गोरखपुर

धरोहरों को बचाने में शासन प्रशासन नाकाम, ऐतिहासिक उत्तर जेल को गिराकर बनेगी विधि विज्ञान प्रयोगशाला

NORTHERN-JAIL-TO-BE-DEMOLISगोरखपुर: शहर के इतिहास को समझने व जानने की चंद धरोहरें ही बची हुई है। चाहे वह बसंतपुर सराय, मोती जेल, होम्स क्लनन लाइब्रेरी हो या उत्तर जेल (सदर लॉकप)। सभी के संरक्षण के बजाय नवनिमार्ण में ही रुचि ली जा रही है।
सालों से जीर्ण-शीर्ण धरोहरों को बचाने में शासन प्रशासन नाकाम रहा है। पहले नगर निगम ने बसंतपुर सराय को कमजोर बता, गिराने का मन बनाया लेकिन जनता के विरोध की वजह से अरमान पूरे ना हो सके। अब बारी हैं जिला अस्पताल के पास मौजूद ऐतिहासिक उत्तर जेल (सदर लॉकप) को गिराकर विधि विज्ञान प्रयोगशाला बनाने के लिए गिराने का कार्य भी शुरु हो चुका है। जल्द ही इस 148 साल पुराने धरोहर को नेस्तोनाबूद कर दिया जायेगा।
मण्लीय कारागार के वरिष्ठ जेल अधीक्षक एसके शर्मा के मुताबिक लगभग 1868 ई. में इसका निर्माण अंग्रेजों ने करवाया था। लेकिन इस बात का कोई रिकार्ड नहीं मिला है कि यहां जंगे आजादी के मतवाले रखे जाते थे ।बाद में लॉकप का का उपयोग बाल कारागार के रुप में किया जाने जाने लगा ।सन् 1986 ई. में इसे बंद कर दिया गया।
Northern-jail-1सन् 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कुछ सालों बाद इसका निर्माण हुआ ।भले ही रिकार्ड इस बात की तस्दीक ना करते हो कि यहां आजादी के मतवाले रखे जाते हो लेकिन समय इस बात की गवाही देता है कि जंगे आजादी के दौरान यहां जंगे आजादी के मतवाले रखे जाते रहे होगें ,क्योंकि वह दौर जंगे आजादी का रहा ।लालडिग्गी स्थित जेल जब खस्ताहाल हुई तो कैदियों को यहीं रखा जाता रहा।
जब सन् 1895 ई. में मंडल कारागार बना तो इस जेल का महत्व कम हो गया। तारीख के बहुत से पन्ने है जो गुमशुदा है शायद यह जेल उन गुमशुदा पन्नों की गवाह रही हो ।
Northern-jailकरीब 30 साल से बंद स़े तीन एकड़ में फैली दर्जनों छोटी-छोटी बैरकों वाली यह जेल जल्द जमींदोंज हो जायेगी ।इसकी जगह तैयार होगी नयी विधि विज्ञान प्रयोगशाला। जेसीबी मशीन लगी हुई है।
काफी दिनों से बंद रहने की वजह से झाड़ियों ने सभी बैरकों को अपने आगोश में ले लिया हैं। परिसर के अंदर कई कब्रें भी हैं कुछ मुसलमानों की हैं तो कुछ ईसाईयों की हैं ।अभी चंद दिनों से ही काम शुरु हुआ है।
खडंहर के रुप में दिखनी वाली ऐतिहासिक इमारत इधर से गुजरने वालों का सिर्फ ध्यान खींच ले रही हैं। इस जेल को ऐतिहासिक इमारत के रुप में संरक्षित किया जा सकता था ।लेकिन ऐसा नहीं हो सका। ऐतिहासिक स्थलों के संजोने व संवारने करने वाली संस्था इंटेक ने भी इसमें रुचि नहीं दिखायी।
ना ही इतिहासकारों ने इसमें रुचि ली ।फिलहाल यह जेल गुमनाम थी और गुमनाम ही दफन हो जायेगी।
मोती जेल का वजूद भी खत्म होने के कागार पर
लालडिग्गी के पास स्थित डोमखाना कभी ब्रिटिश हुकूमत की जेल हुआ करती थी। यहां प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को फांसी दी गई थी। इतिहास के पन्नों में यह मोती जेल के नाम से दर्ज है। इतिहासकार बताते हैं कि यहां शाहपुर स्टेट के शाह इनायत अली शाह, जगदीशपुर स्टेट के कुंवर सिंह के भाई को फांसी दी गई थी।
फांसी देने से पूर्व तरकुलहा देवी के अनन्य भक्त बाबू बंधू सिंह को यहीं रखा गया था।वर्तमान में शहर का डोमखाना (अंग्रेजों कीमोती जेल) संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रहा है। यहां से जेल स्थानांतरित होने के बाद यहां डोम जाति लोगों ने अपना कब्जा जमा लिया।
Northern-jail-2काफी लंबे चौड़े इलाके में फैली इस जेल में कभी आजादी के मतवालों को कैद रखा जाता था। इस एतिहासिक जेल परिसर में स्थित अनेक ऐतिहासिक धरोहर मिटने के कगार पर है। जेल में स्थित कुएं में क्रांतिकारी शाह इनायत अली को फांसी दी गईथी। इसके अलावा अनेक क्रांतिकारियों कोइसी कुएं में दफन कर दिया गया था। इस कुएं को मोती जेल का खूनी कुआं के नाम से जाना जाता है। इस कुएं की मुड़ेर पर वह कील आज भी मौजूद है जिससे लटकाकर क्रांतिकारियों को फांसी दी जाती थी।
परिसर में स्थित सैकड़ों साल पुराना विशालकाय पाकड़ का पेड़ आजादी का गवाह है। अनेक क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। सतासी राजा बसंत सिंह का महल और किले को सन् 1802 ई. में अंग्रेजों ने ध्वस्त कर उसे मोती जेल के रूप में परिवर्तित कर दिया था। वर्तमान समय में यहां डोम जाति के लोगों का निवास है। जेल के चारों तरफ ऊंची दीवार है दीवार का कुछ हिस्सा गिर चुका है।

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