गणपति बप्पा मोरया…

गणपति बप्पा मोरया…

गणेशजी का संपूर्ण स्वरूप प्रतीकात्मक है। वह परम चेतना हैं, जो सबमें व्याप्त हैं और ब्रह्मांड को एक व्यवस्था प्रदान करते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि द्रष्टा थे, इसीलिए उन्होंने इस दिव्यता को अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों की बजाय प्रतीकों का चयन किया। समय के साथ शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक अपरिवर्तित रहते हैं।

गणेशजी एक निराकार देवता हैं- अपने भक्त के कल्याण के लिए एक दैदीप्यमान स्वरूप में साकार। गण का अर्थ है समूह। ब्रह्मांड परमाणुओं और विभिन्न ऊर्जाओं का समूह है। अगर इन विभिन्न सत्ताओं के समूह का शासन करने वाली कोई सर्वोच्च सत्ता न हो तो ब्रह्मांड में अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इन परमाणुओं और ऊर्जाओं के समस्त समूहों के स्वामी गणेश हैं। वह परम चेतना हैं, जो सबमें व्याप्त हैं। गणेशजी के स्वरूप को आदि शंकराचार्य ने बहुत सुंदर तरीके से बताया है। वह ‘अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं’ हैं। इसका अर्थ है कि वह ‘अजं’ यानी अजन्मे हैं, ‘निर्विकल्पं’ यानी  ‘निर्गुण’ हैं, वह ‘निराकार’ हैं, उस चेतना के प्रतीक हैं, जो सर्वव्यापी है। गणेश वह ऊर्जा हैं, जो इस ब्रह्मांड का कारण है, जिससे सब कुछ प्रकाशित होता है और जिसमें सब विलीन हो जाता है।

हम सभी इस कथा से परिचित हैं- मां पार्वती जब भगवान शिव के साथ उत्सव मना रही थीं, उनका शरीर धूल से गंदा हो गया। जब उन्हें यह महसूस हुआ तो उन्होंने अपने शरीर से धूल उतारी और उससे एक बालक की सृष्टि की, फिर उस बालक से कहा कि जब तक वह स्नान कर रही हैं, तब तक वह द्वार पर पहरा दे। भगवान शिव जब वापस लौटे, बालक ने उन्हें नहीं पहचाना और उनका रास्ता रोक लिया। क्रुद्ध शिवजी ने बालक का सिर काट दिया। यह देख कर मां पार्वती स्तब्ध रह गईं। उन्होंने कहा कि बालक उनका पुत्र था और भगवान शिव से आग्रह किया कि वह किसी भी कीमत पर बालक को पुनर्जीवित करें।

शिवजी ने अपने सहायकों को आदेश दिया- ‘जाओ और ऐसे जीव का सिर ले आओ, जो उत्तर की ओर मुख करके सोया हो।’ सहायक तब एक गज का सिर लेकर आए, जिसे भगवान शिव ने बालक के धड़ से जोड़ दिया और इस तरह गणेशजी का जन्म हुआ।
क्या यह कथा विचित्र लगती है? मां पार्वती ने अपने शरीर पर धूल क्यों जमने दी? क्या सर्वज्ञ शिव स्वयं के पुत्र को नहीं पहचानते थे? शांति के प्रतीक शिवजी क्या इतनी जल्दी क्रुद्ध हो गए कि उन्होंने अपने पुत्र का ही सिर विच्छेद कर दिया? और गणेश के लिए हाथी का सिर क्यों? इन सबका एक गूढ़ अर्थ है।

मां पार्वती उत्सव ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनका गंदा होना इस बात का संकेत है कि उत्सव आसानी से ‘राजसिक’ या चंचल बना सकता है। धूल अज्ञान और शिवजी परम सरलता, शांति और ज्ञान के प्रतीक हैं। जब गणेश ने शिव का मार्ग रोका तो इसका अर्थ हुआ कि अज्ञान ने ज्ञान को नहीं पहचाना। उस स्थिति में ज्ञान को अज्ञान के ऊपर विजय प्राप्त करनी थी। भगवान शिव द्वारा बालक का सिर विच्छेद किए जाने के पीछे यही प्रतीकात्मकता थी।
हाथी का सिर क्यों? गज यानी हाथी ‘ज्ञान शक्ति’ और ‘कर्म शक्ति’ दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। गज के मुख्य गुण हैं विवेक और सहजता। हाथी का विशाल सिर विवेक और ज्ञान का द्योतक है। गज बाधाओं की ओर गमन नहीं करते और न ही उनके द्वारा रोके जा सकते हैं। वे बाधाओं को नष्ट कर देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं- यह सहजता को प्रदर्शित करता है। इसलिए जब हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं तो हमारे अंदर गज के ये गुण जागृत होते हैं।

गणेशजी का विशाल उदर उदारता और पूर्ण स्वीकार भाव को अभिव्यक्त करता है। गणेशजी के उठे हुए हाथ रक्षा का भाव प्रदर्शित करते हैं। इसका अर्थ है भयभीत मत हो- मैं तुम्हारे साथ हूं। उनके नीचे के हाथ, जिनकी हथेलियां सामने की ओर हैं, का अर्थ है- अनंत दान व झुकने का आह्वान। यह प्रतीक है कि एक दिन हम मिट्टी में विलीन हो जाएंगे। गणेश जी का एक गजदंत भी है, जो एकाग्रता का प्रतीक है। वह अपने हाथों में अंकुश (जागृति का प्रतीक) और पाश (नियंत्रण का प्रतीक) धारण करते हैं। जागरूकता से बहुत ऊर्जा मुक्त होती है, जिसका उचित नियंत्रण नहीं किया गया तो वह विध्वंसक हो सकती है।

गज के सिर वाले गणेश मूषक जैसी सवारी पर क्यों भ्रमण करते हैं? यहां फिर प्रतीकात्मकता है, जो बहुत गूढ़ है। मूषक रस्सियों को काटता है, कुतरता है, जो बांधने का काम करती हैं। मूषक उस मंत्र की तरह है, जो अज्ञान के आवरणों को काटता है और परम ज्ञान की ओर ले जाता है, जिसके प्रतिनिधि गणेश हैं।