महराजगंज

​विश्व महिला दिवस: पिता के आदर्शों को आत्मसात कर जगा रहीं नारी शिक्षा की अलख​

​महराजगंज (ओंकार निरंजन): ​ महिलायें अगर अपनी आत्मबल को ऊर्जा के रूप में परिवर्तित कर दें तो इस पुरूष प्रधान समाज में उनको स्वावलम्बी बनने से कोई नहीं रोक सकता। ये मानना है महराजगंज जनपद के सिसवा कस्बा स्थित प्रेमलाल सिंहानियां कन्या इण्टर कालेज की प्रधानाचार्या श्रीमती शशिकला सिंह का। जो अपने पिता के आदर्शों को आत्मसात कर आज सिसवा में नारी शिक्षा की अलख जगा रहीं हैं।

जनपद के निचलौल कस्बे में पैदा हुईं शशिकला सिंह अपने तीन बहनों और एक भाई में सबसे बडी हैं। उनके पिता जंगबहादुर सिंह ने अपने पुत्रियों से कभी भी लिंग विभेद नहीं किया। बल्कि तीनों बेटियों को शिक्षा के प्रति जागरूक कर उन्हें हर कदम पर प्रोत्साहित करते रहे। और स्वावलम्बी बनाने में कोई कसर नहीं छोडा।

निचलौल से उच्च शिक्षा के लिये शशिकला सिंह ने जवाहर लाल नेहरू पी जी कालेज महाराजगंज से स्नातक की पढाई के लिए दाखिला लिया। जहां उन्होंने पहली बार महिला उम्मीदवार के रूप में छात्रसंघ की चुनाव भी लडीं। उस दौरान महिलाओें और पुरुषों में हो रहे विभेद को देख उन्होंने महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक करने की ठानी। परन्तु उनके सामने काफी दिक्कतें आयीं।

फिर भी उनके कदम नहीं डगमगाये और गोरखपुर विश्वविद्यालय से वर्ष 1989 में पूरे विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की परीक्षा अकेले उत्तीर्ण करने वाली छात्रा के रूप में शशिकला सिंह ने नारी शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने का बीडा उठाया। और वे वर्ष 1995 में सिसवा आकर सीता देवी सिंहानिया के सहयोग से प्रेमलाल सिंहानिया कन्या इण्टर कालेज का नींव रखा।

जिसमें उन्हें राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से काफी प्रताडना झेलनी पडी फिर भी शशिकला सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और अपने पिता के आदर्श “अपमान का जीवन जीने से अच्छा स्वाभिमान की मौत गले लगाने” की प्रेरणा को अपने जीवन में उतार कर उन्होंने समाज में हर मुश्किल का सामना किया और नारी शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करती रहीं। नतीजन आज प्रेमलाल सिंहानियां कन्या इण्टर कालेज की प्रधानाचार्या के रूप में समाज नारी शिक्षा के प्रति प्रेरणा बनती चलीं गयीं।

श्रीमती शशिकला सिंह का कहना है कि नारी अनादि काल से चर्चा का विषय रही है। कभी उसे सराहा गया तो कभी उसे दुत्कारा गया। आज नारी अपने प्रतिभा, कर्मठता व बुद्धि से समाज में अपना परचम लहरा रही है। उनका मानना है कि दूसरे से सहानुभूति बटोर कर जीवन यापन करने और दुःखों से हार मानकर बैठने से बेहतर है कि नारी अपनी कमजोरी को शक्ति के रूप में स्वीकार कर उसे इतना दृढ कर ले कि वो इस पुरूष प्रधान समाज के लिए मिसाल बन जाये।

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