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गीता प्रेस गोरखपुर: धरती पर मानव रचित एक अदभुत सयोंग  

IMG-20160213-WA0018गोरखपुर: कुछ भी पढ़ने, सोचने या समझने से पहले जरा इन बेमिसाल आंकड़ों पर एक नज़र डालिये- श्रीमद् भगवतगीता की 1200 लाख प्रतियों का प्रकाशन, रामचरितमानस व् तुलसी साहित्य के 952 लाख, पुराण व उपनिषद आदि ग्रंथों के 232 लाख, महिलाओं और बालोपयोगी पुस्तकों के 1067 लाख प्रतियां सिर्फ एक जगह से प्रकाशित की जा चुकीं हैं और वो जगह कही और नहीं है बल्कि हमारे शहर गोरखपुर में है जिस का नाम है–गीता प्रेस।
जब भी कही किसी प्रकार के धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन होता है।तो बरबस ही एक नाम जेहन में कौंध जाता है। वो है गीता प्रेस गोरखपुर। जो देश ही नहीं पुरे विश्व में लगभग चौदह भाषाओं में सत्साहित्य उपलब्ध कराती है। जिसमे पुरे विश्व में सर्वाधिक बिकने वाले धार्मिक ग्रंथो में प्रथम पायदान पर रामायण और दूसरे पर श्रीमद् भगवतगीता अब तक काबिज है।
आइये देखते है पुरे विश्व को हिन्दू धर्म से जुड़े सत्साहित्य उपलब्ध कराने वाली इस संस्था का सफ़र।
स्थापना एवं उद्देश्य
मूलतः बंगाल के निवासी एवम धर्मपरायण ब्रह्मलीन जयदयाल जी गोयन्दका इसके संस्थापक थे। जयदयाल जी का जीवनव्रत था गीता प्रचार और उसकी मंगलकामना। उनका मानना था कि गीता से जो उन्हें मिला है वह पुरे विश्व के मानवमात्र को मिले। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने गीता प्रेस की स्थापना विक्रम संवत 1980(सन 1923 ईस्वी) में किया।
गोविन्द भवन कार्यालय , कोलकाता के नाम से सोसाइटी पंजीयन अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत गीता प्रेस  आरम्भ से ही एक धार्मिक संस्था के रूप में कार्यरत रही है। बाद में इस संस्था ने गोरखपुर में अपना अस्थाई ठिकाना बना लिया जो की धीरे धीरे धार्मिक साहित्य के प्रकाशन के लिए गोरखपुर का नाम विश्व पटल पर स्थापित कर दिया।इसका सञ्चालन संस्था के ट्रस्ट बोर्ड के नियंत्रण में होता है।
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गीता प्रेस का मुख्य कार्य सस्ते से सस्ते मूल्य पर सत्साहित्य का प्रचार प्रसार करना है। पुस्तकों के मूल्य प्रायः लागत से कम रखे जाते है। परंतु इसके लिए यह संस्था किसी प्रकार के चंदे या आर्थिक सहायता की याचना नहीं करती है।
शुरूआत में यहाँ छपाई के लिए एक प्रिंटिंग मशीन लगाया गया था। जो आजकल गीताप्रेस की धरोहर बनकर चित्रकला मंदिर में धर्मावलंबियो के दर्शनार्थ रखा गया है। बाद के समय में अत्याधुनिक टेक्नालॉजी वाली मशीनो के आने के बाद यहाँ भी अत्याधुनिक कम्प्यूटराइज्ड मशीनों से छपाई होने लगी।
इस संस्था की सबसे शुरूआती और प्रसिद्ध पत्रिका कल्याण भी कई संस्करणों में प्रकाशित हो चुकी है। इस प्रेस से विभिन्न धार्मिक विषयो पर आधारित लगभग 1800 पुस्तकों का प्रकाशन प्रतिदिन किया जा रहा है।
संस्था में बीते वर्ष कुछ श्रमिक विवाद के कारण लगभग 40 दिनों तक कार्य ठप्प होने के बाद आज भी 200 लोगो द्वारा सेवा किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में गीता प्रेस के प्रबंधक वित्त श्री बी बी त्रिपाठी ने बताया कि कुछ व्यवधान था जिसे प्रबंधन ने मिल बैठ कर सुलझा लिया। अब सम्पूर्ण कार्य निर्विघ्न चल रहा है। श्री त्रिपाठी ने बताया कि मार्च 2015 तक संस्था से 2 करोड़ 20 लाख 96 हज़ार पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। जिन्हें पुरे विश्व के हिन्दू धर्मावलंबियो के लिए यू के, यू एस ए समेत अन्य देशों में भेजा गया है।
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गीता प्रेस के अन्य आकर्षण
गीता प्रेस के मुख्य द्वार गीता द्वार के प्रत्येक पाद( पिलर) पर भारतीय संस्कृति, धर्म  एवं कला को सन्निहित किया गया है।इसके निर्माण में देश की प्राचीन कलाओं, विख्यात प्राचीन मंदिरो से प्रेरणा लेकर आंशिक रूप से दिग्दर्शन कराने का प्रयास किया गया है।
इस धार्मिक स्थल के विशेष व् दर्शनीय स्थल लीला चित्र मंदिर की संगमरमर की दीवारों पर भगवान् श्रीराम व श्री कृष्ण की लीलाओ के रमणीय 684 चित्रों के अतिरिक्त प्रख्यात चित्रकारों द्वारा हस्तनिर्मित चित्रो का संग्रह किया गया है। संगमरमर की दीवारो पर सम्पूर्ण श्रीमद् भगवतगीता  एवम संतो के 700 से अधिक दोहे खुदे है। इस भवन का उद्घाटन सन 1955 में 29 अप्रैल को तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद द्वारा किया गया था।
गीताप्रेस के लगभग 1744 वर्तमान प्रकाशनों में लगभग 826 प्रकाशन संस्कृत एवं हिन्दी के हैं। शेष प्रकाशन मुख्यतया गुजराती, मराठी, तेलुगु, बँगला, ओड़िया, तमिल, कन्न्ड़, अंग्रेजी आदि भारतीय भाषाओं में हैं। श्रीरामचरितमानस आदि का प्रकाशन नेपाली भाषा में भी है।
गीताप्रेस की पुस्तकों एवं कल्याण का प्रचार 19 निजी थोक, 4 फुटकर पुस्तक दुकानों, 41 स्टेशन-स्टालों तथा हजारों पुस्तक-विक्रेताओं के माध्यम से होता है।
‘कल्याण’, ‘युग-कल्याण’ एवं कल्याण-कल्पतरु’ – गीताप्रेस द्वारा तीन मासिक पत्र ‘कल्याण’ तथा ‘युग-कल्याण’ हिन्दी में एवं ‘कल्याण-कल्पतरु’ अंग्रेजी में प्रकाशित किये जाते हैं।
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