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जानें पूर्वांचल के इस ‘डॉन’ के बारे में, उम्र 90 के करीब पर रसूख युवाओं से भी ज्यादा!

गोरखपुर (राजीव आर तिवारी): वैसे आप भी जानते ही होंगे कि ‘हाता’ शब्द सुनते ही भाषा विज्ञानियों को एक ऊंची चाहरदीवारी वाले लम्बे-चौड़े परिसर का भान होने लगता है। इसका शाब्दिक अर्थ भी कुछ इसी तरह का होता है। पर, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्वी और बिहार के पश्चिमी हिस्से में ‘हाता’ शब्द अनूठे ढंग से अपने स्वरूप को बदलता हुआ प्रतीत होता है। यहां ‘हाता’ का मतलब धर्मशाला वाला ‘हाता’, गोरखपुर वाला ‘हाता’, बाबा का ‘हाता’, तिवारीजी का ‘हाता’, मंत्रीजी का ‘हाता’, हरिशंकर तिवारी का ‘हाता’ आदि होता है।
यूं कहें कि यहां ज्योंहीं ‘हाता’ की चर्चा होती है, लोग समझ जाते हैं कि इस चर्चा के केन्द्र में कौन है। करीब-करीब पूरी बात समझ में आ ही गई होगी कि हम कहना क्या चाहते हैं। जैसा कि बताया गया कि देश में जेल के सींखचों के भीतर से चुनाव जीतकर रिकार्ड बनाने वाले पं. हरिशंकर तिवारी 89 वर्ष के हो गए हैं, लेकिन रसूख अब भी किसी नौजवान से ज्यादा है।
गोरखपुर में 24 अप्रैल को पूर्व मंत्री पं. हरिशंकर तिवारी अपने विधायक और पूर्व सासंद बेटे के साथ जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना दिया। वहीं बड़ी संख्या में बसपा के कार्यकर्ता एवं तिवारी परिवार के समर्थक धरनास्थल पर जुटे हुए थे। मौके पर खुद हरिशंकर तिवारी, कुशल तिवारी एवं विनय शंकर तिवारी भी धरने पर बैठे। यूपी विधान परिषद के पूर्व सभापति एवं हरिशंकर तिवारी के भांजे गणेश शंकर पांडेय सहित अनेक नेता भी वहां पहुंचे।
धरना का नेतृत्व कर रहे बसपा विधायक विनय शंकर तिवारी ने कहा कि ‘हाता’ में पुलिस के छापे सरकार (सीएम आदित्यनाथ योगी) के इशारे पर की गई बदले की कार्रवाई है। उन्होंने कहा कि बिना सर्च वारंट के पुलिस बलपूर्वक हमारे आवास में घुसी। यह हमारे परिवार को बदनाम करने की साजिश है। बता दें कि 21 अप्रैल की शाम गोरखपुर पुलिस ने सहजनवा में हुई लूट के एक मामले में पूर्व मंत्री पं. हरिशंकर तिवारी के घर छापेमारी की थी। पुलिस ने वहां से छह लोगों को हिरासत में लिया। बाद में पूछताछ के बाद इनमें से 5 लोगों को छोड़ दिया गया।
उक्त घटना कितनी संवैधानिक, कितनी सरकारी और कितनी पूर्वाग्रह से ग्रसित है? इस पचड़े में पड़ने के बजाय सीधे-सीधे सामाजिक चर्चा करें तो बेशक इस घटना से पूर्वांचल के पंडितों यानी ब्राह्मण बिरादरी के (पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार ब्राह्मण और राजपूत बिरादरी का गढ़ माना जाता है) लोगों को मानों जैसे सांप सूंघ गया है। बाबा यानी हरिशंकर तिवारी के ‘हाता’ में पुलिस क्यों गई, यही सवाल अमूमन हर जुबान पर है।
लोगों का कहना है की पूर्व सरकार में मंत्री रह चुके बाहुबली विनोद कुमार सिंह उर्फ़ पंडित सिंह, फैज़ाबाद के बीकापुर से विधायक बाहुबली विधायक जितेन्द्र सिंह उर्फ़ बब्लू भैया, पूर्व बाहुबली मंत्री राज किशोर सिंह, पूर्व मंत्री राधेश्याम सिंह, बाहुबली पूर्व सांसद धनंजय सिंह जैसे कई माफिया जिनके खिलाफ कई केस दर्ज हैं पर योगी सरकार तो कोई कार्यवाही नहीं कर रही है लेकिन एक चोर के कहने पर ऐसे घर में बिना किसी पूर्व सुचना के छापा मारा गया जो एक वर्तमान विधायक, पूर्व सांसद, पूर्व मंत्री, और पूर्व विधान परिषद् सभापति का निवास स्थान है।
हालांकि गोरखपुर के एसपी सिटी हेमराज मीणा ने उसी दिन यह स्पष्ट कर दिया था कि कुछ दिन पहले सहजनवा में हुए एक लूटकांड के मामले में वांक्षित सोनू पाठक की तलाश में पुलिस ने ‘हाता’ में दबिश दी थी (भले ही सोनू उस समय बलिया जेल में बंद था)। किन्तु, यह पुलिसिया स्पष्टीकरण ब्राह्मण बिरादरी के लोगों के गले नहीं उतर रहा है। लोग दबी जुबान कह रहे हैं कि आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ‘हाता’ में पुलिस का घुसना सीएम के कथित पूर्वाग्रह को दर्शाता है, क्योंकि सीएम राजपूत बिरादरी के हैं। इसी बात को बसपा विधायक और हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनय शंकर तिवारी खुलेआम कह रहे हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि यह इलाका ब्राह्मण और राजपूत बिरादरी के बीच के जंग की कई इबारत लिखता रहा है, पर दोनों बिरादरियों में मोहब्बत की गाथाएं भी कम नहीं हैं। शायद यही वजह रही है कि सियासी तौर पर एक साथ, एक मंच, एक सभा से दोनों बिरादरी के लोगों ने लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव तक भाजपा को वोट दिया है।
पर, हालात बता रहे हैं कि 21 अप्रैल की शाम ‘हाता’ में पुलिस की दबिश ने ब्राह्मणों और राजपूतों के रिश्ते के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी करने की नींव रख दी है। यह अलग बात है कि बसपा ने इसे सियासी मुद्दा बनाकर पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों के सम्मान की लड़ाई लड़ने की घोषणा की है, पर इलाके के ब्राह्मण यूपी के सीएम आदित्यनाथ योगी से यह जानना चाह रहे हैं कि क्या ब्राह्मणों ने भाजपा को वोट देकर कोई गलती कर दी है? क्या आदित्यनाथ योगी के सीएम बनने के बाद ब्राह्मणों के सम्मान से जीने का हक खत्म हो गया है? यदि यह मामला पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं है तो सीएम आदित्यनाथ योगी ने एक बिरादरी के सर्वमान्य व्यक्ति के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी? इस तरह के सवाल यहां के सियासी और सामाजिक हलकों में खूब गूंज रहे हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पं. हरिशंकर तिवारी गोरखपुर के रहने वाले हैं। राजनीति का अपराधीकरण गोरखपुर से शुरू हुआ था। हरिशंकर तिवारी इसके सबसे बड़े अगुवा थे। एक जमाने में पूर्वांचल की राजनीति में तिवारी की तूती बोलती थी। रेलवे से लेकर पीडब्ल्यूडी की ठेकेदारी में हरीशंकर तिवारी का कब्जा था। उसके दम पर तिवारी ने एक बहुत बड़ी मिल्कियत खड़ी कर ली।
उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि जेल में रहकर चुनाव जीतने वाले वह पहले नेता थे। उनको ब्राह्मणों का भी बड़ा नेता माना जाता है। यह हरिशंकर तिवारी का ही दबदबा है कि उनके बेटे और रिश्तेदार लोकसभा और विधानसभा का चुनाव जीतते आए हैं। दिलचस्प यह है कि हरिशंकर तिवारी के ‘हाता’ में पुलिस के घुसने के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया दिख रही है, उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि करीब 80 वर्ष के होने के बावजूद बाबा का जलवा कायम है। देखना यह है कि प्रतिक्रियास्वरूप क्या-क्या होता है?
परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन एक बात तो बिलकुल क्लियर हो गयी है की इस छापे ने लगभग एक दशक से राजनितिक रूप से हाशिये पर चल रहे पंडित हरिशंकर तिवारी और उनके परिवार को एक नयी ऊर्जा तो दे ही दी है।

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