सरकारें बदलीं पर सिसवा नहीं बन सका तहसील

महराजगंज: सूबे में हर पार्टियों की सरकारें आईं और गईं परंतु जनपद का सबसे महत्त्वपूर्ण 146 वर्ष पुराना सिसवा नगर पंचायत आज तक तहसील नहीं बन सका। समय-समय पर मांगें भी उठीं मगर आश्वासन की घुट्टी पिलाये जाने के बाद भी सिसवा नगर पंचायत उपेक्षित ही रहा।

21 नवम्बर वर्ष 1871 यानि 146 वर्ष पूर्व बरतानिया हुकूमत ने सिसवा को सबसे पुरानी मंडी होने के चलते नगर पंचायत का दर्ज़ा दिया था। नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद से सिसवा को नगर पालिका का दर्ज़ा दिए जाने की मांग उठी। किन्तु समय के साथ यह मांग ठंडे बस्ते में चली गई।

इसके बाद 2 अक्टूबर वर्ष 1989 में महराजगंज जनपद के सृजन के बाद सिसवा को तहसील बनाये जाने की मांग उठी। कई पार्टियों की सरकारें आईं। और आश्वासन भी मिला परन्तु नतीज़ा वही ढाक के तीन पात निकला। इसके पश्चात वर्ष 2010 में प्रदेश में आरूढ़ बसपा सरकार ने महराजगंज जनपद से एक व कुशीनगर जनपद से दो तहसीलों के सृजन की आख्या तत्कालीन कमिश्नर के. रविन्द्र नायक से मांगी।

जिस पर कमिश्नर द्वारा कुशीनगर जनपद के कप्तानगंज व खड्डा तथा महराजगंज जनपद के सिसवा को तहसील सृजन हेतु शासन को रिपोर्ट भेजा। काफी दिनों तक मामला ठंडे बस्ते में रहा।

फिर वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही कुशीनगर जनपद के खड्डा व कप्तानगंज नगर पंचायत को तो तहसील का दर्ज़ा दे दिया गया। मगर सिसवा इस बार भी उपेक्षित रह गया। और यहां के वाशिंदों को एक बार फिर निराशा हाथ लगी। कस्बे के रामेश्वर जायसवाल, अमरेंद्र मल्ल आदि व्यवसाइयों का कहना है कि शासन-प्रशासन से सैकड़ों बार सिसवा को तहसील बनाने की मांग हुई।

किंतु यहां के जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते सिसवा के लोगों की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ साबित हुई।

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