इतिहास बन जायेगी खटर-खटर की मीठी आवाज, नोटबन्दी के असर से प्रभावित हुआ हथकरघा उद्योग

गोरखपुर: कभी हथकरघे की खटर-पटर की मीठी आवाज से गुंजायमान रहने वाला महानगर का पूर्वी किनारा इन दिनों सूना-सुना सा दिख रहा है। इस इलाके के अंधियारी बाग, रसूलपुर, डोमिनगढ़ सहित 10 किमी के दायरे में बुनकरो के हथकरघा की खट-खट की आवाज अब इतिहास बनने की ओर अग्रसर है।

बता दें कि आजादी के बाद से ही महानगर के पूर्वी सिरे पर बसे इस इलाके के अंधियारी बाग, रसूलपुर, डोमिनगढ़ सहित 10 किमी के दायरे में बुनकरो के हथकरघा की खट-खट की आवाज के बीच दिन-रात की हाड़तोड़ मेहनत से परिवार की आजीविका चलाते हैं। 16 से 18 घंटे की मेहनत के बाद बमुश्किल 200 से 250 रुपये ही हाथ में आता है। दो जून की रोजी-रोटी की जुगत में पूरा परिवार जुटा रहता है।

लेकिन 1000 और 500 के नोट बंद हो जाने से बुनकरों के व्यापार मे काफी कमी आ गई है। उनके माल गोदाम मे धूल फाकते नजर आ रहे है। यही नहीं कुछ बुनकर तो बाजार से काम लेना भी बंद कर दिये है ,वजह यह कि बड़े व्यापारी उनको पूरा पैसा नहीं दे पा रहे है। जिससे उनको रा मटेरियल (कच्चा माल) को खरीदने मे दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।

कुछ बुनकरों का कहना है कि नोट बंदी की वजह से हमे घर के खर्चे मे भी कटौती करनी पड़ रही है। अगर हम बैंक मे जाते है तो हमे अपनी एक दिन की दिहाड़ी को भी छोड़ कर जाना पड़ रहा है और इतनी मेंहनत के बाद भी मात्र 2000 रुपये ही मिल पा रहा है। जिससे हम लोगो को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

जबकि कुछ बुनकरो ने नोटबन्दी का स्वागत करते हुए कहा कि सरकार ने जो 1000 और 500 के नोटो को बंद करने काम किया है वो सराहनीय है ,लेकिन छोटे उद्योगों पर सरकार को ध्यान दे कर उनको कुछ वरीयता देनी चाहिए। बुनकरों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके पास अपना बाज़ार नहीं है। पहले प्रदेश के कई बड़े शहरों और नेपाल तक में उनके हाथ के बने सामानों के लिए बड़ा बाज़ार मिल जाता था। वहाँ पर उनके बनाए सामानों कि पूछ और कद्र भी होती थी, लेकिन अब उनकी पूछ कहाँ है। नतीजा हथकरघा उद्योग अब दम तोड़ने कि कगार पर है और अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है।

साथ ही पहले बुनकर खुद अपना कारोबार करते थे, लेकिन अब वह बड़े उद्योगपतियों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए हैं। कारण भी साफ है । पहले हथकरघा चलता था, तो बुनकरों के चेहरे पर खुशी भी होती थी, लेकिन अब उनके पास बाज़ार नहीं है। नतीजा बाजार नहीं मिलने के कारण बड़े उद्योगपतियों ने इनकी रोजी-रोटी पर ही कब्जा जमा लिया।

बड़े उद्योगपतियों के इस बाजार में कूदने के कारण हथकरघा ने पावरलूम कि शक्ल ले ली। अब बिजली से चलने वाले पावरलूम के कारण हथकरघा नाममात्र का रह गया और बुनकर बड़े उद्योगपतियों द्वारा लगाए गए पावरलूम पर काम करने के लिए मजबूर हो गए। इसका कारण यह था कि हथकरघा के आगे पावरलूम से बने कपड़ों कि गुणवत्ता और उत्पादन में जमीन आसमान का फर्क था।बहुत से बुनकर अपने मशीन को बेच कर दूसरा धंधा शुरू कर दिये है और तो और धागे और रंग महगे हो गए लेकिन बुनकरो की कमाई आजादी के समय से भी बदतर हो गई है।