शोहरतगढ़ विधायक ने की पुलिसवालों के पोस्टिंग की सिफारिश; बोले SP मांगते हैं लिखित इसलिए लिखित दिया

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गोरखपुर (राकेश मिश्रा): सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ विधान सभा सीट से भाजपा के सहयोगी पार्टी अपना दल के विधायक चौधरी अमर सिंह द्वारा अपने पसंद के पुलिसवालों को अपने मनमुताबिक थानों में पोस्टिंग हेतु जिले के कप्तान से सिफारिश करने का मामला सामने आया है। विद्यायक के नाम और मुहर के साथ सिग्नेचर किया हुआ एक अनौपचारिक पत्र मीडिया के सामने आया है जिसमे 10 पुलिसवालों के स्थानांतरण और पोस्टिंग करने की बात लिखी गयी है।

सभी पुलिसवालों के नाम के सामने उनकी पोस्टिंग और स्थानांतरण कहाँ किया जाना है इसका भी विवरण है। एक सादे पन्ने पर लिखे गए विवरण में सात पुलिसवालों की अपने पसंद के हिसाब से पोस्टिंग करने की सिफारिश की गयी है तो 3 पुलिसवालों के ट्रांसफर की बात भी लिखी गयी है।

हालांकि यह पहला मामला नहीं है जिसमे किसी विधायक ने अपने पसंद के हिसाब से किसी पुलिसवाले की ट्रांसफर या पोस्टिंग की बात कही गयी हो। ये सब बातें सिस्टम में निहित हैं और बिना लिखे पढ़े सरकार-दर-सरकार चली आ रही है। हां एक बात जरूर है कि यह पहला मामला है जिसमे किसी विधायक या उनके सहयोगी द्वारा लिखा गया कोई पन्ना सामने आया है। एक बात और गौर करने की है। इस मामले में जब इस संवाददाता ने विधायक अमर सिंह से बात की तो उन्होंने डंके की चोट पर इस बात को कबूल किया कि यह सिफारिश उनके द्वारा ही की गयी है।

Gorakhpur Final Report से टेलीफोन पर बात करते हुए श्री सिंह ने स्वीकारा कि उनके कार्यकर्ताओं ने उनकी रजामंदी पर यह सिफारिश की है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने और अपने कार्यकर्ताओं की शिकायत को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह सिफारिश किया है।

विद्यायक ने कहा कि उनके विधान सभा क्षेत्र में जनता की भलाई किस बात में है और किस बात में नही यह वो अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने कहा कि वो इस बात से पल्ला नहीं झाड़ेंगे कि यह सिफारिश उन्होंने नही ही की है। विधायक ने कहा कि वो डंके की चोट पर कबूल करते हैं कि यह सिफारिश उनकी रजामंदी पर उनके कार्यकर्ताओं ने की है।

श्री सिंह ने कहा कि अपने क्षेत्र को वो किसी कप्तान या अधिकारी से ज्यादा जानते समझते हैं। उन्होंने पूछा की क्या प्रशासनिक और कानून व्यवस्था को ठीक करने के लिए मुख्यमंत्री सूबे के मुख्य सचिव या पुलिस के आला अधिकारियों का ट्रांसफर नहीं करते? इसी तरह सरकार द्वारा कानून व्यवस्था के मुद्दे पर किये गए कार्यों को अमलीजामा पहनाना क्षेत्र में सरकार के प्रतिनिधियों की ही जिम्मेदारी है और इसी को ध्यान में रखते हुए हमने यह सभी सिफारिशें की हैं।

हालांकि इन सिफारिशों ने एक बात और सतह पर ला दी है कि जिले में कप्तान और विधायक के बीच सबकुछ ठीक नहीं है। क्योंकि यह बड़ा सवाल है कि अगर विधायक या उनके किसी प्रतिनिधि ने इन सिफारिशों को पुलिस अधीक्षक को दिया था तो वहां से यह लीक कैसे हो गया। आमतौर पर ऐसी बातें लीक नहीं होती हैं और कप्तान और विधायक चुपचाप ऐसे कामों को अंजाम देते हैं।

विधायक से यह पूछने पर कि यह मामला मीडिया के सामने कैसे पंहुचा तो उनका कहना था कि जब भी हम एसपी को कुछ कहते थे तो वो कहते थे कि उन्हें भूल जाता है इसलिए जो भी करवाना हो उसको लिखित दे दिया करें। विधायक ने कहा कि लिखित देने पर उन्होंने मुझ पर दबाव बनवाने के लिए इस पेपर को लीक करवा दिया होगा।

श्री सिंह ने कहा कि पेपर के लीक करने से भी कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि मैं कहीं भी और किसी भी मंच पर यह कहने को तैयार हूँ कि यह सिफारिशें मैंने ही की हैं। उन्होंने कहा कि जिले का कप्तान अपनी मर्जी से बिना कोई कारण बताये जब हफ्ते में दो-दो बार कई थानाध्यक्षों को इधर से उधर कर सकता है तो क्या मैं जनता का एक प्रतिनिधि होने के नाते लोगों की भलाई के लिए कुछ पुलिसवालों के ट्रांसफर और पोस्टिंग की सिफारिश नहीं कर सकता?

विधायक और कप्तान के बीच यह कोई नयी अदावत नहीं है। बीते दिनों पैसे के लेनदेन के एक कथित मामले में शोहरतगढ़ पुलिस ने एक व्यक्ति जगदीश यादव को एक अति प्रभावी लेखपाल की शिकायत पर उसके घर से उठा लिया था। लेखपाल का कहना था कि जगदीश ने उससे 17 लाख रुपये लिए हैं और मांगने पर वापस नहीं कर रहा है। हालांकि लेखपाल के पास पैसे देने का कोई साक्ष्य नहीं था। इस सम्बन्ध में विधायक द्वारा कहने पर भी पुलिस जगदीश को परेशान करती रही। बाद में इस मामले की शिकायत विधायक ने कप्तान से की तब जाकर मामला कुछ सुलझा। सबसे बड़ी बात यह थी की कप्तान को इस पुरे मामले का अंदाजा था फिर भी पुलिस एक बेकसूर को परेशां करती रही।

खैर विधायक और कप्तान के बीच मामला जो भी हो और नैतिकता के तकाजे पर सिफारिश करना गलत है या सही इस पर बहस भी हो सकती है, लेकिन एक बात तो कहा ही जा सकता है कि आज के वक़्त में ऐसे जनप्रतिनिधि कम हैं जो अपने द्वारा किये गए किसी सिफारिश को खुले मंच से स्वीकार करते हों या करने को तैयार हों।