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उर्दू के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली नहीं रहे

Nida-Fazliनई दिल्ली: कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता
मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का सोमवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 77 साल के थे। शायरी की दुनिया में निजा जाना-पहचाना नाम थे। उन्‍होंने शायरी और गजल के अलावा कई फिल्‍मों के लिए गाने भी लिखे।
बचपन से ही शायरी में हाथ आजमाने वाले निदा के पिता भी शायर थे। उनका बचपन ग्वालियर में गुजारा जहां उन्‍होंने तालीम हासिल की। उन्होंने 1958 में ग्वालियर कॉलेज (विक्टोरिया कॉलेज या लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातकोत्तर पढ़ाई पूरी की।
यूं तो उनकी यादगार गज़लों और शायरी की लंबी फेहरिस्त है लेकिन लोकप्रियता की लिस्ट में ‘कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता’ काफी ऊपर आएगी। जिंदगी की पेचीदगियों को बड़े ही सहज तरीके से सामने रखने वाली यह लोकप्रिय गज़ल निदा फाज़ली ने ही लिखी है।
फ़ाज़ली साहब, आपके जाने का दुःख करोड़ो के दिल को टीस पहुंचाएगा, शायद इसीलिए आज शायरी के साथ साथ देश भी रो रहा है।
कितनो को पता है सरफ़रोश फ़िल्म का, जगजीत सिंह की आवाज़ में गाया हुआ नगमा “होश वालों को खबर क्या…”, निदा साहब के कलम की देन है?
जब देश 1947 में विभाजित हुआ तो फ़ाज़ली साहब के परिवार में पाकिस्तान को रहने के लिए चुना, पर निदा फ़ाज़ली साहब हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानीयत से इतना प्यार करते थे की परिवार को छोड़कर हिन्दुस्तान में ही बस गए।

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