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आईएनएस विराट अंतिम यात्रा पर कोच्चि के लिए रवाना

INS-Virat-is-all-set-to-retमुंबई: भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विराट शनिवार को दोपहर बाद अपनी अंतिम यात्रा पर यहां से कोच्चि के लिए रवाना हुआ। इस पोत को ब्रिटेन से खरीदा गया था। नौसेना से सेवामुक्त होने से पहले यह अंतिम बार अपने बॉयलरों की शक्ति से जा रहा है।
आधिकारिक सूत्रों ने यहां बताया कि जैसा कि नाम है इस पुराने विमानवाहक पोत की लंबाई 750 फीट है। इसने करीब छह दशकों तक भारतीय नौसेना की सेवा की। सेवा से हटाए जाने से पूर्व की तैयारियों के लिए इसके बुधवार को नौसेना के दक्षिणी कमान के अड्डे तक पहुंचने की उम्मीद है।
इसमें लगे इंजनों, राडार, बड़ी और छोटी तोपों, और अन्य युद्ध के साजो सामान के साथ बहुमूल्य एवं संवेदनशील उपकरणों को निकालने के लिए और इसे विखंडित करने के लिए किसी सूखी गोदी पर पहुंचाना होगा।
इसके विखंडन की प्रक्रिया की शुरुआत गत छह मई को ही हो गई थी। तब इस पोत पर तैनात सी हैरियर विमान आखिरी बार इसकी डेक से उड़े थे। उसके दो दिनों बाद इसे औपचारिक रूप से गोवा स्थित नौसेना के हवाई अड्डा आईएनएस हंस से विदाई दी गई थी।
इसे दुनिया का सबसे पुराना विमानवाहक पोत होने का गौरव हासिल है। साथ ही यह ब्रिटेन में निर्मित भारतीय नौसेना में कार्यरत आखिरी पोत है। आईएनएस विराट इस साल फरवरी में विशाखापट्टनम में हुए अंतर्राष्ट्रीय आयोजन ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू’ में प्रमुख आकर्षण था।
आईएनएस विराट का एचएमएस हर्मस पुराना नाम था। इसने रॉयल नौसेना में 1959 से 1964 तक सेवा दी। इसने दक्षिणी अटलांटिक टास्क फोर्स को 8000 किलोमीटर दूर फाकलैंड द्वीपों को अर्जेटीना से मुक्त कराने में अग्रणी भूमिका निभाई। सबका कहना था कि यह नहीं हो सकता लेकिन टास्क फोर्स लगभग यह असंभव सा काम कर दिखाया था। इसके पीछे आयरन लेडी के नाम से चर्चित ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारगरेट थैचर को जाता है।
इस युद्धपोत की रफ्तार 28 नॉट यानी 51 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक है। इस पर से चौबीसों घंटे विमान उड़ान भर सकते हैं। अर्जेंटीना और ब्रिटेन के बीच 74 दिनों तक चले युद्ध में इस पोत ने दुश्मनों के कई विमानों को टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। अंत में अर्जेटीना को हार माननी पड़ी थी।
उस युद्ध के बाद इस पोत को सुरक्षित रख लिया गया था और वर्ष 1985 में इसे सेना की सक्रिय सेवा से हटा दिया गया था। वर्ष 1986 के अप्रैल में भारत को अपने विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को हटाने के लिए दूसरे विमानवाहक पोत की जरूरत थी तो इसे भारतीय नौसेना के लिए खरीदने का निर्णय लिया।
12 मई 1987 को इसे भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। इस पर हैरीयर श्रेणी के विमान उड़ान भर सकते हैं और उतर सकते हैं। किसी भी तरह के हेलीकॉप्टर को उतराने के लिए इस पर जगह है। इस पर चालक दल के सदस्यों के साथ 1600 नौसैनिकों के रहने की व्यवस्था है।
इस पोत का निर्माण कार्य वर्ष 1944 में तब शुरू हुआ था जब दूसरा विश्व युद्ध चरम पर था। इसका जलावतरण 16 फरवरी 1953 को हुआ था और ब्रिटिश नौसेना रॉयल नेवी में यह 18 नवंबर फरवरी 1959 को शामिल हुआ था।
कोच्चि में विखंडन की प्रक्रिया से गुजरने के बाद आईएनएस विराट को औपचारिक तौर पर नौसेना से हटाने के लिए दूसरे जहाज की सहायता से खींच कर फिर मुंबई स्थित नौसेना के अड्डे पर लाया जाएगा। कोच्चि में विखंडन प्रक्रिया में कुछ महीने लग सकते हैं। इसे कब औपचारिक तौर पर सेना से हटाया जाएगा इसकी तारीख अभी तय नहीं की गई है।
नौसेना से हटाए जाने के बाद इस विमानवाहक पोत को स्थाई रूप से तैरता हुआ संग्रहालय बना दिया जाएगा या एक पर्यटक केंद्र बनेगा या जैसा वर्ष 2014 में आईएनएस विक्रांत के साथ हुआ उसी तरह इसके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे अभी यह भी तय नहीं है।
(एजेंसी)

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