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जिम्मेदारों को नही पता कि मर रही हैं रामगढ ताल की मछलियां

गोरखपुर: रामगढ़ ताल के भरोसे पर्यटकों को रिझाने की योजनाएं तो खूब बन रहीं है लेकिन उसमें पल रही मछलियों की दशा से समूचा प्रशासनिक तंत्र बेपरवाह है। बीते एक पखवारे के दौरान ताल में लाखों मछलियां दम तोड़ चुकी हैं लेकिन संज्ञान लेना तो दूर जिम्मेदारों को इसकी जानकारी तक नहीं है। मौत की वजह को लेकर हुई पड़ताल में यह कड़वा सच सामने आया है।

उधर ताल की मछली का ठेका लेने वाली सहकारी समिति इसे लेकर खासा परेशान है। उसे मछलियों के मरने की वजह से वर्तमान परिदृश्य में 30 से 40 फीसद का नुकसान हो चुका है।

मछलियों के मरने की वजह जानने के बाबत ताल को साफ करने के लिए काम कर रहे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट झारखंडी से जब इसकी पड़ताल की शुरुआत हुई तो वहां प्लांट तो चलता मिला लेकिन कार्य कर रहे कर्मचारी इस बात से अनभिज्ञ थे कि ताल में मछलियां मर रही हैं। सिलसिला आगे बढ़ा तो टीम ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी घनश्याम प्रसाद से संपर्क साधा, उन्हें भी ताल में मछलियों के मरने की जानकारी नहीं थी, हालांकि उन्होंने मछलियों के मरने की वजह बता दी।

हद तो तब हो गई जब जिला मछली पालन अधिकारी वीके श्रीवास्तव ने मछलियों के दम तोड़ने की जानकारी को लेकर अनभिज्ञता जाहिर कर दी। उन्होंने बड़े ही हल्के अंदाज में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि तहसील दिवस के बाद मछलियों के मरने के कारणों की पड़ताल की जाएगी। उनका यह जवाब समूचे प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल उठाने वाला है।

मछलियों की मौत की वजह पर जब कुछ पर्यावरण विशेषज्ञों से बात की गई तो सबने एक स्वर से कहा कि इसकी वजह रामगढ़ ताल में घुलनशील आक्सीजन (डीओ) की कमी हो सकती है। मदन मोहन प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के पर्यावरण इंजीनिय¨रग के प्रो. गोविंद पांडेय ने बताया कि प्रदूषित जल पहुंचने की वजह से ताल में एल्गल बूम (शैवाल का सैलाब) की स्थिति है।

उन्होंने बताया कि दिन में तो यह शैवाल सूर्य की रोशनी से प्रकाश संश्लेषण के तहत कार्बन डाई आक्साइड ग्रहण करते हैं और आक्सीजन छोड़ते हैं लेकिन रात होने पर जब प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया थम जाती है तो शैवाल खुद की आक्सीजन की जरूरत भी जल से ही पूरा करने लगते हैं। ऐसे में रात में जल में घुलनशील आक्सीजन की कमी हो जाती है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव मछलियों पर पड़ता है और वह दम तोड़ने लगती है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रो. डीके सिंह ने कहा कि ताल में प्रदूषित जल की वजह से आर्गेनिक पदार्थो की मात्रा काफी है, इसके चलते ही शैवाल के सैलाब की स्थिति आई है। शैवाल सूक्ष्म जीवों के साथ मिलकर एचटूएस गैस बनाते हैं। यह गैस रासायनिक प्रतिक्रिया के तहत घुलनशील आक्सीजन की मात्रा को मानक से कम कर देती है। यह परिस्थिति ही मछलियों की मौत की वजह बनती है।

रामगढ़ ताल में मछली पालन का ठेका लेने वाली मत्स्य पालन सहकारी समिति से जुड़े लोग बड़ी संख्या में मछलियों के मरने से आहत हैं। समिति के सचिव आशीष साहनी ने बताया कि महज एक सप्ताह में 30 से 40 फीसद आमदनी प्रभावित हुई है। लाखों रुपये का नुकसान हो चुका है। ऐसे में ताल में बची मछलियों को निकालने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, जिससे उन्हें मरने से पहले ही निकाला जा सके।

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