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कड़वी गोली: खरी-खरी लिख छात्र राजनीति और डीडीयू प्रशासन को आइना दिखाता एक गोरखपुरिया पेज

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: कड़वी गोली। जी हाँ अपने नाम पर अक्षरशः खरा उतर रहा है गोरखपुर में और गोरखपुर के लोगों खास कर वासेपुर विश्वविद्यालय, अरे नहीं गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों और प्रशासन के लिए चलने वाला यह फेसबुक पेज। विशुद्ध रूप से तीन खेमों में बटे हुए विश्वविद्यालय में चल रही छात्रों की राजनीति और यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक अक्षमता पर चोट करने के कारण यह पेज एक तरफ गोरखपुर के लोगों खास कर विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय है तो वहीँ इसके एडमिन को कई तरह की धमकियों और गाली-गलौज का भी रोज-रोज सामना करना पड़ता है।

कभी कातिल कलम, कभी आगभड़काउ, कभी बंबू कवि, झोलाछाप लेखक और कभी दिवालिया संपादक बन कर लिखने वाले इस पेज के एडमिन की हिम्मत और सोचने की क्षमता की दाद तो देनी ही पड़ेगी। ऐसे वक़्त में जब मीडिया भी गोरखपुर में सत्ता प्रतिष्ठान के गलत कार्यों के खिलाफ लिखने से कतराता ही नहीं बल्कि 100 कोस दूर भागता दिख रहा है, यह पेज अपने खरी-खरी लिखने के कारण छात्र राजनीति में लोकतंत्र को जिन्दा रखे हुए है। इस पेज पर लोकल गोरखपुरिया लैंग्वेज में लिखे गए पोस्ट ना केवल विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं और प्रशासन को आईना दिखाते हैं बल्कि हास्य और व्यंग भी पैदा करते हैं।

जब यह पेज उपाध्यक्ष पद के एक प्रत्याशी को ‘मुटका भम्मड़’ छात्र नेता लिखता है तो आप अकेले में भी पेट पकड़ कर हस हस कर लोटपोट हो जाते हैं। वहीँ व्यंग का आलम देखिये की सीधे-सीधे विश्वविद्यालय प्रशासन को ‘शरबतबाज पापड़खोर विश्वविद्यालय प्रशासन’ कह डाला। यह पेज छात्र संघ चुनाव के प्रत्यशियों द्वारा प्रचार प्रसार में उड़ाए जा रहे पैसे को लिंगदोह के मर्डर की संज्ञा देता है तो ऐसा लगता है कि चलो अच्छा है तो ऐसा है जो गलत कार्यों के खिलाफ खुल कर लिखने की हिम्मत तो कर रहा है। ऐसा नहीं है कि इस पेज के पोस्ट मनगढंत होते हैं। छात्र नेताओं ने किस तरह चुनाव प्रचार में पानी की तरह पैसा बहाया यह पेज उसका तार्किक विश्लेषण भी करता है।

अब जरा लिंगदोह कमिटी के मानकों की किस तरह छात्र नेताओं द्वारा धज्जियाँ उड़ाई गयी हैं उसका इस विश्लेषण इस पेज पर पढ़िए। इस पेज के अनुसार उसने वासेपुर विवि (गोरखपुर विश्वविद्यालय ) में अलग अलग पद पर लड़ रहा छत्रनेता सब का पूरा चुनाव खर्चा का मिलाकर जोड़ घटाव किया। उसके बाद पेज ने लिखा कि 1) चुनाव में पर्चा छपाई का खर्चा, 2) गुरगा ऑरेन्ज करने का खर्चा, 3) नस्ता पानी का खर्चा, 4) चरपहिया का खर्चा, 5) रैली का सामान का खर्चा, 6) फ्लेक्स स्टिकर का खर्चा
7) मोबाइल रिचार्ज का खर्चा, 8) हॉस्टल में घुस बटवाई का खर्चा, 9) गुरगा भोजन अउर सरबत का खर्चा, 10) पर्चा दाखिला का खर्चा, 11) सेल्फाबाजी के लिए महंगा कैमरा का खर्चा, 12) जिओ रिचार्ज का खर्चा, 13) कुरता पजामा सिलवाइ धुलवाई क्रीज कराई का खर्चा, 14) मुफ़्त में चाय का खर्चा, 15) मोकदमा ठोकाइ का खर्चा
16) दुपहिया पेट्रोल का खर्चा, 17) चुटपुटिया खर्चा, 18) फर्जी गोली अउर कट्टाबाजी का खर्चा। ये सब जोड़ा गया तो कुल खर्चा 25 लाख रुपये से ज्यादा पंहुच गया।

यह पेज लिखता है कि,”अब आम छात्र यह सोच ले कि ई पइसा अगर छात्र के भलाई में लगा होता त केतना शौचालय बन गया होता… केतना गरीब छात्र पढ़ लिख लिया होता… केतना को कापी किताब मिल गया होता… केतना छात्र सबको सुविधा का कैम्प्स मिल गया होता… लाख डेढ़ लाख में त एक ठो हॉस्टल का शौचालय अउर पानी का दसा बहुते हद तक सुधरो गया होता…”

वहीँ लॉ फैकल्टी में हुई घटना और उसका यूनिवर्सिटी में चल रही शिक्षक राजनीति से किस तरह सम्बन्ध है, उस बता को भी यह पेज पूरी तरह खोल कर रख देता है। वह लिखता है कि,”आज हम आपको #आखफड़वा_सचाई बतायेगे… ई पोस्ट हमारा आदरनीय गुरुजी लोग का अंदर का राजनीति का बारे में है… चूंकि बात गुरुजी लोग का है त हम अपना लेवल से ज्यादे और अवकात से बहुते ज्यादै ऊपर जाकर इज्जत देकर लिखेगे… लेकिन सच लिखेगे त किसी न किसी का फेफड़ा जलबे करेगा… आज हम पुरा दिन बिधि छात्र लोग से बात करके बिधि बिभाग का अंदर का राज जान्ने का कोसिस किये… आपको आज पुरा बताते है…वासेपुर विवि में प्रॉक्टर का मर्दानगी दिखाने का काम एक्के प्रोफेसर साहब किये… ऊ थे प्रो० गोपाल परसाद… छोट मोट बात पर भी 307 मार देने का परम्परा ऊहे सुरु किये… लेकिन उनका पड़ोसी बिभाग बिधि संकाय से उनका हमेसा से टेन्सन रहता था… प्रॉक्टर साहब का बहुते ज्यादे 307 का आतंक होने का वजह से पिछल्का होली में हास्टल का मनबढ़ अउर गुंडा छत्रनेता सबका हालत पतला हो गया था… नहि त हर होली हास्टल से गुंडा छत्रनेता सब निकल कर गुरुजी लोग का मुहल्ला में घुस के ऊ सब को रात का फायदा उठा कर बहुत अस्लील गरियाता था… गुरुजी लोग का कान गन्दा हो जाता था एतना फूहड़ गालो देता था सब… लेकिन 307 का डर से हास्टल में छत्रनेता सबका गुंडई बन्द हो गया… बिधि संकाय का बहुत सारा छात्र सब पर लाठी चटकने अउर 307 मराने का इतिहास बन गया है… बिधि संकाय का गुरुजी का इज्जत इसका वजह से बहुते गिर रहा था… बिधि संकाय का डीन गुरुजी अपना स्थिति सबसे ऊपर समझते है… काहे से कि ऊ ई मान कर चलते है कि उनका बिभाग ज्जसाहेब और वकिल साहेब लोग को पैदा कर देता है… ऊनको ई बात का बहुते ज्यादे घमण्ड (अच्छा वाला घमण्ड) था… ऊ ईहो मानते थे की बिधि संकाय भले ही वासेपुर विवि का कैम्प्स में है त का हुआ… ऊ वासेपुर विवि का गुलामी नही करेगा… ऊ बार कौंसिल अउर अलग कायदा कानुन से चलने वाला बिभाग है…

”इसका पहिले भी इसी बिभाग का गुरुजी लोग का हमेसा नाराज रहने… क्लास छोड़ कर भाग जाने… जलकट बतियाने… लड़का सबको चाप के फेल कर देने… अउर लड़का सब को बेज्जत करने का बात छात्र सब के बिच में आम है… इस बिभाग का पास अच्छा खासा वोट बैंक है… इसलिए इ बिभाग सुरु से छत्रनेता लोग का प्यारा बिभाग रहा है… इस बिभाग में जिस दिन ABBC का कार्यकर्ता सब तोड़ फ़ोड़ किया और गुरुजी लोग को बेज्जत किया तब ई बिभाग हमारा भी नजर में आया… उसका पाहिले भी नजर में आया था काहे से कि इस बिभाग का 250 से ज्यादे छात्र सब का वोट का हक़ छिन लिया गया था… लेकिन हमलोग इस बिभाग पर उतना ध्यान नही दिए… अब आज हम आपको इस बिभाग का गुरुजी लोग का पुरा सम्मान करते हुए सच्चाई बतायेगे…”

”जब कभी इस बिभाग में टीचर सब का साथ कुछ गलत हुआ है बिभाग का टीचर लोग लड़का लोग का आड़ में अपना बात ऊपर तक बवाल करवाकर पहुचाया है… जब बवाल का बारे में पूछा जाता है त बिभाग का गुरुजी लोग का जुबान पर इक्के बात रहता है कि हमारा बिभाग का लड़का लोग बहुते अनुसासित है… अब हम आपको बताते है लड़का लोग काहे अनुसासित है… लड़का लोग को चाहिये नम्मर… ई बिभाग में हर सेमेस्टर में 50 नम्मर गुरुजी लोग का हाथ में होता है… 50 नम्मर का मतलब बहुत होता है… आपलोग सोच लीजिये वैवा का ई नम्मर ही अईसा बरमास्त्र है जिसका बदौलत लड़का सब अपना हक़ का बात भी खुल कर नही कह पाता… जो इस बिभाग में ढेर चिचियाता है ऊ जिन्नगी में कब्बो डिग्री नहीं पा पाता… और जवन सरेंडर करके गुरुजी लोग का भक्ति में भीगा बिल्ली बना रहता है ऊ सब चुपचाप पास हो जाता है अउर पास होने के बाद बिभाग को बहुते बुरा भला कहता है काहे से कि ऊ सब का बहुते टार्चर हुआ रहता है…”

”हो सकता है ई बात कुछ महान #गुरुभगत लोग को बहुते बुरा लग जाय लेकिन हमारा रिसर्च पक्का है… गुरुजी का इज्जत करना कवनो बुरा बात नही है… गुरु जी का सम्मान करना हर छात्र का धरम होता है… लेकिन जब गुरुजी लोग अपना धरम छोड़ कर छात्र सबको बरबाद होने के लिए बीच रस्ता में छोड़ दे तब कड़वी गोली को ऐसा छात्र सब का ऊ वालाअ दरद लिखना पड़ता है जवन दरद ऊ डर के मारे खुला रूप में कह नहीं पाता…”

जब किसी छात्रा की इज्जत या गरिमा की बात आती है तब भी यह पेज उस छात्रा के लिए खड़े होने में कोई गुरेज नहीं करता है।#फार्चूनर_के_गुरगे_कन्ट्रोल_के_बाहर…नामक शीर्षक से लिखित एक पोस्ट में यह पेज उन छात्रों या छात्र रूपी गुंडों की बखिया उधेड़ कर रख देता है जो उस छात्रा से गाली गलौज करते हैं या उसके साथ बदतमीजी करने के बात करते हैं।

समाजवादी छात्र सभा द्वारा अन्नू प्रसाद पासवान को अध्यक्ष पद के प्रत्याशी किये जाने के बाद एक अन्य दावेदार के अपहरण की जो नौटंकी हुई उस पूरी बात को #समाजवादी_किडनैपिया_कथा…के अंतर्गत लिख कर यह पेज छात्र राजनीति के उस गंदे पक्ष को भी सामने लाने की कोशिश करता है जो शायद आमजनमानस या छात्रों तक किसी अन्य माध्यम से नहीं पंहुच पाता। यह पेज लिखता है कि,” कल पुरा दिन #चुन्नु_मुँगौड़ी (छछूंदरेस_यादव) गायब रहा…देर साम को ऊ अटका हुआ चाभी से खटका हुआ ताला की तरह मुंह लटका कर बुझा हुआ मन से भौजी के साथ प्रेस कांफ्रेंस किया…इसका पीछे भी एक मजेदार कहानी है…चुन्नूआ दिल से समाजवादी है… ऊसको जब अध्यक्ष महान #गबन_यादव ने #महान_चहिर_कुर्सा का वारिस बनाया त चुन्नुआ को एकदम से #नेतागिरिटाइटिस का बीमारी लग गया..उसको #बियाहल_कट्टाबाज_गुरुघन्टाल #ठगलेश_यादव ने पावर केपशुल दिया अउर ऊ चुनाव मैदान में ताल ठोक कर कुद पड़ा…

”लेकिन वही हुआ जो हर कार्यकर्ता के साथ होता है… उसको #ABBC के तरह ही उसका अपना छत्रसंगठन #SCS (#समाजवादी_छत्रनेताका_सरेंडर) भी धोखा दे दिया… उसका संगठन अंतिम समय पर उसका गेम बजा दिया…”

एक और बात। यह पेज इस बात पर भी प्रकाश डालना नहीं भूलता कि वासेपुर विश्वविद्यालय (गोरखपुर विश्वविद्यालय) की कैसे कैसे छात्र नेता हैं। #वासेपुर_विवि में भाँति भाँति के छात्रनेता पाए जाते हैं…नाम के शीर्षक से लिखे एक पोस्ट में इसका एडमिन बताता है कि इस यूनिवर्सिटी में छात्र नेताओं की इतनीं भाँतियाँ हैं कि इनके सभी प्रकारों का उल्लेख कर पाना उतना ही मुश्किल है जितना कि भ्रष्टाचारी लोंगो को और #बियाहे_कुंवारों को चिन्हित कर पाना…

इस पेज के अनुसार पहले तरह के नेता हैं,”#सिटियाबाज_लफंडर–सीटी बजाना भी एक कला है… कुछ लोग #मोटका_लोल लेकर सिटी मारते है त पूरा महौल सिटी का चीख से गूँज जाता है… ऐसा छत्रनेता छत्रनेता कम और गुरगा ज्यादे होता है… नेतागिरी करना इनको आता नहीं है… बचपन में ऐसा छत्रेनता का बाबू दादा लोग संख फूकने को दिया करता था लेकिन ई सब संख फूकने गया त उसका स्थान पर कोहड़ा से मिथेन बायोगैस रिलिज होने जैसा जोर का आवाज आने लगा जिसका वजह से अड़ोसी पड़ोसी सब निकल कर मोटका लाठी में तेल पिला कर इस सबको खुब कूटा करता था…”

”ऐसा छत्रनेता को अपना सिटी बजाने का कला का पता तब चला जब ये सब 18+ से ऊपर का देखने लायक ‘जै पच्चासी’ वाला फ़िल्म देखने एक #खटियाहा_सनेमाहाल में घुसा… जब उस सनेमाहाल में ‘जै पच्चासी’ वाला सीन आया तब इसका मुह से लार टपकने लगा… गिला होट से ई जोर से सास फुक कर छोड़ा तो सुईईईईईई का आवाज जोर से गुंज उठा… खामोस बैठा हाल का बाकी का दर्सक सब को इससे बहुत ताकत मिला और वो सब इसको अपना नेता मानकर जोर जोर से सिटी बजाना सुरु कर दिया जिसका वजह से पूरा सनेमाहाल सिटि से गूंज गया…
तबसे ये सब बड़का वाला सिटियाबाज बन गया… जब ई सबको अपना अंदर सिटी बजाते हुए नेतागिरी का क्वालिटी पता चला त नेतागिरी के नाम पे ई सब अपना एक्के मकसद बना लिया… सिटियाबाजी… ऐसा गुरगा छत्रनेता सब कैम्पस में और बजार में घूम घूम कर सुंदर लड़की सबको देख कर सिटी बजाता है… सिटी बजाकर मूड़ी घुमा लेना ई सबका खासियत है…ये छात्रनेता या उनके गुर्गे इसलिए बनते हैं ताकि खुल के कैम्प्स में सिटियाबाज़ी कर सकें और छात्रहितों की आड़ में अपने कुकर्मों को छिपा सकें…” ऐसे छात्रनेताओं का एक बिस्वप्रसिद्द फॉर्मूला है…

”छात्रनेतागिरी × लफंडरबाजी = सिटियाबाज़ी स्क्वायर…
और
सिटियाबाज़ी % लफंडरबाजी = छत्रनेतागिरी…

”सिटियाबाजी लफंडरबाजी और छत्रनेतागिरी का यह तिकडी फार्मूला ई सब का जिनगी का फर्मूला है…ऐसा छत्रनेता सब बुद्धि से पुरा #बौकड़ होता है और माहोल देखे बिना बात बात पर सिटि बजाता रहता है…ये सब को सिटी बजाने का इतना गन्दा आदत पड़ जाता है कि हर गनवे का धुन सिटि में निकालने लगता है…
सिटी बजाने के वजह से ई सब छत्रनेता का मुह #शुवर जैसा हो जाता है… आज का जमाना का सच्चाई तो ये है की सभी छत्रनेताओ का सुरुआती राजनीति इसी वरायटी से सुरु होता है…”

कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि हास्य, व्यंग और आलोचना के माध्यम से वासेपुर विश्वविद्यालय (गोरखपुर विश्वविद्यालय) के छात्र नेताओं और शिक्षकों को उनकी वास्तविक जगह दिखाने के लिए एक ऐसे गोरखपुरिया पेज की शख्त जरुरत थी।

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