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4 फरवरी को हुआ था चौरी चौरा कांड, जिसने रोक दी असहयोग आंदोलन की डगर

4 फरवरी को हुआ था चौरी चौरा कांड

गोरखपुर: आज 4 फरवरी है। आज के ही दिन 96 वर्ष पूर्व चल रहे स्वाधीनता संग्राम में 1922 में गोरखपुर का प्रसिद्ध चौरी चौरा काण्ड हुआ था, जिसमे 23 पुलिस कर्मियों समेत 34 जानें गयी थीं। जिसने नान वायलेंस मूवमेंट को एक नई दिशा दे दी थी। जिसकी याद में यहां पर एक शहीद स्मारक बना है,जहाँ लोग हर वर्ष आज के दिन क्रांतिकारियों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।

बता दें कि बर्तानिया हुकूमत के दौर में जिस समय क्रांतिकारियों पर जुल्मों सितम ढाए जा रहे थे।उसी समय महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा लेते हुए नान वायलेंस मूवमेंट की घोषणा की थी। इसके साथ ही महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, अंग्रेजी पढ़ाई छोड़ने और चरखा चलाकर कपड़े बनाने का अह्वान किया था। उनका यह सत्याग्रह आंदोलन पूरे देश में रंग ला ही रहा था कि दिन शनिवार 4 फरवरी 1922 को चौरी चौरा के भोपा बाजार में सत्याग्रही इकट्ठा हुए और थाने के सामने से जुलूस की शक्ल में गुजर रहे थे।

तत्कालीन थानेदार ने जुलूस को अवैध मजमा घोषित कर दिया।इस दौरान एक कार्यकर्ता की गांधी टोपी को सिपाही ने पांव से रौंद दिया। अपने नेता के सम्मान में पहनी जाने वाली इस टोपी को रौंदता देख सभी सत्याग्रही आक्रोशित हो गए। जिसका उन्होंने पुरजोर विरोध करना शुरू किया तो पुलिस ने जुलूस पर फायरिंग शुरू कर दी।

फायरिंग से चारो तरफ चीख पुकार मच गई, इस दौरान गोलियों की जद में आने से 11 सत्याग्रही मौके पर ही शहीद हो गए,और लगभग 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए।इसी वक्त पुलिस की गोलियां भी समाप्त हो गयी थी और सत्याग्रहियों का रेला आगे बढ़ रहा था।जिसे देख घबराए पुलिसकर्मी थाने की तरफ भागे। फायरिंग से भड़की भीड़ ने उन्हें दौड़ा लिया।

मूंज और सरपत का बोझा थाना परिसर में बिछाकर उस पर केरोसीन उड़ेलकर आग लगा दी।आग की लपटें देखकर जब थानेदार ने भागने की कोशिश की तो भीड़ ने उसे पकड़कर आग में फेंक दिया। इस काण्ड में एक सिपाही भाग कर झंगहा पहुंचा और तत्कालीन कलेक्टर को उसने घटना की सूचना दी।तब तक आग अपने पुरे शबाब पर आ चुकी थी।

जिससे उसकी लपटों में आकर थानेदार गुप्तेश्वर सिंह, दरोगा पृथ्वी पाल सिंह, हेड कांस्टेबल वशीर खां, कपिलदेव सिंह, लखई सिंह, रघुवीर सिंह, विषेशर राम यादव, मुहम्मद अली, हसन खां, गदाबख्श खां, जमा खां, मगरू चौबे, रामबली पाण्डेय, कपिल देव, इन्द्रासन सिंह, रामलखन सिंह, मर्दाना खां, जगदेव सिंह, जगई सिंह, और चौकीदार बजीर, घिंसई,जथई व कतवारू राम की जलकर मौत हो गयी थी।इस घटना से नाराज ब्रितानिया शासन के निर्देश पर चौरीचौरा काण्ड के लिए पुलिस ने सैकड़ों लोगों को अभियुक्त बनाया।

जबकि गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के उपसभापति प. दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने घटना की सूचना गांधी जी को चिट्ठी लिखकर दी। इस घटना को हिंसक मानते हुए गांधी जी ने अपना असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया था।

जब घटना के सम्बंध में न्यायिक कार्रवाई शुरू हुई तो गोरखपुर सत्र न्यायालय के न्यायाधीश मिस्टर एचई होल्मस ने 9 जनवरी 1923 को 418 पेज के निर्णय में 172 अभियुक्तों को सजा-ए-मौत का फैसला सुनाया। दो को दो साल की कारावास और 47 को संदेह के लाभ में दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले के खिलाफ जिला कांग्रेस कमेटी गोरखपुर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अभियुक्तों की तरफ से अपील दाखिल की जिसका क्रमांक 51 सन 1923 था। इस अपील की पैरवी पं. मदन मोहन मालवीय ने की।

मुख्य न्यायाधीश सर ग्रिमउड पीयर्स तथा न्यायमूर्ति पीगट ने सुनवाई शुरू की। 30 अप्रैल 1923 को फैसला आया जिसके तहत 19 अभियुक्तों को मृत्यु दण्ड, 16 को काला पानी, इसके अलावा बचे लोगों को आठ, पांच व दो साल की सजा दी गई। तीन को दंगा भड़काने के लिए दो साल की सजा तथा 38 को छोड़ दिया गया।

जबकि घटना कारित करने के इल्जाम में अब्दुल्ला, भगवान, विक्रम, दुदही, काली चरण, लाल मुहम्मद, लौटी, महादेव, मेघू अली, नजर अली, रघुवीर, रामलगन, रामरूप, रूदाली, सहदेव, सम्पत पुत्र मोहन, संपत, श्याम सुंदर व सीताराम को घटना के लिए दोषी मानते हुए फांसी दे दी गई।

अंग्रेजी हुकूमत के समय स्वाधीनता की जंग में सम्भवत: यह देश का पहला यह काण्ड है।जिसमें पुलिस की गोली खाकर जान गंवाने वाले आजादी के दीवानों के अलावा गुस्से का शिकार बने पुलिसवाले भी शहीद माने जाते हैं। पुलिसवालों को अपनी ड्यूटी के लिए शहीद माना जाता है तो आजादी की लड़ाई में जान गवाने से सत्याग्रहियों को।

आज के दिन दोनों अपनी-अपनी शहादत दिवस के रूप में मनाते हैं। थाने के पास बनी समाधी पर पुलिसवाले शहीद पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि देते हैं। वहीं अंग्रेजी पुलिस के शिकार सत्याग्रहियों को पूरा देश श्रद्धांजलि देकर नमन करता है।

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