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नेपाली राजशाही टोपी के कपड़े की बिनाई गोरखपुर शहर के हथकरघों पर

Image-for-representation-3गोरखपुर: भारत की कला, संस्कृति व कलाकार बेमिसाल। इसी वजह से हम तमाम मुल्कों में अफजल व आला नजर आते है। भारत की बनी चीजें तमाम मुल्कों में इज्जत व ऐहतराम की निगाह से देखी जाती है।
भारत के तमाम जगहों की बनी चीजें हैं भी इज्जत के लायक। एक ऐसी ही कला है दस्तकारी। जिसकी तूती दुनियाभर में सुनी जाती है। इस कला के कलाकार है बुनकर।
कवि कबीर वाले बुनकर जनाब। गोरखपुर का गोरखनाथ, जाहिदाबाद, पुराना गोरखपुर, चक्सा हुसैन, पिपरापुर, इलाहीबाग आदि क्षेत्रों में बुनकरों का बड़ा तबका इस हुनर को जिंदा रखे हुये है। यहां के हुनरमंदों की शोहरत दुनिया के हर खित्ते में है। जब भी हम फन की बात करते है तो तमाम चीजें हमारे जेहन में उभरती है। एक ऐसा ही नायाब हुनर है बुनकरों के हाथों में।
जब हमारी नजर सूती कपड़ों, शानदार चादरों, गिलाफ, तौलिया और नेपाल की राजशाही टोपी के कपड़ें आदि पर पड़ती है। तब हमारा सिर फख्र से ऊंचा उठ जाता है। नेपाल की राजशाही टोपी नेपालियों के सर को सुशोभित कर रही है। नेपाली यहां के बने कपड़े की टोपी के कायल है। सभी का जेहन बुनकरों के हुनर को सलाम करता नजर आता है। सलाम भी लाजिमी है। इनकी बनायी टोपी के कपड़े ने हमें पड़ोसी मुल्क में अजीम बना दिया। लेकिन सरकार की उदासीनता ने इनके हालात बद से बद्तर कर दिये। खैर।
आज हम दो जून की रोटी के लिये जद्दोजेहद कर रहे हैं बुनकरों की नायाब कृति राजशाही नेपाली टोपी के कपड़े पर गुफ्तगू करेंगे। जिससे दो देशों के लोगों को करीब आने में अहम भूमिका निभायी है। वैसे भी भारत व नेपाल की संस्कृति में काफी हद तक समानताएं नजर आती है। जिसका असर हमारें रहन सहन खान पान पर नजर आता है।
कृषि के बाद पूर्वांचल को हथरकघा उद्योग से पहचाना जाता था। लेकिन सरकार की गलत नीतियों के कारण धीरे धीरे इस उद्योग पर ग्रहण लगने लगा। लेकिन कहते हैं हुनर कभी बेकार नहीं जाता है। हुनर वाले कामगार हाथ ने अपनी टेक्नोलाॅजी से तैयार किया पावर लूम पर बिनने वाली ढाका टोपी का कपड़ा । जिसे नेपाल की राजशाही टोपी भी कहते हैं। नेपाल की राजशाही टोपी कई रंगों में तथा कई डिज़ाइनों में होती है।
नेपाली टोपी की कई विशेषता है। लगभग 2 दशक नेपाल में राजशाही टोपी के कपड़े की बिनाई हथकरघा से करवाने वाले अस्सी वर्षीय फैयाज ने बताया कि इस कपड़े की नेपाल में बहुत ही मान्यता हैं। सरकारी कार्यालयों नेपाली टोपी लगाकर जाना अनिवार्य हैं। उन्होंने बताया कि नेपाल में शादी-ब्याह, त्योहारों पर घर के पुरूष टोपी लगाते हैं तथा महिलाएं इसके कपड़ा इस्तेमाल ओढ़नी में करती है। यह कपड़ा उनके लिए शुभ होता है।
गोरखपुर महानगर में वैसे तो हथकरघे पर चादर तौलिया सहित नेपाल की ढाका टोपी की के कपड़े की बिनाई की जाती हैं। लेकिन महानगर के गोरखनाथ निवासी अलाउद्दीन बुनकर ने हैण्डलूम को मोडिफाइ कर नयी इजाद की हैं। अमूमन हैण्डलूम एक बाक्स में बनाया जाता। लेकिन इसमें दो बाक्स जुगाड़ से लगाकर नेपाल की राजशाही टोपी के कपड़े की बिनाई करते है। अलाउद्दीन कहते हैं कि नेपाली टोपी नेपाल में सबसे पहले खड्डी पर बनाई जाती थी।
नेपाली व्यापारी का गोरखपुर आना जाना होता था। उसी दौरान कुछ नेपाली व्यापरियों ने गोरखपुर बुनकरों से कहा कि नेपाल में हथकरघे की शुरूआत करें। लेकिन काम के एवज में पैसे कम मिलने की वजह से नहीं गए। गोरखपुर के कुछ बुनकरों ने नेपाली टोपी के कपड़े की बिनाई कराने लगे।
अलाउद्दीन ने कहा कि सरकार की गलत नीतियों के कारण आज हथकरघा उद्योग बन्द के कगार पर है। उन्होने कहा कि तत्कालीन भारत सरकार द्वारा बुनकरों के लिए सूत कार्ड बनाया गया जिससे कार्ड पर कम मूल्य पर सूत मिल जाएगा। परन्तु जब से कार्ड बना सूत नहीं मिला। इस नेपाली टोपी के एवज में अच्छी खासी कमायी हो जाती है। अगर सरकार प्रोत्साहन दे तो बुनकरों के हालात बदल सकते है।
नेपाल की राजशाही टोपी के कपड़े बनाने का तरीका
अलाउद्दीन ने बताया कि चूंकि नेपाली टोपी में झण्डी नुमा डिजाइन होती हैं। इस डिज़ाइन को बनाने के लिए सबसे पहले डिज़ाइन का ग्राफ तैयार जाता है। फिर दफ्ती के पत्ते पर खाका तैयार किया जाता है। पत्ते पर बनी डिज़ाइन बनारस में काटी जाती हैं। पत्ते को सिल कर जकाट तैयार किया जाता है। जकाट का पावर लूम पर लगाकर कर नेपाली टोपी के कपड़े की बिनाई की जाती है।
अब तो आप समझ ही गये होंगे कि हमारे पड़ोसी मुल्क नेपाल में बुनकरों के हुनर को सर आंखों पर रखा जाता है। गोरखपुर की बनी टोपी नेपालियों के सरों पर शान के साथ भारत के हुनरमंदों को सलामी देती नजर आती है। काश भारत की सरकार भी इन हुनरमंद बुनकरों के लिए कुछ प्रयास करती तो यह हुनर नित नयी ऊंचाईयों की ओर अग्रसर होता। लेकिन सरकार की चिर निद्रा अभी नहीं खुली है।
यह भी जानें जरूरी है
ढाका टोपी या नेपाली टोपी टोपी का एक प्रकार है जो नेपाल में बहुत प्रचलित है। यह टोपी जिस कपड़े से बनायी जाती है उसे ढाका कहते है। इसलिए इसका नाम ढाका टोपी पड़ा है। इस कपड़े का प्रयोग एक प्रकार की चोली बनाने में किया जाता है जिसे नेपाली में ढाका-को-चोलो कहते है। नेपाली टोपी का निमार्ण सर्वप्रथम गणेश मान महर्जन ने नेपाल के पाल्पा जिले में किया था। यह टोपी नेपाल की राष्ट्रीय टोपी है। इस प्रकार की टोपियां अफगानिस्तान के लोगों द्वारा भी पहनी जाती है। विशेष रूप से अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई इसे पहनते है। इसको इंडोनेशिया के लोगों द्वारा भी पहना जाता है।

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