पूर्वांचल के नायक

भौवापार के बाबू बैजनाथ सिंह, जिनके स्वाधीनता संग्राम को देख सरकार ने दी दारोगा की नौकरी

भौवापार के बाबू बैजनाथ सिंह

गोरखपुर: जनपद में देश की आजादी के संग्राम में अपना बहुमूल्य योगदान देने वाले रणबांकुरों की कमी नही है। ऐसे ही एक शख्स थे बाबू बैजनाथ सिंह, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य व स्वाधीनता संग्राम सेनानी। जिनका निधन 98 वर्ष की आयु में बीते जनवरी माह के प्रारम्भ में हो गया। बाबू बैजनाथ सिंह का जन्म जिले के बेलीपार थानाक्षेत्र के भौवापार गांव में 1 सितंबर 1919 को हुआ था। देश की आजादी के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही था। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने पर आजाद भारत की सरकार ने पुरस्कार स्वरूप इन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा की नौकरी दी गयी थी। भौवापार गांव सुराजियों का गढ़ था। कांग्रेस कार्यकर्ता गांव में नित्य प्रभातफेरी निकालते, सुराजगीत गाते और आजादी के नारे लगाते। यह सब देख बालक बैजनाथ के भीतर भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भावना बलवती होने लगी।

गांव में मिडिल पास कर आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1936 में उनका दाखिला शहर के महात्मा गांधी इंटर कॉलेज में हुआ। वे नजदीक के जाफरा बाजार में किराए का कमरा लेकर रहने लगे। जाफरा बाजार में क्रांतिकारियों का अक्सर आना जाना लगा रहता था। इसी दौरान ये प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचिंद्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी के संपर्क में आए। जिनकी प्रेरणा से उन्होंने वर्ष 1938 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ज्वाइन कर ली। बैजनाथ सिंह ने वर्ष 1941 में गाजीपुर में ट्रेन डकैती कर सरकारी खजाना लूट लिया। इस कांड में इन्हें और श्याम कृष्ण दुबे को मुख्य अभियुक्त बनाया गया।

24 मार्च 1942 को बैजनाथ सिंह ने अपने साथियों भगवान शुक्ला, बालरूप शर्मा और हरिप्रसाद तिवारी आदि के साथ मिलकर सहजनवां में ट्रेन से ले जाए जा रहे सरकारी खजाना को भी लूट लिया था। इस कांड के बाद तो अंग्रेज पुलिस पागल जैसी हो गई। पुलिस से बचते हुए बैजनाथ सिंह अंग्रेजों की नाक में दम करते रहे। इस बीच वह बाराबंकी-लखनऊ के बीच ट्रेन जलाने, प्लाजा और देहरादून बमकांड समेत कई घटनाओं में शामिल हुए।वर्ष 1943 की पहली जनवरी को अंग्रेजी पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया और मुकदमा चलाकर आजन्म कारावास की सजा दी।

इनके फरार साथियों की जानकारी के लिए जेल में इन्हें कठोर यातना दी गई पर इन्होंने जुबान नहीं खोली। देश को आजादी मिलने पर इनकी रिहाई हुई और आजाद भारत की सरकार ने पुरस्कार स्वरूप इन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा की नौकरी दी, जिससे अवकाशप्राप्त करने के बाद वे शहर के बिलंदपुर मोहल्ले में घर बनवाकर परिवार के साथ रहते थे। 98 वर्ष के बैजनाथ सिंह कुछ दिनों से बीमार थे और शहर के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था और उन्होंने बीते जनवरी माह की शुरुआत में दम तोड़ दिया।

बाबू बैजनाथ सिंह के निधन की खबर उनके पैतृक गांव भौवापार पहुंची तो शोक व्याप्त हो गया। लोगों ने शहर में विलंदपुर स्थित उनके आवास पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। बाबू बैजनाथ सिंह के निधन पर नागरिकों व विभिन्न संगठनों ने शोकसभा कर शोक जताया व देश की आजादी के संघर्ष में उनके योगदान को याद किया।

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