अमनमणि त्रिपाठी की जीत में सारथी की भूमिका में खरी उतरी बहनें तनुश्री और अलंकृता

गोरखपुर: प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अबकी बार दिग्गज राजनीतिज्ञ अमरमणि त्रिपाठी का खोया हुआ सियासी वजूद वापस मिल गया। अमरमणि की दोनों बेटियों तनुश्री और अलंकृता की भरपूर कोशिशों के बदौलत आखिरकार अमनमणि त्रिपाठी की सियासी रथ हांक कर रणक्षेत्र जीत लिया। मार्च 2017 का दूसरा हफ्ता इस परिवार के लिए कई सौगात से कम नहीं रहा।

गुरुवार को जमानत मिलने के साथ शनिवार को यह जीत अमरमणि परिवार में दोहरी खुशी लेकर आयीं। महराजगंज की नौतनवां विधानसभा सीट से बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी के पुत्र अमनमणि त्रिपाठी ने सपा के मुन्ना सिंह, भाजपा के समीर त्रिपाठी व बसपा के एजाज अहमद खान को हराया। मुख्य मुकाबला अमनमणि व सपा के मुन्ना सिंह के बीच ही सिमट गया।

वर्ष 2012 में अमनमणि यहां से सपा के टिकट पर चुनाव हार गये थे। सपा ने अबकी बार टिकट नहीं दिया और निर्दल चुनाव लड़ने की वजह से पूरे परिवार को सपा से निकाल दिया। अपनी पत्नी सारा हत्याकांड में आरोपी अमनमणि की जीत का सबसे बड़ा हथियार बनी बहनें तनुश्री और अलंकृता। जिन्होंने जनसंपर्क व नुक्कड़ सभाओं में भाई के लिए रो-रो कर वोट मांगा। यहीं वजह रही कि अमनमणि की सांस सीमा सिंह की नौतनवां की जनता से गुहार उन आंसुओं पर गालिब आ गयी और जनता की सहानूभूति अमनमणि के पक्ष में चली गयीं।

कवयित्री मधुमिता की हत्या में आजीवन कारावास की सजा काट रहे अमरमणि त्रिपाठी का परिवार इस समय अपने सियासी जिंदगी के सबसे कठिन दौर में था। वह अपनी पत्नी मधु मणि के साथ जेल में तो हैं ही राजनीतिक विरासत को आगे आया बेटा अमनमणि भी पत्नी की हत्या के आरोप में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार होकर जेल पहुंच गया था।

ऐसा पहली बार हो रहा है कि अमन मणि को किसी भी पार्टी ने टिकट नहीं दिया।ऐसे संकट में अमरमणि त्रिपाठी की दोनों बेटियां तनुश्री और अलंकृता मोर्चे पर आ डटी । दोनों नौतनवां विधानसभा में धुआंधार प्रचार से अपने परिवार के पक्ष में सहानूभूति का ज्वार खड़ा करने की कोशिश कर रही थीं और विपक्षियों के पास इसकी काट करने का कोई उपाय नहीं दिखा।

तनुश्री और अलंकृता की मदद के लिए उनके दो चचेरे भाई अनय मणि त्रिपाठी और अनंत मणि त्रिपाठी भी आगे आए । अनय मणि त्रिपाठी, अमरमणि त्रिपाठी के बड़े भाई राजन मणि के बेटे हैं तो अनंत मणि उनके छोटे भाई अजीत मणि त्रिपाठी के बेटे हैं। इन सभी की आयु 30 वर्ष के अंदर है। 30 वर्षीय तनुश्री ने लंदन यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशन्स में एमए किया है तो 24 वर्षीय अलंकृता ने दिल्ली से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया है। 28 वर्षीय अनय मणि इंजीनियर हैं तो 24 वर्षीय अनंत एलएलबी, एलएलएम हैं।

दोनों बहनों ने जनवरी के मध्य से ही नौतनवां आकर चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था।दोनों बहनों और भाइयों ने दो टीम बनायी। एक टीम तनुश्री और अनय मणि की है तो दूसरी अलंकृता व अनंत की। दोनों टीमों के साथ अमरमणि त्रिपाठी के विश्वस्त लोगों का जत्था होता था। दोनों टीमें सुबह नौ बजे दो अलग दिशाओं में प्रचार के लिए निकल जाती थीं और रात दस बजे तक लौटती थीं।

इस दौरान तीन से चार नुक्कड़ सभाएं होती थीं। सभाओं में तनुश्री-अलंकृता कमोवेश एक ही बात बोलती थीं। अपने पिता के विकास कार्यों का बखान और अपने पूरे परिवार को राजनीतिक षडयंत्र के तहत फंसाए जाने की दास्तान। वे तयशुदा स्क्रिप्ट से एक लाइन दूसरा नहीं बोलती थीं।

चुनाव मैनेजमेंट का जिम्मा संभाल रहे अमरमणि की करीबी बताते हैं कि दोनों बहनों ने पूरे क्षेत्र का भ्रमण किया। ऐसा कोई प्रमुख चौराहा नहीं है जहां उनकी नुक्कड़ सभाएं न हुई हों।अमनमणि को नामांकन के लिए हाईकोर्ट से अनुमति मिली उन्होंने नामांकन किया। एहतियात के तौर पर तनुश्री ने भी नामांकन किया। बाद में नाम वापस ले लिया। गुरुवार को तनुश्री ने फोन पर जीत के प्रति आश्वस्तता जता चुकी थी और कहा था कि हमनें जमीनी स्तर पर खुद का सर्वे करवाया था। जिसमें जीत की पूरी गुंजाइश थीं।

सभी जानते हैं कि नौतनवां विधानसभा में पार्टियां महत्वपूर्ण नहीं होती। यहां मुकाबला दो परिवारों में ही होता रहा है। ऐसा ढाई दशक से हो रहा है। एक तरफ पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनका परिवार होता है तो दूसरी तरफ पूर्व सांसद अखिलेश सिंह और उनका परिवार। अमरमणि 1989 से अब तक चार बार तो अखिलेश सिंह दो बार यहां से विधायक रह चुके हैं।

यहां से वर्ष 2012 में उनके भाई कौशल सिंह उर्फ मुन्ना सिंह विधायक बने।। अखिलेश सिंह अब महाराजगंज संसदीय क्षेत्र की राजनीति करते हैं और वे एक बार सांसद भी रह चुके हैं। अखिलेश सिंह ने जनता पार्टी से राजनीतिक कैरियर शुरू किया और इसके बाद से समाजवादी पार्टी में ही रहे जबकि अमरमणि लगातार दल बदलते रहे हैं। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी से राजनीति की शुरूआत करते हुए वह कांग्रेस, बसपा, सपा में रह चुके हैं। उन्होंने पहला चुनाव 1980 में लड़ा।

नौ वर्ष बाद 1980 में वह पहली बार विधायक बने। इसके बाद के दो चुनाव 1991 व 1993 वह अखिलेश सिंह से हारे। फिर उन्होेने 1996 के बाद से तीन चुनाव लगातार जीते। उनके बेटे अमन मणि 2012 का चुनाव सपा से लड़े लेकिन हार गए। हत्या के आरोप में गिरफ्तार होने के बावजूद शिवपाल यादव ने इस बार अमनमणि को सपा का उम्मीदवार बनाया था लेकिन अखिलेश यादव ने उनका टिकट काट दिया और मुन्ना सिंह को दे दिया।

अमरमणि के दोनों बेटियों के प्रचार में आने के बाद से सभी दल उन्हें घेरने की कोशिश में लग गए थे। विपक्षी दलों की ओर से सबसे बड़ा प्रहार अमन मणि त्रिपाठी की सास सीमा सिंह की वीडियो अपील को सोशल मीडिया में वायरल कर किया गया था। सीमा सिंह का एक वीडियो जारी हुआ था जिसमें वह नौतनवां के लोगों से अमनमणि को वोट न देने की अपील करते हुए कहती हैं कि अमनमणि ने उनके बेटी की हत्या की है।

यह स्थिति ठीक 2007 के चुनाव की तरह है। उस वक्त अमर मणि त्रिपाठी मधुमिता हत्याकांड में जेल में थे और जेल में रहते चुनाव लड़ रहे थे। मधुमिता की बहन निधि शुक्ला ने खुद नौतनवां आकर कई सभाएं की और लोगों से अमरमणि त्रिपाठी को वोट न देने की अपील की फिर भी अमरमणि चुनाव जीत गए। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि निधि की सभाओं ने उल्टा असर कर दिया। अबकी बार सारा की मां के वीडियो ने उल्टा असर किया।

एक दशक बाद नौतनवा में राजनीतिक हालात उसी तरह बन गए थें। अबकी बार अमरमणि की तरह उनका बेटा अमनमणि चुनाव लड़ा और उनकी दोनों बहनों ने चुनाव का मोर्चा संभाला । विरोधी सारा सिंह की मां की भावनात्मक अपील का वीडियो जारी कर रहे थे और घर की लड़कियों को चुनाव मैदान में लाने पर तंज कस रहे थे। लेकिन इतिहास ने फिर पलटी खायी और फतह ने मणि परिवार का कदम चूमा। अमरमणि-अमनमणि के समर्थक तनुश्री में नेता बनने की पूरी संभावना देख रहे हैं।

एक तरह से नौतनवा में एक बार फिर से इमोशन, संस्पेंस, थ्रिल और ड्रामा दिखा, ठीक 10 वर्ष बाद 2007 की तरह। बस कहानी में कुछ नए पात्र शामिल हो गए थे।