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सीएम के गुरु को करारी शिकस्त देकर लोकसभा पहुंचने वाले इस नेता ने आज ली अंतिम सांस

नहीं रहे सीएम योगी के गुरु नरसिंह नारायण पांडेय!

गोरखपुर: गोरखपुर के पूर्व सांसद व सूबे के मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ के गुरु और गोरक्षपीठाधीश्वर रहे ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ को करारी शिकस्त देकर 1971 में पार्लियामेंट पहुंचे नरसिंह नारायण पांडेय नहीं रहे। कभी पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के खास रहे स्व पांडेय शुरू से ही राजनीति में नैतिकता के प्रबल समर्थक थे।उनकी मौत पर आज जिले के कांग्रेसियों ने शोक सम्वेदनाएँ अर्पित की हैं।

बता दें कि स्व नरसिंह नारायण पांडेय ने देश की पांचवी लोकसभा (1971-1977) चुनाव में गोरखपुर संसदीय सीट से पूर्व गोरक्षपीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ को करारी शिकस्त देकर गोरखपुर का प्रतिनिधित्व करने का सम्मान हासिल किया था।जो राजनीतिक क्षेत्र में भी मर्यादाओं की सीमा का ख्याल रखते थे।चूंकि वक्त के साथ सियासत में बहुत कुछ बदल गया है।

चुनाव के न सिर्फ तौर-तरीके बदलेए बल्कि नेताओं के हाव-भाव भी पूरी तरह बदल गए हैं। पहले चुनाव मूल्यों और सिद्धातों पर लड़ा जाता था और अब धन बल के दम पर लड़ा जा रहा है।किन्तु इसके विपरीत एक वक्त था जब विधायक एवं सांसद का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी पैदल घर-घर जाकर वोट मांगा करते थे। ऐसी ही शख्सियत विधायक व सांसद रह चुके नरसिंह नारायण पांडेय ने बिना पैसे के ही कई बार चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की। लेकिन पिछले कई चुनावों के बदलते तौर तरीकों पर वे हैरान थे।

प्रत्याशी के साथ गाड़ियों का लंबा काफिला, बेवजह शोर करते समर्थक और चुनाव में करोड़ों रुपये का खर्च उन्हें फिजूल लगता था।बीते विधानसभा चुनावों के दौरान एक अनौपचारिक मुलाकात में बिना पैसे के चुनाव लड़ चुके नरसिंह नारायण ने अपने वक्त का चुनाव याद करते हुए बताया कि 25 साल की उम्र में पहली बार खलीलाबाद से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा।

चुनावी प्रचार करने के लिए न तो पैसे थे और न ही साधन। ज्यादातर प्रत्याशी पैदल ही मतदाता के घर जाया करते थे। तब कहीं-कहीं बैनर व पोस्टर नजर आता था। जहां-जहां बाजार लगती उसकी सूची बनाते और फिर वहां पहुंच जाते। प्रतिदिन तकरीबन बीस किलोमीटर पैदल चलते, जिस गांव में रात हो जाती वहीं रात गुजार देता। बिस्तर लेकर साथ में एक लड़का चलता था। जिस गांव भी जाता लोग वहां स्वागत करते और भोजन भी कराते। खर्च के नाम पर कुछ होता नहीं था। अलबत्ता अक्सर लोग मदद के तौर पर पांच-दस रुपये दे देते थे। बाद में उस पैसों को गरीबों में बांट देता।

गांवों में भाषण होता तो स्थानीय मुद्दों को तरजीह दी जाती। रात के 12 बजे तक प्रचार करते। 1962 में जब फरेंदा से विधायक चुना गया तक साइकिल भी नहीं थी। अमीर प्रत्याशी के पास साइकिल होती जिससे वह प्रचार करता। प्रत्याशी के साथ लोगों का काफिला नहीं चलता था। झूठे वादे नहीं होते थे।

उन्होंने आगे बताया कि जब 1971 में गोरखपुर सदर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, तब एक जीप किराए पर ली। चूंकि क्षेत्र बड़ा था और पैदल प्रचार करना मुमकिन नहीं था। उस वक्त पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने का खर्च दिया गया। तब कोई प्रत्याशी दूसरे प्रत्याशी पर व्यक्तिगत हमले नहीं करता था। आरोप प्रत्यारोप का दौर नहीं चलता था। साफ-सुथरी छवि वाले लोग ही राजनीति में आते और उनका मकसद गरीबों की मदद करना था।

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