़-गोरखपुर रेल लाइन का निर्माण जल्द शुरू हो जायेगा।

वर्तमान लालगंज सांसद नीलम सोनकर ने उठाया मुद्दा

कलिका सिंह के बाद अगर किसी सांसद ने इस मुद्दे को संसद में उठाया तो वो हैं लालगंज से भाजपा संसद नीलम सोनकर। नीलम सोनकर द्वारा इस मुद्दे को फिर से उठाने का नतीजा यह हुआ कि वाराणसी से लालगंज, आजमगढ़, मुबारकपुर, दोहरीघाट होते हुए गोरखपुर तक रेलवे लाइन बिछाने की कवायद शुरू हो गयी। मई 2016 में नीलम सोनकर ने प्रेस से बात करते हुए यह ऐलान भी किया था कि लगभग 200 किमी रेल लाइन बिछाने के लिए केंद्र सरकार ने सर्वे हेतु डेढ़ करोड़ रुपये भी अवमुक्त कर दिए हैं। उन्होंने तब यह भी घोषणा की थी कि 2016 में मानसून के बड़ा रेल लाइन बिछाने के काम भी शुरू हो जायेगा।

फरवरी 2018 में दिखी थी उम्मीद की एक किरण

वर्षों से वाराणसी-आजमगढ़-गोरखपुर रेल लाइन की राह देख रहे लोगों को इसी वर्ष फरवरी महीने में अच्छी खबर तब मिली थी जब यह घोषणा हुई कि इस रूट पर रेल लाइन बिछाने के लिए प्रथम सर्वे का काम पूरा हो चुका है। तब यह कहा गया था कि यह रेलवे लाइन लगभग 500 गावों के बीच से गुजरेगी। इस ट्रैक को बिछाने पर
लगभग 4200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। यह भी कहा गया था कि जिन लोगों की जमीन इस रेल लाइन को बिछाने के लिए अधिग्रहित की जाएगी उन्हें नेशनल हाईवे की तर्ज पर ही सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा दिया जायेगा।

ट्विटर पर अकाउंट बना युवा कर रहे हैं संघर्ष

Varanasi-Azamgarh-Gorakhpur Railway Line नाम से एक ट्विटर हैंडल बना कर क्षेत्र के युवा इस रेल लाइन के निर्माण के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। मुंबई, दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर कार्यरत युवाओं द्वारा सोशल मीडिया पर लगातार इस रेल लाइन के निर्माण के लिए मुहीम चलायी जा रही है। आजमगढ़ के रहने वाले ये सभी युवा अपने क्षेत्र के पिछड़ेपन को लेकर बहुत दुखी हैं। उनका मानना है कि वाराणसी-आजमगढ़-गोरखपुर रेल लाइन ही इस क्षेत्र को पिछड़ेपन से निजात दिला सकता है। ये युवा वाराणसी-आजमगढ़-गोरखपुर रेलवे लाइन के नाम के एक फेसबुक पेज के माध्यम से लोगों को जागृत करने का काम कर रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से ये युवा अपनी बात सरकार तक भी पँहुचाते रहते हैं।

twitter–https://twitter.com/VnsAzmGkpRlyLin

facebook-https://www.facebook.com/VaranasiAzamgarhGorakhpurRailLine/

सहजनवां-दोहरीघाट परियोजना रद्द होने से लगा था तगड़ा झटका

बीते साल बजट से पहले रेलवे बोर्ड ने महत्वपूर्ण सहजनवां-दोहरीघाट को खारिज कर पूर्वांचल के लोगों को तगड़ा झटका दिया था। इस परियोजना के अधर में पड़ने से गोरखपुर-आजमगढ़-वाराणसी रेल रूट को भी तगड़ा झटका लगा था। यदि सरकार वाराणसी से गोरखपुर वाया आजमगढ़ रेल रूट बनाती है तो जाहिरा तौर पर वो दोहरीघाट-सहजनवा होकर ही बनेगी।

क्या कहते हैं बाँसगाँव सांसद कमलेश पासवान

जब इस मुद्दे पर हमने बाँसगाँव के भाजपा संसद कमलेश पासवान से बात की तो उनका कहना था कि वो अभी भी सहजनवां-दोहरीघाट परियोजना को लेकर काफी आशान्वित हैं। उन्होंने बताया कि यह परियोजना रद्द होने से उन्हें व्यक्तिगत रूप से काफी झटका लगा था। क्योंकि बीते 10 साल से वो लगातार इस रेल रूट के लिए प्रायसरत हैं। यह पूछने पर कि क्या यह परियोजना निकट भविष्य में जमीन पर उतरेगी पर सांसद का कहना था कि उन्हें रेल राज्य मंत्री ने इस रेल रूट के निर्माण का भरोसा दिलाया है। श्री पासवान ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि चुनाव से पहले यह परियोजना जरूर पास हो जाएगी।

बतादें कि सहजनवां-दोहरीघाट परियोजना पास होने से वाराणसी-आजमगढ़-गोरखपुर रेल रूट के निर्माण की सम्भावनएं भी काफी बढ़ जाएँगी। वैसे विभाग के जानकारों की मानें तो सरकार और रेल मंत्रालय अब नई रेल लाइनों पर कम ध्यान देने की पालिसी बना चुकी है। उनके अनुसार केवल लाभकारी रेल लाइनों पर ही मुहर लगेगी। जानकार बताते हैं कि पूर्वोत्तर रेलवे की सभी नई रेल लाइनें घाटे वाली हैं। रेल मंत्रालय नई ट्रेनें भी चलाने के बहुत मूड में नहीं दिखती है। है जब आवश्यकता होगी तो रेलवे बोर्ड नई ट्रेनों का संचालन कभी भी कर सकता है। वैसे भी रेलवे ट्रैक की क्षमता के अनुसार ट्रेनों की संख्या कहीं अधिक है।

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