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नहीं रहे काल के कपाल पर लिखने-मिटाने वाले भारतीय राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक झूठ आज सच हो गया। भारत ने आज अपने दुलारे नेता अटल बिहारी वाजपेयी को खो दिया। चार बार देश के प्रधानमंत्री रह चुके 93 वर्षीय अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में आज शाम 5 बजकर पांच मिनट पर अंतिम साँस ली। आजीवन अविवाहित रहे भारत रत्न वाजपेयी बीते कई वर्षों से गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी पिछले दो माह से एम्स में भर्ती थे। उन्हें सांस लेने में परेशानी, यूरीन व किडनी में संक्रमण होने के कारण 11 जून को एम्स में भर्ती किया गया था।

आपको बता दें कि वाजपेयी काफी दिनों से बीमार थे और वह करीब 15 साल पहले राजनीति से संन्यास ले चुके थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर भाजपा की स्थापना की थी और उसे सत्ता के शिखर पहुंचाया। भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी सुपरहिट साबित हुई थी। अटल बिहारी देश के उन चुनिन्दा राजनेताओं में से हैं जिन्हें दूरदर्शी माना जाता था। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में ऐसे कई फैसले लिए जिसने देश और उनके खुदके राजनीतिक छवि को काफी मजबूती दी।

आज के वक्त में जब राजनीति में सुचिता केवल नाम की रह गयी है वैसे समय में कवि ह्रदय अटल बिहारी वाजपेयी का जाना भारतीय राजनीति में ऐसी शून्यता लाएगा जिसे भरा जाना शायद असम्भव ही है। पहले पूर्ण रूप से गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री वाजपेयी की छवि ऐसी थी कि विपक्षी भी उनके पीठ पीछे उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे। इस नेता की शक्शियत ऐसी थी कि विपक्षी यहाँ उनके लिए कहते थे ‘right man in a wrong party.’

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी का पूरा राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक जीवन मर्यादित, शोभनीय, संसदीय, सुचितापूर्ण रहा। सत्ता और विपक्ष में रहते हुए कोई बड़ा लांछन उन पर नहीं लगा। छवि ऐसी थी विरोधी भी उनके विचारों, रचनाओं और भावनाओं का बेहद सम्मान करते थे।

वाजपेयी अपने समय के शायद इकलौते नेता होंगे जिन्होंने चार राज्यों का प्रतिनिधित्व लोक सभा में किया। अटल उत्तर प्रदेश के बलरामपुर और लखनऊ से सांसद रहे। वो मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से भी चुन कर लोक सभा आये थे। इसके अतिरिक्त नई दिल्ली और ग्वालियर सीट का भी वाजपेयी ने प्रतिनिधित्व किया।

1955 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने वाले वाजपेयी ने 1957 के लोक सभा चुनाव में पहली बार उत्तर प्रदेश की बलरामपुर लोक सभा सीट से जीत दर्ज कर अपने संसदीय जीवन की शुरुआत की थी। उसके बाद चौथी लोक सभा में एक बार फिर वो बलरामपुर (1967-71) से चुन कर आये। 1971 के चुनाव में उन्होंने मध्य प्रदेश की ग्वालियर सीट से जीत दर्ज की। पांचवी और छठवीं लोक सभा में नई दिल्ली से सीट से जीत दर्ज कर लोक सभा पंहुचे थे। उसके बाद 10वीं से लेकर लगातार 14वीं लोक सभा में उन्होंने लखनऊ का प्रतिनिध्त्वि किया।

वाजपेयी भारतीय राजनीति के वो शिखर पुरुष थे जो अपनी बात कहने में जरा भी नहीं हिचकते थे। चाहे वो व्यक्तिगत हो या फिर सियासी। भला कौन भूल सकता है अटल का वर्तमान प्रधान मंत्री और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक रूप से राजधर्म का पाठ पढ़ाना। अपने वाकपटुता और हाजिरजबावी के लिए मशहूर वाजपेयी के जीवन में कई ऐसे मौके आये जब उन्होंने एक वाक्य में पूरी की पूरी इबारत की लिख डाली। गुजरात दंगो के बाद राज्य के दौरे पर गए वाजपेयी से पत्रकारों ने जब यह पूछा कि आप यहाँ भाजपा की सरकार बचाने आये हैं या अपने मुख्यमंत्री को? इस पर उन्होंने कहा कि वो यहाँ खुद को बचाने आये हैं।

चाहे वो देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का सदन में विरोध करने की बात हो, या फिर शक्तिशाली इंदिरा गाँधी को यह कहना हो कि पांच मिनट में आप जनसंघ खत्म करने की बात तो छोड़िये, अपने बाल तक नहीं संवार सकती है, अटल कहीं भी कमजोर नहीं पड़े। अपने समकक्षों से उनकी सहमति और असहमति का दौर तो सदन में खूब चला। तनावपूर्ण माहौल में भी एक दूसरे के प्रति सम्मान बना रहता था। उनको भाषण देते हुए तो उनके विरोधी भी सुनना चाहते थे। उनके भाषण में जो तंज होता था वो थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह देता था। अपनी आत्मकथा में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी भी लिखते हैं कि कई बार ऐसा हुआ कि सदन में स्थिति बहुत तनावपूर्ण थी। ऐसे वक़्त में अटल बिहारी पंहुचते थे और अपने किसी वन लाइनर से पुरे माहौल को हल्का कर देते थे।

हम जैसे लोग जो भारतीय राजनीति को 1996 के दौर के बाद से देखने समझने लायक हुए उनके लिए तो अटल बिहारी वाजपेयी किसी ईश्वर से कम नहीं थे। सदन हो या कोई साहित्यिक मंच यर फिर चुनावी रैली, हाथ हिला-हिला कर और रुक-रुक कर अपनी बात को सादगी और सटीक रूप से कहना अटल बिहारी वाजपेयी के ही बस की बात थी। अगर यह कहा जाए कि भारतीय राजनीति में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के बाद अटल बिहार वाजपेयी देश के तीसरे सबसे लोकप्रिय नेता हुए तो यह गलत नहीं होगा।

यह इस देश का दुर्भाग्य ही था कि वाजपेयी अपने जीवन के तीसरे चरण के बाद ही देश का प्रतिनिधित्व कर पाए। यह कोई और नहीं बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होंने इस देश में विकास की राजनीति की नींव डाली। पोखरण टेस्ट के बाद विश्व के तमाम देशों के दबाब और प्रतिबंधों से जूझ कर भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र में बदलने का बूता अगर किसी में था तो वो अटल बिहार वाजपेयी के ही अंदर था। आज देश में चमचमाते राष्ट्रीय राजमार्गों की परिकल्पना अटल बिहार वाजपेयी ने ही की थी। देश के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में ही शुरु हुई। इसके अंतर्गत दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई व मुम्बई को राजमार्ग से जोड़ा गया। ऐसा माना जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में भारत में जितनी सड़कों का निर्माण हुआ इतना केवल शेरशाह सूरी के समय में ही हुआ था।

अटल बिहारी वाजपेयी के ही कार्यकाल में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की उम्मीदों को नया आयाम मिला। वाजपेयी ने नई दिल्ली से शांति का पैगाम लेकर लाहौर तक की बस यात्रा की। ये अलग बात है कि पीठ में छुरा भोकते हुए पाकिस्तान ने लाहौर बस यात्रा का जबाव कारगिल युद्ध के रूप में दिया। वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के दौरान कई आर्थिक और अधोसंरचनात्मक सुधार किए। उन्होंने निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया।

वाजपेयी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। 1968 से 1973 तक वाजपेयी जनसंघ के अध्यक्ष भी थे। 1957 से 1977 तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई। उस समय वाजपेयी केंद्रीय मंत्री बने। उन्हें विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। विदेश मंत्री के तौर पर वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देने वाले पहले राजनेता थे।उसके बाद जो हुआ वो इतिहास में दर्ज हो गया। पहली बार किसी भारतीय नेता ने यूनाइटेड नेशन में हिंदी में भाषण देकर समूचे राष्ट्र का सर गर्व से ऊँचा कर दिया। वाजपेयी जब सदन में बोलते थे तो क्या पक्ष और क्या विपक्ष, सभी उनकी बातों को तल्लीनता से सुनते थे।

1980 में वाजपेयी ने जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की। 6 अप्रैल 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी को सौंपा गया। वाजपेयी 1980 से 1986 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे। 1984 में हुआ लोकसभा चुनाव अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में लड़ा गया था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए इस चुनाव में भाजपा को मात्र दो ही सीटे मिली थी। वो दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए। लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। यह वाजपेयी का ही करिश्मा था कि उनके नेतृत्व में 24 दलों के गठबंधन की सरकार ने सफलता पूर्वक अपना कार्यकाल पूरा किया। इन्ही पांच वर्षों के दौरान देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम स्थापित हुए।

यह कहा जा सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय सियासी जगत के वो चमकते सितारे थे, जिनके सामने अन्य सभी नेता बेहद बौने नजर आये। उनकी स्वीकार्यता उम्र की सीमाओं को तोड़ देती है। उनका क्रेज जितना प्रौढ़ और बुजुर्गों में था, उससे कहीं ज्यादा युवाओं में था।

मात्र एक वोट से अपनी सरकार गंवाने से पहले लोक सभा में अटल बिहारी वाजपेयी का वो ओजस्वी पूर्ण भाषण आज भी सबके जेहन में होगा जब इस कवि ह्रदय राजनीतिज्ञ ने कहा था कि आज हम सरकार से बाहर तो जा रहे हैं लेकिन एक वक़्त आएगा जब इस देश में हर तरफ भारतीय जनता पार्टी का राज होगा। अब इसे महज संयोग कहें है या फिर ईश्वर द्वारा लिखी गयी एक पटकथा। आज जब भारतीय राजनीति के इस युग पुरुष ने हमसबको अलविदा कहा है तब इस देश में भाजपा या एनडीए गठबधन की 21 राज्यों में सरकार है। संभवतः उनकी पार्टी के द्वारा देश की राजनीति के इस पितामह को इससे अच्छी और बड़ी श्रद्धांजलि कुछ और नहीं हो सकती है।

अटल जी अपनी ही एक कविता में कहते हैं

मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आजमा।
मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई।

(फाइनल रिपोर्ट टीम की तरफ से अटल बिहारी वाजपेयी को नमन और श्रद्धांजलि)

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