गोरखपुर

यूं ही नहीं बन रहा है गोरखपुर में एम्स, पीछे है संघर्ष की रोचक दास्तान

aiims-in-gorakhpurगोरखपुर: पूर्वांचल का महत्व्पूर्ण जनपद होने के नाते यहां पर एक से एक राजनीतिक हस्तियां पैदा हुई है, तो वहीं समाज को संवारने और राह दिखाने वाले भी। हम बात कर रहे हैं अपने जनपद में आगामी 22 जुलाई को शिलान्यास होने वाले एम्स की। यूँ तो अपने इलाके में हर चीज पर राजनीति की जाती है किंतु जहां जनता के हित की बात हो वहां यह सारे राजनीतिज्ञ एक मत होकर लड़ाई लड़ते हैं। बात कर रहे हैं जनपद में स्थापित होने वाले अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान या ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) की।
एम्स हमारे पूर्वांचल को खैरात में नहीं मिल रहा है बल्कि इसके लिए ढेर सारी लड़ाईयां लड़नी पड़ी हैं। तब जाकर हमें एम्स मिला है अगर इसके पाश्र्व में देखें तो इस क्षेत्र की जनता ने अपना काफी कुछ खोया है ।
बात कर रहे हैं एम्स लाने की बुनियाद इंसेफेलाइटिस को मिटाने या बच्चों की अकाल मौत का जिम्मेदार दिमागी बुखार। लगभग चार दशक से पूर्वांचल पड़ोसी प्रांत बिहार और पड़ोसी देश नेपाल का तराई इलाका जल जनित बीमारी ए इ एस या जापानी इंसेफेलाइटिस से ग्रस्त रहा है। इस क्षेत्र के नौनिहाल कब दम तोड़ दें या शारीरिक मानसिक रूप से विकलांग हो जाएं यह कोई नहीं कह सकता था।
कारण इंसेफेलाइटिस का अटैक, वर्ष 1998 में जब पूर्वांचल में बाढ़ की विभीषिका ने उग्र रूप धारण कर लिया था तो इस बीमारी ने भी दूषित जल से लोगों के बीच पैठ बनाकर अपना रौद्र रूप दिखा दिया चिकित्सा संस्थानों में प्रतिदिन सैकड़ों मासूम अकाल मौत की भेंट चढ़ रहे थे और हर कोई अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर था।
इसी दौरान वर्ष 2002 में जब केंद्र में अटल बिहारी बाजपेई की सरकार आई तो स्वास्थ्य के मुद्दे पर उन्होंने घोषणा किया कि देश के अन्य भागों में भी ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस की तरह विश्वस्तरीय इलाज हेतु छह अन्य संस्थान बनाए जाएंगे। इस मुद्दे पर अभी कोई कार्यवाही होती ,इसके पहले वर्ष 2004 में सरकार चली गई।
उसके बाद आई सरकारों में यह मुद्दा गुम हो गया और वर्ष 2010 तक निराशा के स्याह अंधेरे में पडा रहा। वर्ष 2010 में एक बार फिर से जब इंसेफलाइटिस ने कहर ढाना शुरू किया तो लोग अपने नौनिहालों को लेकर दिल्ली मुंबई की राह पकड़ना शुरू कर दिए ,वजह उच्चस्तरीय इलाज, जो कि पूर्वांचल में नहीं था।
इंसेफेलाइटिस हो रही मौतों को देखते हुए स्थानीय सांसद योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को ध्यान आकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से जब संसद भवन में प्रश्न उठाया तो वर्ष 2011 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने गोरखपुर का दौरा करके मेडिकल कॉलेज में इंसेफेलाइटिस पीड़ितों को देखा भी ।
जिसके बाद मीडिया से रूबरू होते हुए उन्होंने कहा कि यह राज्य सरकार का मुद्दा है और केंद्र इस पर विचार करेगी। उनकी इस बात को ध्यान में रखते हुए सदर सांसद योगी आदित्यनाथ ने संसद सत्र में इस मुद्दे पर ध्यानार्थ कलिंग अटेंशन की नोटिस दिया।
संसद में इंसेफेलाइटिस के लक्षणों और हो रही मौतों पर जब चर्चा हुई तो कई अन्य सांसदों ने भी उक्त बीमारी अपने क्षेत्र में भी होने की बात कही। उस समय इस बीमारी से देश के 17 राज्य और लगभग तीन सैकड़े की संख्या में जनपद प्रभावित है। बहस के बाद योगी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मुलाकात किया तो उनके पूछने पर एम्स की मांग कर दिया,किन्तु तब तक एम्स की घोषणा झाँसी के लिए हो चुकी थी।
इसके बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बीमारी से निजात दिलाने के लिए हर सम्भव मदद का भरोसा दिया। वर्ष 2014 में जब केंद्र में भाजपा शासित सरकार ने अपना कार्यभार ग्रहण किया तो सांसद योगी आदित्यनाथ व अन्य क्षेत्रीय सांसदों ने स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन से मिलकर यहाँ के नौनिहालो की जान बचाने की गुहार लगाई,किन्तु स्वास्थ्य मंत्री बदलकर जेपी नड्डा हो गए और उन्ही के समय में देश के बजट में पूर्वांचल में एम्स की घोषणा हुई।
किन्तु जगह के नाम पर संशय था,जिसे लेकर क्षेत्रीय सांसदों संग योगी ने पी एम से मिलकर गोरखपुर में देने की मांग की। ज्योही पीएम ने इसपर झण्डी दिखाई तो प्रक्रिया में तेजी आ गयी।
इसके बाद 15 फ़रवरी 2015 को केंद्र ने प्रदेश से जमीन के प्रस्ताव पर पत्र दिया। 28 अप्रैल को जमीन देखने केंद्रिय टीम ने गोरखपुर का दौरा किया। बीते 27 जुलाई को और 20 अगस्त को केंद्र सरकार के स्वास्थ्य बिभाग द्वारा प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र, उसके बाद 19 नवम्बर, 24 दिसम्बर को भूमि सम्बन्धी प्रस्ताव का अनुरोध किया गया।
इसके बाद खुटहन की विवादित जमीन को लेकर राजनीती शुरू होने पर फर्टिलाइजर में एम्स बनाने के प्रस्ताव का निरीक्षण करने के लिए जून माह के अंत में टीम ने किया निरीक्षण।इसके बाद कई दौर में मिडिया को सम्बोधन और कई बार बहस-मुबाहिस का दौर भी चला।

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