गोरखपुर

जातिगत इंजीनियरिंग से घ्वस्त हुआ भगवा गढ़, ब्राह्मण नहीं ठाकुरों ने इस बार भाजपा को नहीं दिया वोट

जातिगत इंजीनियरिंग से घ्वस्त हुआ भगवा गढ़, ब्राह्मण नहीं ठाकुरों ने इस बार भाजपा को नहीं दिया वोट

 
गोरखपुर: 1989 से गोरखपुर के सांसद का पता गोरखनाथ मंदिर ही था, लेकिन 29 साल के मैकेनिकल इंजीनियर प्रवीण निषाद ने गोरक्षपीठ के 29 साल से चले आ रहे एकछत्र साम्राज्य को जातिगत इंजीनियरिंग से एक झटके में खत्म कर दिया। गोरखपुर में रहना है तो योगी-योगी कहना है सरीखे नारों से विरोधियों के हौसले को पस्त करने वाले योगी आदित्यनाथ को तब हार मिली जब वह अपने सियासी कैरियर में सर्वोच्च स्थान पर थे। जिस सीट पर विरोधी सिर्फ इसलिये अपना उम्मीदवार खड़ा करते थे, कि उन्हें भगोड़ा न कहा जाये, उसी गोरखपुर सीट पर हार के बाद योगी से लेकर छुटभये भाजपा नेताओं को कोई जवाब नहीं जूझ रहा है।

पिछले तीन दशक में गोरखपुर जिले में यह पहला मौका है जब योगी को हर दांव पेंच आजमाने के बाद हार मिली है। वरना, गोरखपुर की जनता से योगी की एक मार्मिक अपील ही जीत की गारंटी मानी जाती है। हांलाकि योगी ने इस बार भी कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उनका हर दांव उलटा पड़ा। पर्चा दाखिला के बाद योगी आदित्यनाथ ने 15 जनसभाएं कीं। कार्यकर्ताओं से लेकर वोटरों को यह समझाने में मशगूल दिखे कि जैसे मुझे वोट देते थे, वैसे ही वोट देकर उपेन्द्र दत्त शुक्ला का समर्थन करें, वोट करें। लेकिन उनके सभी दांव पर जातिगत गुणाभाग के साथ सपा मुखिया अखिलेश यादव की एक जनसभा ही भारी पड़ी।

इसके पहले भी योगी ऐसे ही हमलावर और मार्मिक अपील के गठजोड़ से नगर विधायक डाॅ राधा मोहन दास अग्रवाल, पूर्व मेयर अंजू चैधरी, पूर्व मेयर डाॅ सत्या पांडेय और मुख्यमंत्री बनने के बाद सीताराम जायसवाल को एक लाख से अधिक वोटों से जीताकर मेयर की कुर्सी पर बिठा चुके हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस सांसद के अपील को आदेश मानकर गोरखपुर की जनता वोट देने के उमड़ पड़ती थी, उन्हीं सांसद के मुख्यमंत्री बनने के बाद जनता ने निराश क्यो कर दिया। जबकि एम्स, खाद कारखाना, फोरलेन का संजाल, प्रेक्षागृह जैसे दर्जनों विकास कार्य योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से अमली जामा पहन रहे हैं।

सवाल उठ रहा कि क्या गोरखपुर को मुख्यमंत्री का जिला होने का तमगा नहीं चाहिए। यहां की जनता सैफई जैसा विकास नहीं चाहती है। शायद ऐसा नहीं है। पिछले 11 महीने में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्वकाल में ऐसे कई वाकये आये जब आम जनता ही नहीं उनके करीबी नेता भी उनसे दूर होते दिखे। योगी से उनके करीबी सूबे में मंत्रिमंडल विस्तार से ही दूर होने लगे थे। जब पांच बार से लगातार जीत रहे डाॅ राधा मोहन दास अग्रवाल, फतेह बहादुर सिंह सरीखे दिग्गजों को मंत्रिमंडल में नहीं शामिल किया गया। दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से भले ही अपना विरोध नहीं जताया हो लेकिन मंत्री नहीं बन पाने की टीस दोनों में दिख ही जाती है।

योगी के मुंख्यमंत्री रहते ही शराब की दुकान को लेकर डाॅ आरएमडी अग्रवाल की कहासुनी आईपीएस चारू निगम से हुई। देश भर की मीडिया में सुर्खियां बनने के बाद भी चारू निगम का रूतबा बरकरार रहा लेकिन मुख्यमंत्री ने आरएमडी से सहानुभूति के दो बोल बोलने की भी जरूरत नहीं समझी। बांसगांव के सांसद कमलेश पासवान और उनके विधायक भाई डाॅ विमलेश पासवान भी मुख्यमंत्री के रवैये से आहत हैं। सांसद कमलेश पासवान पर गोरखपुर के एसएसपी अनिरूद्ध सत्यार्थ पंकज ने जमीन पर कब्जे के एक मामले में मुकदमा दर्ज करा दिया। कमलेश के करीबियों की गिरफ्तारी को लेकर छापेमारी हुई। एसएसपी की बदसलूकी और पूरे प्रकरण को लेकर कमलेश ने मुख्यमंत्री को अवगत भी कराया लेकिन योगी ने अपने अधिकारियों के आगे सांसद की एक नहीं सुनी।

भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह को योगी का करीबी माना जाता है। निकाय चुनाव के दौरान एक पुलिस अधिकारी ने धर्मेन्द्र सिंह से बदसलूकी की लेकिन इस मामले में भी मुख्यमंत्री चुप्पी साधे रहे। पिपराइच से विधायक महेन्द्र पाल सिंह की खनन मामले में थानाध्यक्ष से कहासुनी हो गई, इस मामले में भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। 50 हजार रुपये के लेनदेन के मामले संगठन में अहम पद पर तैनात भाजपा नेत्री सारिता सिंह को योगी के इशारे पर जेल की हवा खानी पड़ी। चौरी चौरा विधायक संगीता यादव भी पार्टी में अपनी उपेक्षा को लेकर आहत हैं। ऐसी ही वजहों के चलते जो कार्यकर्ता योगी के एक इशारे पर मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे वह चुनाव प्रचार की रस्मआदायगी में जुटे रहे।

योगी की हवा बनाने से लेकर चुनाव में बूथ मैनेजमेंट करने वाली हिन्दु युवा वाहिनी भी चुनाव में मूकदर्शक की भूमिका में बनी रही। योगी के तेजतर्रार प्रदेश अध्यक्ष रहे सुनील सिंह अभी भी योगी की नाराजगी झेल रहे हैं। राघवेन्द्र सिंह और सतीश द्विवेदी सरीखे कार्यकर्ता अब विधायक बनकर अपने ही क्षेत्र में व्यस्त हैं। योगी के चुनावों में जीत की रणनीति रचने वालों की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो पा रही है। डाॅ प्रदीप राव, कमल नाथ, धर्मेन्द्र सिंह सरीखे दर्जनों लोग योगी की खाली सीट पर खुद को दावेदार मानकर खुशफहमी पाले हुए थे।

ऐसे में उपेन्द्र दत्त शुक्ला को जब पार्टी ने प्रत्याशी बनाया तो लोगों को खास उत्साह नहीं दिखा। दरअसल, उपेन्द्र दत्त शुक्ला के पक्ष में योगी की 15 सभाओं को छोड़ दें तो अन्य दिग्गजों का प्रयास सिर्फ यहां तक सिमटा रहा कि योगी जी तक सूचना पहुंच जायें कि हम प्रचार कर रहे हैं। यहीं वजह है कि गोरखपुर जिन पांच विधानसभाओं में विरोधियों का 11 महीने पहले जहाँ सूपड़ा साफ हो गया था वहां सपा सक्रिय हो गई। गोरखपुर और पिपराइच विधानसभा की मामूली मतों के अंतर को छोड़ दें तो सहजनवां, कैम्पियरगंज और गोरखपुर ग्रामीण विधानसभा में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है।

जातीय गणित में सफल हुई सपा

जाति के जिस जोड़तोड़ से भाजपा ने यूपी विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल किया था, सपा ने उसी जातीय गुणाभाग में योगी को उनके ही गढ़ में घेर लिया। पिछले तीन दशक में गोरखपुर सीट पर हुआ चुनाव सिर्फ जाति के आधार पर लड़ा गया। सिर्फ सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ही नहीं निषाद पार्टी, पीस पार्टी ने जातिगत आधार पर चुनाव की रणनीति को तैयार किया। रही सही कसर बसपा मुखिया मायावती से समर्थन देकर पूरा कर दिया। पूरे चुनाव में पार्टियों और प्रत्याशी से पहले जातियां आमने-सामने हुईं।

सपा की तरफ से निषाद, यादव और मुस्लिम वोट जहां मुखर होकर लामबंद हुए वहीं भाजपा की तरफ से ब्राहम्मण, सैथवार, कोईरी और राजभर वोटर खड़े नजर आये। यहां दीगर बात यह है कि ठाकुर वोटर उस तरह उपेन्द्र शुक्ल के पाले में नहीं खड़ा हुआ जिसकी उम्मीद खुद योगी आदित्यनाथ कर रहे थे। लोकसभा सीट के पौने तीन लाख वोटर निषाद, डेढ़ लाख मुस्लिम और सवा लाख के करीब यादव वोटर सपा के पक्ष में मजबूती से खड़े नजर आये। दलित वोट भी सपा की तरफ आये लेकिन 40 फीसदी तक भाजपा की तरफ भी गये।

सपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि दलित वोट पूरी तरह सपा प्रत्याशी को मिले होते तो जीत-हार का आकड़ा 75 हजार से अधिक होता। भाजपा ने भी जातीय संतुलन को सांधने के लिए जातिवार मंत्रियों को विभिन्न क्षेत्रों में उतारा लेकिन इस रणनीति में सपा आगे निकलती दिखी। सपा के दिग्गज मीडिया से दूर रहकर जातिगत आधार पर गुप्त बैठकें कर माहौल बनाने में कामयाब हुए। वहीं दूसरी तरफ भाजपा नेता प्रेस वार्ता और फेसबुक पर फोटो अपलोड़ कर खुद की उपस्थिति दर्ज कराने में व्यस्त दिखे।

आॅक्सीजन कांड बनी हार की बड़ी वजह

जिस बाबा राघव दास मेडिकल काॅलेज में सुविधाओं को लेकर योगी आदित्यनाथ सड़कों से लेकर संसद तक आवाज बुलंद करते थे, उसी मेडिकल काॅलेज में पिछले 10 और 11 अगस्त को 36 से अधिक मासूमों की मौत हो गई। आॅक्सीजन की कमी से मासूमों की मौत पर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाये सिर्फ डाॅक्टरों और सप्लायर पर गांज गिराना भी लोगों को रास नहीं आया। प्रदेश सरकार ने डाॅ कफील से लेकर प्राचार्य डाॅ राजीव मिश्रा को तो जेल भेज दिया लेकिन आॅक्सीजन सप्लाई करने वाली फर्म पुष्पा सेल्स का भुगतान रोकने वाले डीएम राजीव रौतेला और कमिश्नर अनिल कुमार को अभयदान दे दिया।

इतना ही नहीं मामले को लेकर योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह गोरखपुर पहुंचे तो मासूमों के दर्द पर मरहम लगाने के बजाये साजिश की बात कहते रहे। उनका बयान, अगस्त में तो मौतें होती ही हैं ने सरकार की खूब किरकिरी कराई। अपने लाडलों को खोने वालों का दर्द था कि प्रदेश सरकार ने मासूमों का न तो पोस्टमार्टम कराया न ही कोई आर्थिक मदद ही दी। घटना के बाद न सिर्फ मौतों के आकड़ों को लेकर प्रशासन ने सेंसरशिप लगा दी बल्कि वादों के उलट कोई सुविधा भी नहीं दी। विपक्ष जहां मुददे को सियासी रंग देने में कामयाब रहा, वहीं योगी इस मामले में चूक दर चूक करते रहे।

सपा के राष्टीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी आॅक्सीजन की कमी के चलते मरे बच्चों के परिजनों से मिले लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संवेदना का बोल बोलना भर जरूरी नहीं समझा। घटना के वक्त मरे मासूमों के परिजनों को आर्थिक मदद देकर सपा मुखिया अखिलेश यादव और कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी ने संवेदना की सियासत में बढ़त बना ली। इस मुददे को अखिलेश यादव ने गोरखपुर की जनसभा में जमकर उछाला भी।

नौकरशाही से गुस्से में कार्यकर्ताओं ने चुनाव से खुद को अलग रखा

भाजपा की तरफ से चुनाव भले ही उपेन्द्र दत्त शुक्ल खड़े थे लेकिन चर्चा यहीं थी कि चुनावी मैदान में पहले नंबर के प्रत्याशी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं तो दूसरे नंबर के डीएम राजीव रौतेला। एसएसपी अनिरूद्ध सत्यार्थ पंकज और कमिश्नर अनिल कुमार की भूमिका को लेकर भर सवाल उठते रहे। नौकरशाही के प्रति लोगों के नजरिये को मतगणना के दिन फेसबुक पर एक भाजपा कार्यकर्ता के पोस्ट से समझा भी जा सकता है। 20 हजार से अधिक मतों से पिछड़ने पर एक कार्यकर्ता ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि मुख्यमंत्री जी धैर्य रखें डीएम राजीव रौतेला पिच पर हैं।

डीएम राजीव रौतेला चुनाव को किस कतर प्रभावित कर रहे थे यह मतगणना के दिन साफ भी हो गया। जब नौ राउंड की गणना के बाद भी सिर्फ एक की घोषणा की गई। जिसमें भाजपा प्रत्याशी आगे थे। डीएम के चलते लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भाजपा की फजीहत झेलनी पड़ी। एसएसपी की सांसद कमलेश पासवान से तल्ख झड़प तो सुर्खियां बनीं लेकिन तमाम ऐसे प्रकरण हुए जब डीएम और एसएसपी ने कार्यकर्ताओं को बेईज्जत करने का मौका नहीं छोड़ा।

कार्यकर्ताओं में अफसरों को लेकर गुस्से को सपा ने खूब भुनाया भी। प्रवीण निषाद के पिता डाॅ संजय निषाद कहते हैं कि डीएम राजीव रौतेला को रामपुर में अवैध खनन मामले में हाईकोर्ट ने निलंबित करने का आदेश जारी कर रखा है, लेकिन मुख्यमंत्री का प्रिय अपनी कुर्सी पर जमा हुआ है। मिटटी खनन में डीएम के अड़ियल रवैये का गुस्सा भी चुनाव में देखने को मिला। मिटटी और बालू की महंगाई भी चुनाव में मुददा बनीं। सांसद, विधायक से लेकर संगठन से जुड़े भाजपा नेताओं का दर्द है कि डीएम, एसएसपी पैरवी सुनना तो दूर सामान्य शिष्टाचार भी नहीं निभाते हैं। एक विधायक ने तो यहां तक आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के सामने डीएम कुर्सी पर बैठते हैं और हमें खड़ा रहना पड़ता है।

भारी पड़ा सांप छछूंदर का बयान

पूरे चुनाव को भाजपा कार्यकर्ताओं ने हवा में लड़ा। उसे भ्रम था कि मोदी और योगी इफेक्ट के चलते भाजपा प्रत्याशी की नैया आसानी से पार हो जाएगी। खुद योगी आदित्यनाथ तो ऐसी खुशफहमी में नहीं थे लेकिन अन्य बड़े कार्यकर्ता गफलत में फंसे रहे कि योगी और मोदी की हवां में हार हो ही नहीं सकती है। जीत को लेकर योगी की चिंता ही थी गोरखपुर में उन्होंने 15 सभाएं कीं। कोई भी विधानसभा छूटा नहीं। इतना ही नहीं चुनाव से पहले योगी ने विधानसभावार करोड़ों की योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण कर विकास का दांव खेला था। लेकिन चुनावी सभाओं में योगी द्वारा सपा और बसपा के गठबंधन की तुलना सांप-छछूंदर से करना पार्टी को भारी पड़ा। खुद अखिलेश यादव ने गोरखपुर और फूलपुर की सभा में इसे जोरशोर से उछाल का जातिय अस्मिता से जोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा विरोध करने वाली जातियां पूरी मजबूती से एकजुट हुईं। मतगणना के बाद जीत की सुंगध मिलने के बाद बुआ-बबुआ जिंदाबाद से अधिक सांप-छछूंदर जिंदाबाद का नारा लगा। इसे वोटरों के गुस्से के रूप में देखा जा रहा है।

उपेन्द्र की बीमारी से भी हुआ बड़ा नुकसान

चुनाव प्रचार के दौरान ही भाजपा प्रत्याशी उपेन्द्र दत्त शुक्ला का बीमार होकर पांच दिनों तक पीजीआई में भर्ती होना भी भाजपा पर भारी पड़ा। होली के एक दिन पहले अचानक सिर में चोट के चलते उपेन्द्र को पीजीआई में भर्ती कराना पड़ा था। भाजपा के कार्यकर्ता और खुद उपेन्द्र इस बीमारी को मीडिया में आने से बचा रहे थे लेकिन योगी के खुद पीजीआई में पहुंचने के बाद पूरा मामला मीडिया में आ गया। बीमारी को उपेन्द्र ने अपने पक्ष में करने की कोशिश की लेकिन युवा सपा प्रत्याशी के आगे उनका दांव उल्टा पड़ा।

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