गोरखपुर

राइड फार जेंडर फ्रीडम: लैंगिक आज़ादी के लिए साईकिल यात्रा कर देश को जागरूक कर रहे राकेश

Rakesh-of-ride-for-gender-eगोरखपुर: घर से ही हिंसा की शुरुआत होती है जो आगे चलकर समाज को विदूषित करती है। कैसे सम्भव है कि जो बच्चा घर में रोज किसी न किसी रूप में हिंसा देखता हो वो समाज में जाकर हिंसा करने के लिए उग्र न हो। कुछ इसी सोच के साथ बिहार के शिवहर जनपद के तरयाना थानाक्षेत्र निवासी राकेश सिंह 42 वर्ष ने देश में जेंडर आधारित हिंसा पर खुद की समझ बढ़ाने और सम्बन्धित विषय पर लोगों खासकर युवाओं, नौजवानों से संवाद करने के लिए उद्देश्य से 28 माह से साइकिल से देश का भ्रमण कर रहे है। अब तक वह 13,500 किलोमीटर साइकिल चलाकर देश के नौ राज्यों का भ्रमण कर चुके है।
‘राइड फार जेंडर फ्रीडम ’ नाम की यह अनूठी यात्रा 15 मार्च 2014 से प्रारम्भ होकर दो वर्ष बाद 2018 मे उनके पैतृक गांव तरियानी छपरा, जनपद शिवहर में अंतरराष्ट्रीय युवा महोत्सवं के साथ ही समाप्त होगी।
राकेश दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर चुके हैं।आगे वह सीएसडीएस में दश वर्षो तक सेवा देने के साथ ही मोजरवियर कम्पनी में कारपोरेट कम्युनिकेशन ऑफिसर भी रहे। बाद के लगभग छह माह तक लगभग तीन दर्जन तेज़ाब विक्टिम्स से मिलने के बाद इस मुद्दे पर आमजन को झकझोरने के लिए साईकिल यात्रा के माध्यम से निकल पड़े पुरे देश का भ्रमण करने।
Rakeshउनका कहना है कि लोग पुत्रियों के पैदा होने पर लक्ष्मी आयी है कहकर खुशिया मनाते है किंतु बाद में वही लोग उसे पराया धन कहकर दहेज़ के लिए उसपर ये न करो ,वो न करो का प्रतिबंध लगाना शुरू कर देते है। आखिर क्यों, क्या हम लड़कियों को उनके पैरों पर खड़ा होने की हिम्मत देकर उनके लक्ष्मी स्वरुप को जिन्दा नही रख सकते है। आज हर समाज में दहेज़ का दांनव खड़ा है, तो पहले दहेज़ को असलियत में खत्म करिये तो बेटियां खुद ब खुद पराया धन की परिभाषा बदलकर लक्ष्मीस्वरूपा हो जाएंगी।
15 मार्च 2014 को चेन्नई से साइकिल से यात्रा की शुरुआत कर भारत भ्रमण पर निकले राकेश ने पांडिचेरी, केरल, कर्नाटक, तेलगांना, आन्ध्र प्रदेश, ओडीसा होते हुए बिहार आए। बिहार में आने के बाद वह ढाई हफते के लिए नेपाल के निचले हिस्से में भी गए और वहां बाल्मीकिनगर, नवलपरासी, भैरहवां, लुम्बिनी, कपिलवस्तु, चितवन, बीरगंज होते हुए फिर बिहार आए और अब वह यूपी में हैं।
Rakesh-1राकेश ने बताया कि वह इस यात्रा में सिर्फ 50 से 80 कीलोमीटर साइकील ही नहीं चलाते वरन हर रोज कम से कम चार जगहों पर रूक कर लोगों खासकर नौजवानों से बातचीत करते हैं और जेंडर के बारे में उनकी सोच बदलने की कोशिश करते हैं। वह कालेजों व स्कूलों में जाते हैं और बातचीत करते हैं। रास्ते में चौराहों पर रूक कर माइक्रोफोन से बोलना शुरू करते हैं और जब लोग जुट जाते हैं तो संवाद का दौर शुरू होता है। विद्युत उपलब्धता के आधार पर फिल्मों को दिखाकर जेंडर भेदभाव, स्त्रियों पर हिंसा के विभिन्न रूपों पर बातचीत करते हैं।
राकेश ने कहा कि वह इस यात्रा के जरिए यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि लोग जेंडर को कैसे समझते हैं और जेंडराइजेशन की प्रक्रिया क्या है। क्यों एक किशोर या वयस्क किसी स्त्री पर शारीरिक या माननसिक हिंसा करता है ?
उनका कहना है कि आजादी के बाद से महिलाओं पर हिंसा रोकने के लिए कई कानून बने और कई कानूनों को सख्त बनाया गया फिर भी हिंसा रूक नहीं रही बल्कि बढ़ रही, क्योंकि प्राथमिक तौर पर यह सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। इसकी जड़ में हमारे समाज और परिवार हैं। आखिर एक बच्चा परिवार में ही लड़कियों और महिलाओं से होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार को देखता है और इससे सीखता है। वह अपनी मां को पिता से दुर्व्यवहार, हिंसा होते देखता है। यह सब देखते हुए उसकी मानसिकता निर्मित होती है।
उनका कहना की घरों और परिवारों में परम्परा के नाम पर होने वाले इस लैंगिक भेदभाव के खिलाफ मजबूत संघर्ष नहीं हो रहा है। अच्छे खासे अपने को प्रगतिशील और उदारवादी कहने वाले भी इसके विरूद्ध लड़ने की ताकत नहीं रखते हैं। वह कहते है कि दुनिया को बदलने से पहले हमें अपने आंगन को हिंसा रहित बनाना होगा। अब दुनिया में जातीय,लैंगिक, धार्मिक वर्चस्व पुनर्स्थापित करने का समय चल रहा है।इसमें काफी कुछ दकियानूसी विचारधाराएं टूटेंगी।
वह कहते है कि बिहार सरकार ने अपने पंचायत चुनावों में 50 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को दिया तो बहुत ख़ुशी हुई, किन्तु हुआ क्या आज निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियो की जगह सत्ता की बागडोर उनके पिता,पति और पुत्र सम्हाल रहे है।
वह कहते हैं कि दक्षिण भारत में उत्तर भारत के मुकाबले स्त्रियां सार्वजनिक स्थानों पर खूब दिखती हैं। वहां भी जेंडर भेदभाव है लेकिन उन्होंने अपने लिए एक स्पेस बनाया है। उत्तर भारत में लोग अपनी औरतों को लेकर ज्यादा डरे हुए हैं। दक्षिण भारत के कई राज्यों में थर्ड जेंडर काफी मुखर हैं हालांकि लोगों का नजरिया उनके प्रति उसी तरह है जैसे उत्तर भारत में हैं।
राकेश चाहते हैं कि वह एक ऐसा स्पेस बनाएं जहां स्टीरियोटाइप जेंडर जैसी कोई बात नहीं हो। वहां हर तरह के शोषण, भेदभाव के बिना रह सकें और अपने हुनर व क्षमता का का अधिकतम इस्तेमाल कर सकें। उनकी यात्रा का खर्च के बारे में पूछने पर बताते है कि हर जगह पर उनके मित्र उनके फ़ेसबुक पेज राइड फ़ॉर जेंडर फ्रीडम से जुड़े है,जो जगह जगह पर उनका ख्याल रखते है।

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