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मप्र : राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता परिवार देश छोड़ने को मजबूर

National-Award-winning-famiधार (मध्य प्रदेश): मध्यप्रदेश के धार जिले को बाघ प्रिंट (कपड़ों पर छपाई) के मामले में अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिला चुका और कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुका खत्री परिवार असहिष्णुता के दंश झेलने के बाद देश छोड़कर अमेरिका में बसने का मन बना चुका है।
यहां जारी हिंसक घटनाओं से यह परिवार खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है और देश छोड़कर जाने के लिए मजबूर है।
खत्री परिवार के सदस्य यूसुफ ने बुधवार को आईएएनएस से कहा कि पिछले कई वर्षो से हिंदूवादी संगठन से जुड़े लोग उनके परिवार व अन्य लोगों को निशाना बना रहे हैं। दो साल पहले उन पर भी हमला किया गया था। अब लड़की से छेड़छाड़ के एक झूठे मामले में मुस्लिम परिवार के दो युवकों को फंसाया गया है। हालांकि ये युवक उनके परिवार के नहीं हैं, इसके बावजूद उन पर हमला किया जा रहा है।
यूसुफ ने कहा कि हाल ही में, छह जनवरी को इस परिवार के दो सदस्यों-अब्दुल करीम और दाऊद पर नमाज पढ़कर लौटते वक्त हमला हुआ, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए। दाऊद को इलाज के लिए गुजरात जाना पड़ा। इसके बाद नौ जनवरी को किसी ने उनके कारखाने में आग लगा दी। इस आगजनी में कई और दुकानें जल गईं।
यूसुफ का कहना है कि पहले हमला और उसके बाद कारखाने में आग लगाने वालों पर पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस के इस रवैये से उन्हें लगने लगा है कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो उनके परिवार के सदस्यों की ‘हत्या’ तक हो सकती है। ऐसे में उनके लिए देश छोड़ना ही बेहतर है।
कुक्षी क्षेत्र के अनुविभागीय अधिकारी, पुलिस (एसडीओ,पी) सोहन पाल चौधरी ने आईएएनएस को बताया कि मारपीट और आगजनी के मामले में दोनों पक्षों के 18-18 लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया है। इसमें एक पक्ष (मुस्लिम) के 18 और दूसरे पक्ष (हिंदू) के 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। दो आरोपी बुजुर्ग हैं, इसलिए उन्हें फिलहाल गिरफ्तार नहीं किया गया है।
वहीं खत्री परिवार का कहना है कि सच तो यह है कि जिन दो लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया है, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े हैं।
धार जिले में एक कस्बे का नाम बाघ है। कस्बे का यह नाम यहां बाघ की गुफाओं और बाघिनी नामक नदी के कारण पड़ा है। इस इलाके की प्रिंट (छपाई कपड़े आदि पर) को नई पहचान देने वालों में खत्री परिवार प्रमुख है। इस परिवार के छह सदस्यों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।
बाघ प्रिंट पर किताब लिख चुके यूसुफ के पिता इस्माइल खत्री (तीन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त) से अच्छी तरह परिचित और बाघ प्रिंट के बारे में काफी लेखन कर चुके चिन्मय मिश्र ने कहा, “खत्री परिवार के पूर्वज लगभग एक हजार वर्ष पूर्व सिंध से धार के मनावर कस्बे में आए थे। उसके बाद इस परिवार ने लगभग छह दशक पहले बाघ कस्बे में पहुंचकर कपड़ों पर प्रिंट का काम शुरू किया।”
उन्होंने कहा कि यह परिवार बाघ इसलिए गया, क्योंकि बाघिनी नदी के पानी में कॉपर सल्फेट की मात्रा ज्यादा है। यह पानी प्रिंटिंग में मददगार होता है। इस परिवार ने अपना कारोबार बढ़ाने के साथ इस क्षेत्र के आदिवासी परिवारों को भी प्रिंटिंग कला में दक्ष किया है। हजारों परिवार इस कला के जरिए अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।
सवाल यह भी है कि यह परिवार अमेरिका ही क्यों जाना चाहता है? जवाब में यूसुफ खत्री ने कहा कि वह एक बार अमेरिका गए थे। वहां न्यू मेक्सिको के नजदीक एक गांव सेंटा फे है, जहां का पानी और आबोहवा उन्हें इस कारोबार के अनुकूल लगा, लिहाजा अब वे वहां बसने का मन बना रहे हैं।

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