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दवाओं का फर्जीवाड़ा रोकने के लिए आॅनलाइन व्यवस्था शुरू

Image-for-representation-1हरिकेश सिंह (वरिष्ठ संवाददाता)
गोरखपुर: दवा के हर पाऊच के पीछे फार्मास्क्यिोर का एक कोड और एक मोबाइल नंबर दिया रहता है। जब उस कोड को उसी मोबाइल से मैसेज किया जाता है तो रिप्लाई में दवा से सम्बंधित ब्यौरा आ जाएगा।
यदि दवा फर्जी है तो अंग्रेजी में ’फेक’ लिखकर आएगा और यदि असली है तो ’जेनविन’ लिखकर आता है। अब तक देश में दवाओं के तीस करोड़ पैकेटों पर कोडिंग की जा चुकी है और एफएसडीए की ओर से 150 से भी अधिक फर्मा ब्रांड्स के साथ मिलकर काम कर रही है।
फिलहाल मौजूदा समय में नकली या घटिया दवाओं की पैठ का पता लगाने के लिये कोई पुष्टि आंकड़े उपलब्ध नहीं है। सरकार तथा उद्योग दोनों ही इस मामले में अलग-अलग अनुमानों पर निर्भर करते हैं लेकिन स्वास्थय मंत्रालय के मुताबिक राज्यों के औषधि नियंत्रकों द्वारा 2011 से 2012 के दौरान जांचे गये 48000 दवा नमूनों में से करीब पांच नमूने जांच में फेल रहे हैं, जबकि तीन में से लगभग एक दवा यानी 36 फीसदी घटिया पायी गयी। वहीं दुखद बात यह है कि भारत में नकली दवाओं की हिस्सेदारी 15 फीसदी है।
हर साल दुनियाभर में इन नकली दवाओं की वजह से करीब सात लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है।
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की पहल पर बाजार में बिकने वाली दवाओं में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए आॅनलाइन सिस्टम की शुरूआत की गयी थी। इसके अंतगर्त बाजार में बिक रही दवा असली है या नकली इसका पता लगाया जा सकता है। देश के कई राज्यों में दवा कंपनियां बढ़-चढ़कर भागीदारी ले रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश में दवा कंपनियां इसमें पीछे हैं। अधिकांश दवा कंपनियों ने आॅनलाइन सिस्टम की शुरूआत नहीं की है।

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