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चौरीचौरा कांड: आज ही के दिन क्रांतिकारियों का गुस्सा फूटा था अंग्रेज़ी राज पर

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हरिकेश सिंह (वरिष्ठ संवाददाता) 
गोरखपुर: ऐतिहासिक चौरीचौरा कांड, जिस के कारण महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध छेड़ा गया असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था, की आज 94 वी वर्षगाँठ है। 4 फ़रवरी 1922 को क्रांतिकारियों ने चौरीचौरा में ब्रिटिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी थी जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे। इस घटना को चौरीचौरा काण्ड के नाम से जाना जाता है।
इसी घटना के बाद गांधीजी ने कहा था कि हिंसा होने के कारण असहयोग आन्दोलन उपयुक्त नहीं रह गया है और उसे वापस ले लिया था।
आज ही के दिन 1922 में चौरीचौरा के सपूतों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। पुलिस ज्यादती से क्षुब्ध क्रांतिकारियों ने चौरीचौरा थाने में आग लगा दी थी, जिसमें थानाध्यक्ष समेत 23 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए थे। घटना में 222 लोगों को आरोपी बनाया गया, जिसमें से 19 को दो जुलाई 1923 को फांसी की सजा हुई थी।
अंग्रेजी शासन के विरोध में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। उस समय चौरीचौरा ब्रिटिश कपड़ों व अन्य वस्तुओं की बड़ी मंडी थी। आंदोलन के तहत देशवासी ब्रिटिश उपाधियों, सरकारी स्कूलों व वस्तुओं का त्याग कर रहे थे। इसी के तहत स्थानीय बाजार में भी विरोध जारी था। दो फरवरी 1922 को आंदोलनकारियों के दो नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।
Chauri-Choura-railway-statiइसके विरोध में चार फरवरी को करीब 3000 आंदोलनकारियों ने थाने के सामने प्रदर्शन कर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ नारेबाजी की। इसे रोकने के लिए पुलिस ने हवाई फायरिंग की, लेकिन सत्याग्रहियों पर इसका असर नहीं हुआ, फिर पुलिस ने सीधे फायरिंग कर दी। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई जबकि कई लोग घायल हो गए। इसी बीच पुलिस की गोलियां खत्म हो गई और वह थाने में छिप गए।
आक्रोशित क्रांतिकारियों ने थाने में आग लगा दी। इस घटना में दरोगा गुप्तेश्वर सिंह समेत कुल 23 पुलिस कर्मी जलकर मर गए। इसी घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।
गौरतलब है की चौरी-चौरा की घटना के सालों बाद तक इस कांड के प्रभावित परिवारों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के लाभ नहीं मिलते थे। 1957 में तत्कालीन कलक्टर के ओएसडी ने लीगल डिपार्टमेंट को एक चिट्ठी लिखकर बताया कि ‘दस्तावेजों में चौरी-चौरा की घटना के राजनीतिक होने का कोई प्रमाण नहीं है। ऐसे में बार-बार पेंशन की दरियाफ्त कर रहे लोगों को क्या जवाब दिया जाए’।
Chauri-Choura-railway-statiचौरी-चौरा कांड में सेशन जज ने सभी 172 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने काफी रहमदिली दिखाई और 19 मुख्य आरोपियों को ही फांसी की सजा दी, बाकी को कैद।
चौरी-चौरा थाने में 23 पुलिसवालों की स्मृति में तो पार्क बनाया गया मगर इन शहीदों की याद में लंबे समय तक कोई स्मारक नहीं था जो बाद में राजीव गांधी के कार्यकाल में बन सका। दरअसल 1972 तक तो चौरी-चौरा की घटना को देखने का नजरिया ही नहीं विकसित हो सका था।
50 साल बाद उसे किसी तरह राष्ट्रीय आंदोलन में गोरखपुर का योगदान के नाम पर शामिल किया गया।

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