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पर्यावरण दिवस: सलाम है गोरखपुर के मिस्टर बोनसाई को जिनकी बगिया के माइक पांडेय भी हैं मुरीद

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: आज पर्यवरण दिवस है। आज के दिन राजनेता, अधिकारी से लेकर आम जनता तक पर्यावरण को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करेंगे। सोशल मीडिया पर भी पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी मैसेज की भरमार होगी। अगर नहीं कुछ होगा तो दिन-प्रति-दिन क्षय होते जा रहे पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ ठोस काम। आज तमाम जगहों पर पर्यावरण को लेकर गोष्ठियां सेमिनार कार्यशालाएं आयोजित होंगी। हर कोई कटते पेड़ों और सिकुड़ती छाँव की बातें करेगा, उजड़ती हरियाली से चिंतित हर कोई मिल जायेगा, लेकिन मौजूदा दौर में कम ही लोग मिलेंगे जिनका पाला पोसा एक पौधा अब पेड़ का स्वरूप ले लिया हो।

ऐसे में यदि पूर्वांचल की मिट्टी पर परम पवित्र रुद्राक्ष का आकाशगामी वृक्ष दिखे तो पर्यावरण के प्रति एक नायाब नजीर पेश होगी। साथ ही यह बताना भी समीचीन होगा कि यदि रुद्राक्ष को गोरखपुर की धरती पर बड़ा किया जा सकता है तो ऐसा ही जूनून सामान्य पेड़ो के लिए क्यों नही हो सकता।

अब तो वैज्ञानिक से लगायत पुरे विश्व के सरकारी और गैरसरकारी संगठन भी लगातार चेता रहे है कि यदि पर्यावरण पर ध्यान नही दिया गया तो आने वाला समय मानव जाति पर भारी पड़ेगा।जाहिर है पेड़ो से ही ग्रीन हाउस गैसों पर काबू पाया जा सकता है और उलट पुलट मौसम पर भी। कुछ इसी भागीरथ सोच के साथ प्रकृति से दोस्ती किया गोरखपुर के एक शख्स ने।

ये शख्सियत है पूर्वांचल बैंक में अफसर रवि द्विवेदी। जो महानगर के गोरखनाथ एरिया के दस नम्बर बोरिंग के रिहाइशी है और अपने आशियाने के अहाते में रुद्राक्ष समेत लगभग 600 दुर्लभ पौधों के बोनसाई का अनोखा संसार समेटे है। जिन्हें उनके शुभचिंतको द्वारा मिस्टर बोनसाई के नाम से भी पुकारा जाता है। इनकी इस खास और नायाब कोशिश को प्रशासन ने अब तक भले बहुत तवज्जों न दी हो लेकिन इनके पास देश-विदेश के तमाम लोग अपनी सुभमांएं भेज कर इनका हौसलाफजाई करते रहते हैं।

रवि द्विवेदी के प्रयास के मुरीदों की कमी नहीं है। प्रख्यात पर्यावरणविद माइक पांडेय भी उन्ही में से एक हैं। रवि द्विवेदी को भेजे गए एक सन्देश में माइक पांडेय ने कहा है,”Bonsai Ghar: Brilliant !!!!! Heartiest Congratulations !! Very very commendable and national award worthy Eco Warrior !!!!. तीन बार के ग्रीन ऑस्कर अवार्ड विजेता माइक पांडेय ने अपने सन्देश में लिखा है कि अपने बोनसाई वाटिका के भगीरथ प्रयास के कारण रवि नेशनल अवार्ड के हकदार हैं।

इसके अतिरिक्त ये एक और शख्सियत रखते है जो पूर्वांचल में शायद इकलौते है।उनकी इस विशेषता का नाम है मधुबनी चित्रकला। उनके बनाये चित्रकला के नमूने पूर्वांचल की मिटटी में कदम रखने वाले हर बड़ी शख्सियतों के पास है।पर्यावरण के प्रति अटूट प्रेम के पुजारी इस दम्पति का बैंकर होने के बाद भी अपने इन 600 बच्चों को नियमित सुबह शाम डेढ़ से दो घण्टे समय देना काबिले तारीफ है।

रवि द्विवेदी से बात करने पर यह बात शिद्दत से पता चलती है कि पेड़ पौधे आपकी रूटीन तय करते है। उनका कहना है कि अब ये ही उनकी दुनिया हैं और वो कभी इन्हें एक दिन से ज्यादा नही छोड़ पातें हैं। द्विवेदी ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि यूँ तो बौद्ध परिपथ क्षेत्र (लुम्बिनी से कुशीनगर) में रहते है और बौद्ध देशों के लाखों सैलानी यहां प्रतिवर्ष आते है जिससे हमारे देश के साथ ही क्षेत्र की आय भी बढ़ती है। किन्तु बौद्धिस्ट भ्रमनकर्ताओ के लिए इस पुरे परिपथ में एक भी बोनसाई गार्डन नही उपलब्ध है।जबकि बौद्ध देशो में लोग अपनी पुत्रियों की शादी में बतौर तोहफा एक बोनसाई पौधा जरूर देते है।

उन्होंने कहा पूर्व में इसको आवश्यक मानते हुए डीएम संजय कुमार ने अपने तई जिले के कुष्ठाश्रम की खाली पड़ी 16 एकड़ जमीन पर बोनसाई गार्डन बनाने की कोशिश की थी किन्तु उनके स्थानांतरित होते ही पूरी योजना ठण्डी हो गयी।रवि के बसाये अनूठे संसार में आज 34 वर्ष का बरगद, 29 वर्ष का पाकड़ और 22 साल का रुद्राक्ष वृक्ष सहित कई अन्य दुर्लभ प्रजाति के पौधे है जो विलुप्त प्राय है।

इनके दुर्लभ संसार में केवल गोरखपुर में पाया जाने वाला और विलुप्त हो चुका पनियाला, खिरनी, अमड़ा, रुद्राक्ष, चिनार, चीकू,22 वर्षीय इमली, कहवा(कोको), बरगद सफ़ेद और पीला, पीपल, गूलर, जामुन की काली और बंगाली जामुन की सफ़ेद वैरायटी, सहतुत 2 किस्म की और आयुर्वेदिक मौलश्री जैसी अन्य कई और औषधिक बोनसाई पौधे है जिनका नाम गिनाना अपर्याप्त है।

ये बताते है कि 1970 के दशक में एक बार जब अपने रिश्तेदार के घर जयपुर गए तो उनके लान में लगे बोनसाई वृक्ष को देखकर लगाने की अभिलाषा जताने पर रिश्तेदार द्वारा आपके बस की बात नही कहना इनके लिए प्रेरणा मन्त्र बन गया और तब से ही इन्होंने पर्यावरण की अपना दोस्त बना लिया। जिसके रख रखाव में लगभग दस हजार का खर्च ये स्वयं वहन करते है।

रवि कहते है कि सभी पौधे किसी न किसी नक्षत्र से जुड़ाव रखते है और मैंने अपने वाटिका को नक्षत्र वाटिका का रूप देने की कोशिश किया है। भारतीय ज्योतिष परम्परा के अनुसार 27 नक्षत्र है जिनसे जुड़ा हुआ एक पौधा जरूर है। दैनिक जीवन में रोगों से ग्रसित लोगो को इन पौधों से लाभ मिल सकता है। अलग अलग वृक्षो के माहात्म्य और सबके पूजन की विधियां भी भिन्न है।

पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रकृति की वर्तमान हालत पर चिंता जताते हुए रवि कहते हैं कि हम, आप, हमारे पूर्वज संत ऋषि या महर्षि ही थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ मुनि से लगायत देवरहवा बाबा तक सभी के आश्रम में एक साम्यता थी। सभी के यहाँ अपनी वाटिका थी जिनमें सभी वनस्पतियाँ पूर्णतया औषधीय थीं, सहेजने और संरक्षण का कार्य सभी एकनिष्ठ भाव से करते थे।

”आज देखिये ….आश्रम और वाटिका नहीं बड़े बड़े माल और अपार्टमेंटस बन रहें जिनके निर्माण के ही समय लाखों लीटर पानी बह जाता है, प्रकृति एवं पर्यावरण पर इससे बड़ा कुठाराघात और कहाँ दिखेगा…आप गार्डेन और वनस्पतियों के संरक्षण के प्रति जागरूक कर औषधीय वाटिका बनवायें ….स्वतः अस्पतालों में भीड़ कम हो जायेगी…
कोई नहीं आगे आयेगा तो पंडित महामना मालवीय जी का अनुसरण कर भिक्षाटन पर निकलूंगा ……. विलम्ब तो हो सकता है पर लक्ष्य की प्राप्ति तो होगी ही होगी ……..
” वृक्षामि देहि
भिक्षामि देहि ”

नक्षत्र और उनसे जुड़े पौधे:-
अश्विन-कुचिला, भरणी-आंवला,कृतिका-गूलर,रोहिणी-जामुन,मृगसिरा-खैर,आद्रा-काला तेंदू, पुनर्वसु-बांस,पुष्य-पीपल,अश्लेषा-नागकेशर,मगहां-बरगद,फाल्गुनी पलाश-ढाँक, फाल्गुनी प्लक्षय-पाकड़,हस्त-रीठा,चित्रा-बेल,स्वाती-अर्जुन,विशाखा-कटाई,अनुराधा-मौलश्री,ज्येष्ठा-चीड़,मुला-साल,पूर्वाषाढ़ा-जलवेतश,उत्तराषाढ़ा-कटहल,श्रवण-मदार,धनिष्ठा-क्षयोकर,सताभिषक-कदम्ब,भाद्रपदपू.-आम,भाद्रपद उ.-नीमऔर रेवती में महुआ का प्रयोग होता है।

इसके अतिरिक्त औषधीय पौधों में जावित्री, तेजपात, हल्दी, दालचीनी, पीपर, भृंगराज, हरीतकी, अश्वगन्धा, गिलोय, तुलसी, पुनर्नवा, मकोय, सर्पगन्धा, सुतवारि, सफ़ेद मुसली, गेंहू और दूर्वा है।

पर्यावरण दिवस यूँ तो वह अपने घर ही हर वर्ष मनाते है किन्तु इस साल किन्ही कारणों से ये आयोजित नही कर सके। जनता के नाम दिए सन्देश में उन्होंने हर आम ओ खास से अपील किया कि अगर परिवार का हर शख्स पौधा नही लगा सकता तो कम से कम एक परिवार में एक पौधा को रोपण कर उसे वृक्ष का रूप दिया जाये।जिससे हम भी सुरक्षित रहे और हमारा समाज भी।

खैर हम आप कुछ करें या ना करें लेकिन गोरखपुर का एक शख्स अपने सिमित संसाधनों के दम पर लगा हुआ है।

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