टॉप न्यूज़

गजब: अब भारतीय मानवों की तस्करी नेपाल में, नारकीय जीवन जी रहे छुड़ाए गए 46 मजदूर

गोरखपुर: मानव तस्करी के धंधे को समाप्त करने की सरकारें तमाम कोशिशे कर लें, लेकिन इसके धंधेबाजों ने अपनी जड़ें इस सिस्टम में इतनी गहरी जमा ली हैं कि सारी कोशिशे सिर्फ कोरमपूर्ति ही लगती हैं। नेपाल में भारतीयों की मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी का आज एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिसमें नेपाल में तीन महीने से बंधक 46 ऐसे मजदूरों को आज छुड़ाया गया है। जिनको छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से 2016 में अहमदाबाद, वहां से श्रीनगर और फिर नेपाल ले जाकर कई बार उनका सौदा किया गया। हर जगह मजदूरों को बंधक बनाकर उनका जबरदस्त उत्पीड़न किया गया और इनको गुलामों की तरह रखा जा रहा था।

छत्तीसगढ़ की संस्था जन जागृति और ‘मानव सेवा संस्थान’ के प्रयासों से छूटे इन मजदूरों ने जो आप बीती बताई वो इस दौर में भी इंसानों के खरीद फरोख्त की कडवी हकीकत बयाँ करती है। भूखे प्यासे और गरीबी के मारे छतीसगढ़ के विलासपुर जिले के अलग अलग गावों के इन लोगों ने एक साल पहले सपने में नही सोचा होगा कि जिस नौकरी के सब्जबाग दिखकर इनको और इनके परिवार को अहमदाबाद और फिर श्रीनगर ले जाया जा रहा है वो असल में एक नर्क है जहाँ इनसे काम तो लिया जायेगा पर बदले में इनका सौदा होगा और बंधुवा मजदूर से भी बदतर इनकी जिन्दगी हो जाएगी।

रोजी रोटी की तलाश में यह सभी मानव तस्करी के ऐसे बरमूड़ा त्रिकोण में जाकर फंस गये जहाँ से इनको पता भी नहीं चला की इनका सौदा हो गया है और अब ये सिर्फ गुलामों की तरह ही जिन्दगी जीने को मजबूर होंगे।अच्छी जिन्दगी का सब्जबाग दिखाने वाले दलालों के माध्यम से साल 2016 में यह परिवार गुजरात के अहमदाबाद पहुचे जहाँ इनको ईट भट्ठे पर काम करने के लिए बुलाया गया। विलासपुर में इनको इनके हिसाब से मजदूरी देने की बात की गयी लेकिन यहाँ आने पर रूपये देने की जगह इनका शारीरिक और मानसिक शोषण होने लगा। जिस दलाल के माध्यम से यह यहाँ पहुचे थे उसी दलाल ने अपने आदमियों के साथ मिलकर साल २०१७ में इनको श्रीनगर में एक ठेकेदार के यहाँ ले जाकर बेच दिया और यहाँ भी इनको बंधक बनाकर इनसे काम लिया जाता। रूपये मांगने पर इनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता।

पीड़ितों में शामिल रामकिशन बंजारे,के अनुसार इनसे पिछले साल सितम्बर तक श्रीनगर में काम लिया गया फिर इनको नेपाल बॉर्डर पार कराकर काठमांडू के पास धारके गांव ले जाया गया। यहाँ भी इनको कैद करके रखा जाता और जिस ईट भट्ठे पर इनको रखा गया था वही के एक दुकान तक इनको जाने की परमिशन दी जाती थी।महीनों तक 16 से 18 घंटे काम कराने का बाद भी इनको एक रुपया नहीं दिया जाता। इनमे 20 पुरुष और 15 महिलाओं के साथ बच्चों से भी काम लिया जाता था और अगर कोई विरोध करता तो उसे जानवरों की तरह पीटा जाता। इनका कहना है की इनकी जिन्दगी बिलकुल गुलामों जैसी हो गयी थी जिनको अपने मर्जी से सांस लेने की भी इजाजत नहीं थी।

कुछ इसी तरह अजय, पीड़ित मजदूर को देखकर लगता है कि अपने साथ हुए अत्याचार की कहानी कहते हुए इनके आँखों में दहशत, इनके दर्द को बयाँ करने के लिए काफी है। इन मजदूर महिलाओं और बच्चियों को ठेकेदार के आदमी हमेशा छेड़ते और इनके साथ दुर्व्यवहार करते रहते।इनके सामने ही इनकी बहु बेटियों से साथ अश्लील हरकतें की जाती और विरोध करने पर इनको बुरी तरह से पीटा जाता। इनका कहना है कि ठेकेदार इनको जान से मारने की धमकी देता और लाख चाहते हुए भी यह किसी से सहयोग नहीं ले पाते थे क्योंकि उस पहाड़ी इलाके में इनकी सुनने वाला कोई नहीं था।

इन्होने नेपाल की स्थानीय पुलिस से भी सहयोग लेने की कोशिश की पर नेपाल पुलिस ने उल्टा इन्ही को चोर साबित कर इनको हथकड़ी पहना दी। महीनों तक इनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव होता रहा और यह चुपचाप सहने को मजबूर थे। कुछ इसी तरह से रंजीता, रौशनी  विरास का कहना है कि किसी तरह से इन्होने अपने दर्द को विलासपुर में अपने घरवालों तक पहुचाया। इनके घरवालों से जब इनके हालत की जानकारी जन जागृति संस्था को हुई तो उसने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में मामले को लेकर याचिका दाखिल की। इस साल जनवरी माह हाईकोर्ट के आदेश के बाद भारत सरकार ने नई दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास से सम्पर्क किया।

दूतावास के दबाव में नेपाल पुलिस ने धार जिले के गांव स्थित ईंट-भट्ठा के मालिक के चंगुल से इनको आजाद तो करा लिया, लेकिन इन सबको नेपाल महेन्द्रनगर नेपाल बॉर्डर पर लाकर छोड़ दिया गया। यहाँ भी इनको मानव तस्करी के धंधे में लगे लोगों ने अपने साथ ले जाने की कोशिश की पर उतराखंड के चम्पावत जिले के पुलिस अधीक्षक और एंटी ह्यूमन ट्रेफकिंग के लिए काम कर रहे मानव सेवा संस्थान की सतर्कता की वजह से यह पहले लखनऊ और वहां से गोरखपुर आ सके।

इस सम्बंध में राजेश मणि, निदेशक, मानव सेवा संस्थान का कहना है कि फ़िलहाल इनको गोरखपुर में मानव सेवा संस्थान ने अपनी संरक्षण में रखा है और कल इन सभी को इनके घर भेजने की व्यवस्था की जा रही है। एक साल की कैद से छोटे इन महिलाओं और बच्चों की आँखों में आज आज़ादी के असली महत्व को देखा जा सकता है। भूखे प्यासे और गुलामों की तरह जी रहे इन सभी लोगों को तो बचा लिया गया लेकिन इस पूरे मामले में मानव तस्करी के धंधे में लगे उन लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हो पाई है।जिन्होंने इन 46 मासूम जिंदगियों का कई बार सौदा किया और महीनों तक इनका हर तरह से शोषण किया।

हालाँकि संस्थाएं अब इस मामले में मानव तस्करी में लगे लोगों के खिलाफ अब विलासपुर से लेकर दिल्ली सरकार तक अपील करने जा रही हैं लेकिन अभी तक जो आंकड़े आये हैं उसके हिसाब से मानव तस्करों पर कार्यवाही हो पाना बेहद मुश्किल मना जा रहा है।देश में मानव तस्करी का बाज़ार पूरी तरह से गर्म है। पिछले कुछ सालों के आंकड़े बताते हैं कि मानव तस्करी देश में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला अपराध है। एनसीआरबी के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 में देश में मानव तस्करी के 8132 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2017 में ऐसे कुल 6877 मामले दर्ज किए गए थे। इसमें चौंकाने वाले तथ्य यह हैं कि पुरुषों के मुकाबले में महिला पीड़ितों की संख्या अधिक है।मानव तस्करी की सबसे बड़ी वजह गरीबी बताई जाती है।

एनसीआरबी के मुताबिक, मानव तस्करी के कई आयाम हैं, इनमे जबरन मज़दूरी, वैश्यावृत्ति, यौन शोषण, घरेलू गुलामी, जबरन विवाह आदि शामिल हैं।जहां तक इन मामलों को अंजाम तक पहुंचाने और दोषियों को सजा दिलवाने की बात है, तो उसमें भी कोई उत्साहजनक तस्वीर उभर कर सामने नहीं आती। कुल 8,132 मामलों में से केवल 2,403 मामलों में पुलिस ने चार्ज शीट दाखिल किया, यानी 50 प्रतिशत से भी कम मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई। इनमें से 163 मामलों में सजाएं हुईं, 424 में कोई सजा नहीं हुई और 587 मामलों में अदालत की सुनवाई पूरी हो गई है। यानी केवल 27 प्रतिशत मामले अदालत तक पहुंच सके हैं।

यही हाल गिरफ्तार आरोपियों का भी है,देश में कुल 10,815 लोगों को मानव तस्करी के आरोप में गिरफ्‌तार किया गया, उनमें से 7,292 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।जबकि 159 को सजा हुई आर 753 बाइज्ज़त बरी हो गए। ज़ाहिर है कि एनसीआरबी के आंकड़े पुलिस द्वारा दर्ज मामलों की बुनियाद पर तैयार किये गए हैं। ऐसे और न जाने कितने मामले हैं जिनकी रिपोर्टिंग तक नहीं हुई है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *