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गोरखपुर का चिडियाघर: सरकार बदली, नाम बदला, फिर भी नहीं बढ़ी काम की रफ्तार

Inaguration-plates-establisहरिकेश सिंह (वरिष्ठ संवाददाता)
गोरखपुर: पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने गोरखपुर में चिडियाघर के निर्माण का ख्वाब देखा था। वर्षो बीत जाने के बाद भी चिडियाघर का निर्माण तो नहीं ही हुआ और आज भी काम बेहद सुस्त रफ्तार से चल रहा है।
चार साल में 20 करोड़ खर्च हो चुके हैं। महज दस फीसदी काम पूरा हुआ है। सरकार बदली, नाम बदला, कार्यदायी संस्था बदली उसके बावजूद निर्माण में तेजी नहीं आयी।
123 एकड़ मेँ बनाए जा रहे चिडियाघर के लिए अब तक 20 करोड़ रूपए खर्च हो चुके हैं। इसमें 42 देशी-विदेशी प्रजातियों के जानवर और पक्षियों को रखने की योजना है। यह कब तैयार होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। यही हाल रहा तो चिडियाघार के निर्माण मेँ दस साल से ज्यादा का समय लग जाएगा।
गौरतलब है की वीर बहादुर सिंह के ख्वाब को पूरा करने के लिए बसपा सरकार में तत्कालीन वन एवं जंतु उद्यान मंत्री फतेह बहादुर सिंह ने वर्ष 2007 मेँ चिडियाघर निर्माण के लिए वन विभाग को प्रस्ताव बनाने का निर्देश दिया था । वन विभाग ने 124.274 एकड़ भूमि में 88.80 करोड़ रूपए की योजना तैयार कर प्रदेश सरकार के पास अनुमति के लिए भेज दिया।
प्रदेश सरकार से मुहर लगने के बाद केंद्र सरकार ने भी अनुमति प्रदान कर केन्द्रीय चिडियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) तथा सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी लेने का निर्देश दिया। कुछ शर्तों के साथ सीजेडए से भी मंजूरी मिल गई। लगभग दो वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी। इसके बाद वन मंत्री ने इसकी घोषणा कर दी।
सरकार बदली तो बदल गया नाम
चिडियाघर के नाम पर राजनीति भी खूब हुई। 18 मई 2011 को निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ तो चिडियाघर का नाम कांशीराम प्राणि उद्यान था जिसे वर्तमान सपा सरकार ने 25 जनवरी 2014 को आजादी आंदोलन के शहीद अशफाक उल्लाह खां के नाम पर घोषित कर दिया। इसका बसपा ने काफी विरोध किया। प्रशासनिक भवन का लोकार्पण एवं कार्यां का शुभारंभ राज्य मंत्री जन्तु उद्यान उप्र शासन डा. शिव प्रताप यादव ने किया।
चिडियाघर पर रहा विवादों का साया
शहीद अशफाक उल्ला खां प्राणि उद्यान के निर्माण में जीडीए और वन विभाग के बीच विवाद पैदा होने कारण काम शुरू करने में काफी दिक्कत आयी। दोनों विभाग के बीच चिडियाघर के लिए 14 एकड़ जमीन का बैनामाँ भी लटका जिससे दिक्कत में इजाफा हुआ।
जीडीए को वन विभाग के नाम 124.274 एकड़ भूमि का बैनामा करना था। उस समय भुगतान न हो पाने के कारण 14 एकड़ भूमि का बैनामा नहीं हो सका। बकाया रकम पर ब्याज को लेकर वन विभाग और जीडीए के बीच मुकदमा शुरू हो गया। यह रकम एक करोड़ 72 लाख 60 हजार रूपए से अधिक हो गयी। वन विभाग ने उप्र शासन को पत्र भेजकर ब्याज की राशि माफ करने या 14 एकड़ भूमि मेँ से 2.24 एकड़ रकबा कम करके बैनामा कराने की मंजूरी के लिए शासन को पत्र लिखा। किसी तरह मामले का निपटारा करा कार्य शुरू किया गया।
बजट भी बना रोड़ा
वन विभाग ने माना कि जीडीए और वन विभाग के विवाद के कारण बजट के बावजूद भी चिडियाघर के निर्माण में दिक्कत आयी। लेकिन धीरे-धीरे चिडियाघर के निर्माण की बाधाएं एक-एक कर करके दूर होती रही। 88 करोड़ रूपए के प्रोजेक्ट का मास्टर प्लान तैयार किया गया। जिसे शासन को भेजा गया। शासन से अब तक 20 करोड़ रूपए मिल चुके है। जो भूमि की मिट्टी पटायी और कुछ खंभों पर खर्च किए गए। जब तक भूमि का लेबल सड़क के लेबल में नहीं आयेगा। तब तक मिट्टी भराई का काम चलता रहेगा।
इस अवधि में चिडियाघर का बजट दोगुना हो गया है। पहले 88 करोड़ की लागत में बनने वाले चिडियाघर के लिए अब 150 करोड़ रूपए मांगे जा रहे हैं। बसपा की सरकार में जीडीए से जमीन खरीद के लिए साढ़े नौ करोड़ रूपए स्वीकृत हुए। एक करोड़ रूपए काम शुरू करने के लिए मिला। तत्कालीन कार्यदायी संस्था पैक्सफेड ने काम शुरू कराया। वर्ष 2010 में पांच करोड़ रूपए और मिले। वर्ष 2011 से 2012 तक धन के अभाव में काम ठप हो गया। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2013 में निर्माण के लिए पांच करोड़ रूपए दिए।
कार्यदायी संस्था बदली
वन विभाग ने निर्माण का जिम्मा पैक्सपेड से हटाकर राजकीय निर्माण निगम को दे दिया। वर्ष 2014 और 2015 में पांच-पांच करोड़ रूपए और मिले। सारा पैसा निर्माण कार्य में खर्च हो गया। धन के अभाव में मार्च से निर्माण फिर रूक गया।
नगर विधायक करेंगे मुख्यमंत्री से बात
12 जून को नगर विधायक डा राधा मोहन दास अग्रवाल ने डीएफओ डा. जनार्दन शर्मा और निर्माण निगम के परियोजना निदेशक एके शुक्ला के साथ चिडियाघर की जमीन का मुआयना किया। एके शुक्ला ने चिडियाघर के निर्माण के लिए 140 करोड़ शासन से दिलाने की मांग की। विधायक ने कहा कि मुख्यमंत्री से बात करके पैसे दिलाने की कोशिश करेंगे।
पिछले मई माह में भी चिडियाघर के निर्माण की सुस्त प्रगति पर नगर विधायक डा. राधा मोहन दास अग्रवाल ने प्रदेश के जन्तु उद्यान मंत्री शिव प्रसाद यादव से वार्ता की। निर्माण कार्य ठप देख उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया। कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम के परियोजना प्रबंधक नारायण ने बताया कि धन की कमी के कारण कार्य रूका हुआ हैं। मंत्री ने बताया कि तत्कालीन सरकार द्वारा योजना का डीपीआर और धन की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण निर्माण कार्य सुचारू ढंग से नहीं हो पा रहा है।
चिडियाघर में दिखेंगे 42 देशी-विदेशी प्रजातियों के जानवर और पक्षियों
पशु-पक्षियों को करीब से देखने की हसतर पूरी होने में देरी हो रही है। अगर निर्माण जल्द पूरा हो जाए तो लखनऊ या फिर कोलकाता जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अशफाक उल्ला खां प्राणि उद्यान चिडियाघर में ही बबर शेर की दहाड़ सुनाई देगी तो टाइगर, जेब्रा, दरियाई घोड़ा, और मगरमच्छ भी नजदीक से देखने का मौका मिलेगा। यहां विदेशी पक्षियों के साथ ही देश-विदेश के 42 प्रजातियों के जानवर रहेंगे। चिडियाघर का मुख्य गेट देवरिया बाईपास पर कांशीराम शहरी आवासीय कालोनी के पास बनेगा।
योजना के अनुसार चिडियाघर में दलदल में पाया जाने वाला विदेशी प्रजाति का हिरण होगा तो लम्बी गर्दन वाला जिराफ भी होगा। गैंडा, तेंदुआ, लकड़बग्घा और भेडि़या भी रहेंगे। कछुएं, लोमड़ी, खरगोश, शाही और छोटी बिल्लियां लोगों को लुभाएंगी तो कई तरह के सांप और मछलियां भी आकर्षित करेंगी।

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