गोरखपुर

DDU विश्यविधालय आकर राजनाथ सिंह ने गोरखपुर में गुजारे शैक्षणिक जीवन का दोबारा किया अनुभव

daysगोरखपुर: केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने मुख्य आतिथ्य में दीक्षांत समारोह में शामिल छात्रो को संबोधित करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय का पुर्व छात्र होने के नाते इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनना सौभाग्य है। इसीलिए मैंने यहाँ कार्यक्रम में शामिल होने की सहर्ष अनुमति भी दी थी। सौभाग्य का कारण ये नही कि मै मुख्य अतिथि हूँ बल्कि यहाँ गुजारे शैक्षणिक जीवन का दोबारा अनुभव भी करना है।
उन्होंने छात्रो को उनके अग्रिम भविष्य की शुभकामनायें देते हुए कहा कि पं दीन दयाल जी के नाम से पड़े इस विश्वविद्यालय से आप सभी अब खुले आसमान की और उड़ने जा रहे है। किन्तु पंडित जी के कथन को गाँठ बांधकर अपने जीवन में समावेशित कर लीजिये।
उनके अनुसार व्यक्ति का एकांगी नहीं बल्कि सर्वांगिड़ विकाश होना चाहिए और सर्वांगिड़ विकास के लिए एक व्यक्ति में तन मन बुद्धि और आत्मा का समावेश होना चाहिए। जिसमे मनुष्य को तन के लिए धन धान्य , मन को मान सम्मान और स्वाभिमान , बुद्धि को ज्ञान और आत्मा को भगवान् चाहिए।
गोरखपुर शहर के नाम पर जिक्र करते हुए उन्होंने इसे गुरु गोरक्षनाथ के नाम से लिया जाना बताया। कहा की डिग्री हासिल कर अपने चरित्र बल पर ध्यान दे। एक उदहारण बताते हुए उन्होंने कहा कि आज आतंकवाद और इनफ़ोसिस दोनों का नाम सुनने को बहुतायत मिलता है इस दोनों में युवा ही शामिल है और दोनों को ही हाइली क्वालिफैड लोग ऑर्गनाइज कर रहे है। फर्क सिर्फ इतना है कि आतंकवाद विध्वंसात्मक प्रतिभा का प्रतिक है तो इनफ़ोसिस सृजनात्मक प्रतिभा का। फर्क सिर्फ सोच का है। इसलिए जीवन की सोच हमेसा सृजनात्मक रखे। अपने डिग्री का उपयोग जीवन यापन के साथ राष्ट्रनिर्माण में करे। हम ही नही पूरा विश्व मानता है कि भारत शुरू से ही विश्वगुरु रहा है। अब फिर से इसे अपनी क्षमताओ का उपयोग कर उसी विश्वगुरु का दर्जा देना है।
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कहा कि हम दुनिया के दिल में अटॉमिक, इकोनोमिक सुपर पॉवर बनकर नही बल्कि अपने बेहतर क्षमताओ से महान भारत बनकर विश्वगुरु बनाएंगे। क्योंकि विश्वगुरु बनने के सार फन्डामेन्टल हमारे यहां मौजूद है। ये बाते हम नहीं बल्कि पूरी दुनिया ने अपने शोधो में पाया है की विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता भारत की है। साथ ही बताया कि पृथ्वी के बारे में पहले ही हमारे मनीषियों ने कह दिया था कि इसकी उत्पत्ति 1.96 अरब वर्ष पुर्व की है और इस प्रकरण को योरोपीय देशो ने भी अपने शोधो में मान लिया है। इसलिए चरित्र निर्माण पर विशेष बल दीजिये। गुरु कैसा भी हो किन्तु जब भी उसकी और देखे तो केवल उसमे सद्गुण ही देखे। व्यक्ति का कद का मूल्यांकन उसके कृतियों के कारन होना चाहिए।
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दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ 34वाँ दीक्षांत समारोह, बेटियों ने मारी बाज़ी

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