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राजेश तिवारी ने गोरखपुर हार की तुलना चिल्लूपार से की, बोले घर के भेदियों के नाते ढहा योगी का गढ़

राजेश तिवारी ने गोरखपुर हार की तुलना चिल्लूपार से की, बोले घर के भेदियों के नाते ढहा योगी का गढ़

गोरखपुर: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गोरखपुर लोक सभा उपचुनाव में हार से शहर अभी भी आश्चर्यचकित है। भाजपा के समर्थक तो इस हार को पचा ही नहीं पा रहे हैं। सोशल मीडिया भाजपा के पक्ष में तरह-तरह के मैसेज से भरा पड़ा है। ऐसे में भाजपा के नेताओं का भी दुखी होना लाजमी ही है। इसी क्रम में पूर्व मंत्री और चिल्लूपार के पूर्व विधायक राजेश तिवारी ने भी गोरखपुर और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के गढ़ में पार्टी की हार को लेकर अपना दर्द प्रकट किया है। यही नहीं श्री तिवारी ने तो यहाँ तक लिख दिया है कि चिल्लूपार की तरह गोरखपुर में भी पार्टी की हार अपनों के दगाबाजी के कारण ही हुई है। हालांकि यह घर के भेदी कौन हैं इस बात को उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है।

श्री तिवारी लिखते हैं कि जो भूल चिल्लूपार वालों ने 2017 के विधानसभा चुनाव में किया था, वही गोरखपुर वालों ने 2018 के लोकसभा में कर दिया। उन्होंने लिखा है कि चिल्लूपार और गोरखपुर की हार में बड़ी समानता दिख रही है।

अपने फेसबुक वाल पर पोस्ट कर श्री तिवारी ने लिखा है कि चिल्लूपार की जीत में भी योगी आदित्यनाथ का स्वाभिमान जुड़ा था और गोरखपुर की जीत में तो रहना ही था। चुनाव के वक़्त गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी उपेंद्र शुक्ला की बीमारी की तरफ इशारा करते हुए पूर्व मंत्री लिखते हैं कि चिल्लूपार क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी भी चुनाव के बारह दिन पहले घुटने में ब्लड क्लाटिंग से उत्पन्न भयंकर दर्द से तड़प-तड़प कर वोटरों के दरवाजे पर मत्था टेक रहा था और गोरखपुर का प्रत्याशी भी बारह दिन पहले सिर में ब्लड क्लाटिंग और फिर ब्रेन के आपरेशन के दर्द को पीते हुए तड़प-तड़प कर लोगों के दरवाजे पहुंच रहा था। वो आगे लिखते हैं कि चिल्लूपार वाले ने भी डाक्टर के विस्तर पर रहने की सलाह को नहीं मानी थी और गोरखपुर वाले ने भी।

लगातार तो बार चिल्लूपार से दिग्गज ब्राह्मण नेता पंडित हरिशंकर तिवारी को पटखनी देने वाले राजेश तिवारी लिखते हैं कि चिल्लूपार में तो भाजपा से टिकट मिलने के बाद अपने को निष्ठावान भाजपाई होने का दावा करने वाले कुछ नामचीन जिम्मेदार कार्यकर्ताओं ने ही यह तय कर लिया कि चिल्लूपार में भाजपा को इतिहास नहीं लिखने देना है, कमल नहीं खिलने देना है। गोरखपुर में भी कम मतदान यह दर्शा रहा है कि तमाम जिम्मेदार कार्यकर्ता वहाँ भी शिथिल हो गये।

मुक्तिपथ वाले बाबा के नाम से मशहूर राजेश तिवारी लिखते हैं कार्यकर्ताओं और नेताओं के जिस उत्साह की तलाश चिल्लूपार भाजपा कर रही थी वह यहाँ नदारद थी, तो उसी उत्साह की तलाश गोरखपुर को भी थी, जो वहां नदारद रही। जहाँ चिल्लूपार के अनेक कार्यकर्ताओं और मित्रों – शुभचिंतकों को लग रहा था कि बहुत मेहनत की जरूरत नहीं है, मोदी की वजह से लोग वोट दे ही देगें। तो वहीं गोरखपुर के बूथ लेवल तक के जिम्मेदारों को भी यह लगने लगा था कि योगी की वजह से लोग घरों से निकल कर वोट देगें ही।

पढ़िए राजेश तिवारी फेसबुक पोस्ट

”ये क्या कर डाला आपने गोरखपुर लोकसभा वालों….?

जिस मोदी – योगी की वजह से आपके लिये एम्स मिला, फर्टिलाइजर मिला, जिसने चीनी मिल दिया, डिस्टीलरी दिया, कई फोर लेन दिया, 24 घन्टे लगातार बिजली दिया, सैकड़ों सड़कें दिया, दर्जनों पुल दिया, पालीटेक्निक कालेज, आईटीआई कालेज, राजकीय डिग्री कालेज, इन्टर कालेज, प्रेक्षागृह, रामगढ़ ताल सुन्दरीकरण, चिड़ियाघर विस्तार दिया, साथ में ऐसी ही अनगिनत और भी बहुत सी सौगातें दिया…
उन सबसे बढ़कर आपकी ही लोकसभा का मुख्यमंत्री मिला …

और आपने….?

आपने तो यह सब देने वाले मोदी-योगी के सम्मान को ही रौंद कर अपमान में बदल दिया….?

जो हिन्दुत्व सतही सेक्युलरिज्म और तुष्टिकरण के पैरों तले रौंदा जा रहा था….उसी पददलित हो रहे हिन्दुत्व को धार देकर जो व्यक्ति हमारे आपके ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी कोने में भी रहने वाले हर हिन्दुस्तानी की छाती को चौड़ा कर रहा था…. उसी की छाती में आपने शूल भोंप दिया…?

ये आपने ठीक नहीं किया….!

जो भूल चिल्लूपार वालों ने 2017 के विधानसभा चुनाव में किया था… वही आप गोरखपुर वालों ने 2018 के लोकसभा में कर दिया…!

बड़ी समानता दीख रही हमें तो आप द्वारा दी गई चिल्लूपार और गोरखपुर की पराजय में….!

चिल्लूपार की जीत में भी योगी जी का स्वाभिमान जुड़ा था और गोरखपुर की जीत में तो रहना ही था…!
चिल्लूपार क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी भी चुनाव के बारह दिन पहले घुटने में ब्लड क्लाटिंग से उत्पन्न भयंकर दर्द से तड़प-तड़प कर आपके दरवाजे पर मत्था टेक रहा था… और गोरखपुर का प्रत्याशी भी बारह दिन पहले सिर में ब्लड क्लाटिंग और फिर ब्रेन के आपरेशन के दर्द को पीते हुए तड़प-तड़प कर आपके दरवाजे पहुंच रहा था… चिल्लूपार वाले ने भी डाक्टर के विस्तर पर रहने की सलाह को नहीं मानी थी और गोरखपुर वाले ने भी….!

चिल्लूपार में तो भाजपा से टिकट मिलने के बाद अपने को निष्ठावान भाजपाई होने का दावा करने वाले कुछ नामचीन जिम्मेदार कार्यकर्ताओं ने ही यह तय कर लिया कि चिल्लूपार में भाजपा को इतिहास नहीं लिखने देना है, कमल नहीं खिलने देना है…. गोरखपुर में भी कम मतदान यह दर्शा रहा है कि तमाम जिम्मेदार कार्यकर्ता वहाँ भी शिथिल हो गये….!
कार्यकर्ताओं और नेताओं के जिस उत्साह की तलाश चिल्लूपार भाजपा कर रही थी वह यहाँ नदारद थी…. तो उसी उत्साह की तलाश गोरखपुर को भी थी….जो वहां नदारद रही….!
जहाँ चिल्लूपार के अनेक कार्यकर्ताओं और मित्रों – शुभचिंतकों को लग रहा था कि बहुत मेहनत की जरूरत नहीं है, मोदी की वजह से लोग वोट दे ही देगें…..
तो वहीं गोरखपुर के बूथ लेवल तक के जिम्मेदारों को भी यह लगने लगा था कि योगी की वजह से लोग घरों से निकल कर वोट देगें ही….!
चिल्लूपार में कुछ लोगों को यह लगा कि मेहनत करना बेकार है क्योंकि कितना भी मेहनत कर लो बसपा और लोका की जातीय गणित हमें जीत नहीं दिला पायेगी… और गोरखपुर के भी कुछ लोगों को लगा कि जातिवाद की प्राथमिकता वाला गठबन्धन हमें रोक देगा…..!

मगर यह छलावा निकला….

न तो चिल्लूपार की हार गठबन्धन के कारण हुई और न ही गोरखपुर की….
क्योंकि चिल्लूपार में अगर गठबन्धन सफल होता तो वह संख्या एक लाख से ऊपर जाती…. और गोरखपुर में अगर गठबन्धन प्रयोग पूरी तरह सफल होता तो वह संख्या छ: लाख से ऊपर जाती….
ऐसे में यह कह सकता हूं कि यह दोनों पराजय गैरों की एकजुटता की वजह से नहीं अपनों की शिथिलता की वजह से हुई लगती है…!
चिल्लूपार में भाजपा की नाव जब एकदम किनारे पर आ रही थी तब डुबो दी गई….मात्र 3200 से…. यानी केवल 1600 वोट और सामने वाले से निकल आते तो विजय कदम चूमती….. गोरखपुर की नाव भी किनारे पर लगने वाली रही…. मात्र 22000 से हम पीछे रह गये…. यानी हर विधानसभा से मात्र 4400 वोट…… अगर 2200 वोट भी विधानसभावार गठबन्धन वाले में से हम खींच पाते तो आज हम गोरखपुरियों पर एहसान फरामोश और काहिल या दगाबाज होने की कालिख नहीं लग पाती….!

लेकिन कोई बात नहीं….!

बादलों का समूह कुछ समय ही सूर्य (आदित्य) को ढंके रह पाता है…कुछ देर बाद वह निकल ही आता है….अपनी पूरी केसरिया उर्जा के साथ…!

बस एक निवेदन अपने को भाजपाई निष्ठावान कार्यकर्ता का दम्भ भरने वाले बन्धुओं से….

जिस राष्ट्रवाद, विकास, हिन्दुत्व की दुहाई आप देते हैं…. न….उसी की शपथ….
निजी ईर्ष्या, द्वेष, लाभ या सबक सिखाने और छुआ देने की प्रवृति, गोल – गोलइती से बाहर आना होगा आपको….
वरना….
हवा में उड़ जाने वाले बादलों का समूह निगल जायेगा हमारे आपके केसरिया सूर्य को….!
और तब शिवाय पछताने के और कुछ नहीं हाथ आना…
जैसे चिल्लूपार के लोग एक साल बाद भी पछता रहे और आप एक ही दिन बाद…..! ”

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