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गोरखपुर लोक सभा: इन पांच वजहों के कारण भाजपा ने गंवाया अपना अभेद्य किला

गोरखपुर लोक सभा: इन पांच वजहों के कारण भाजपा ने गंवाया अपना अभेद्य किला

गोरखपुर: गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने इतिहास रच दिया है। यहां से सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने बीजेपी के उपेंद्र दत्त शुक्ल को 21 हजार 961 वोट से पराजित कर दिया। 5 बार से लगातार सांसद रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ में समाजवादी पार्टी गठबंधन से यह सेंध लगी है, जिसमे भाजपा चित्त हुई। हालांकि सपा-बसपा ने अपने दावं बहुत सलीके से खेले थे लेकिन फिर भी नतीजे आने से पहले भाजपा समर्थकों तो छोड़िये उसके विरोधियों तक को इस बात का इल्म नहीं रहा होगा की 30 साल से मंदिर के कब्जे वाली इस सीट को वो जीत लेंगे।

क्या कारण रहा कि अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त भाजपा को देश की सबसे सुरक्षित सीट पर ही हार का मुंह देखना पड़ा, वो भी ऐसे वक़्त में जब सूबे का मुखिया भी गोरखपुर से ही है। पार्टी अपने स्तर पर हार के कारणों की समीक्षा तो करेगी ही, हम भी इस बात की पड़ताल करने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्या बात हो गयी जिससे भाजपा को अपनी सबसे सुरक्षित सीट गंवानी पड़ी!

ये पांच कारण जिससे भाजपा को मिली अपने गढ़ में ही पटखनी:

सपा-बसपा महागठबंधन और जातीय समीकरण

समाजवादी पार्टी ने गोरखपुर जीतने के लिए बहुत करीने से हर बिसात को बिछाया। सबसे पहले पार्टी ने संजय निषाद को लिए राजी किया वो अपनी पार्टी का विलय कर समाजवादी पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़े। संजय निषाद ने भी बहुत समझदारी से खुद न लड़ कर अपने बेटे को आगे कर दिया। गोरखपुर क्षेत्र में निषाद वोटर की संख्या 4 लाख के करीब है। 1998 और 1999 में योगी आदित्यनाथ से हारने के बाद भी स्वर्गीय जमुना निषाद यह दिखा चुके थे कि मंदिर या भाजपा को किस समीकरण के माध्यम से गोरखपुर में हराया जा सकता है। हुआ भी यही। सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने बहुत ही चालाकी से अपनी माँ और भाई को चुनाव लड़ा कर निषाद वोटों को कहीं और बिखरने से रोका। कहीं ना कहीं निषादों की एकजुटता बीजेपी प्रत्याशी उपेंद्र दत्त शुक्ल के हार का कारण भी बनी। सपा ने गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पांच विधानसभा क्षेत्रों में से तीन में जीती है और 2 में हारी है। एक विधानसभा में सपा, BJP से मात्र सौ वोट के अंतर से पीछे रही। इसके अतिरिक्त गठबंधन के कारण मुस्लिमों और यादवों के मन में भी कोई संशय नहीं रहा और पूरा वोट एकमुश्त सपा प्रत्याशी के पक्ष में गया।

कार्यकताओ की अनदेखी

सूबे में भाजपा की सरकार बनने के कुछ दिनों बाद से जगह-जगह से कार्यकर्ताओं के निराश होने की खबरे आ रही थी। सामान्य कार्यकर्ताओं की बात तो छोड़िये, विधायकों तक की बात प्रशासन नहीं सुन रहा है। कुछ दिनों पहले ही पिपराइच के विधायक महेंद्र पाल सिंह का वीडियो वायरल हुआ था जिसमे वो यह कहते सुने गए थे की उनकी बात तो एक थानाध्यक्ष तक नहीं सुन रहा है। वहीँ संतकबीर नगर में एक कार्यकर्त्ता ने मीटिंग के दौरान जिले के प्रभारी मंत्री को सबके सामने खरी खोटी सुना दी थी। कार्यकर्त्ता मंत्री से तो दूर डीएम, एसपी तक से सीधे नहीं मिल पा रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सपा-बसपा की सरकार में उनके कार्यकर्ताओं की बात नकारने की हिम्मत किसी भी अधिकारी में नहीं होती है लेकिन भाजपा के शासन काल में ऐसा नहीं है। यहाँ तो आपसी कलह के नाते आलम यह है कि एक महिला अधिकारी को इस स्तर तक प्रश्रय दिया जा रहा है कि वो विधायक, एमएलसी तक की नहीं सुन रही हैं। प्रदेश में भाजपा कि सरकार होने के बावजूद कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनी जाती थी, जिसके कारण कार्यकर्ताओं में भी असंतोष का माहौल था। कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर प्रचार प्रसार करने से कतरा रहे थे। लोग हार की वजह यह भी मान रहे हैं।

बसपा के वोटों का ट्रांसफर

गठबंधन होने के बाद से ही इस बात पर संशय की स्थिति थी कि बसपा के वोट पूरी तरह से सपा के पक्ष में ट्रांसफर हो जायेंगे। चुकी गठबंधन की घोषणा आखिरी वक़्त में हुई थी इसलिए भाजपा कहीं न कहीं यह मान कर चल रही थी कि बसपा के परम्परागत वोट सपा को नहीं मिलेंगे। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। बसपा के वोटर साइलेंट माने जाते हैं जिससे भारतीय जनता पार्टी उन वोटरों को भाप न सकी और योगी के गढ़ में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। गोरखपुर में हाता परिवार ने बसपा के परंपरागत वोट तो सपा प्रत्याशी के पक्ष में डलवाये ही, ब्राह्मण वोटों में भी अच्छी खासी सेंध लगायी है। खुद चिल्लूपार के विधायक विनय शंकर तिवारी कई विधानसभा क्षेत्रों में बहुत सक्रिय रहे और घर-घर से बसपा के वोटरों को निकलवाया। यहाँ तक की भाजपा द्वारा एक ब्राह्मण प्रत्याशी को टिकट देने के बाद भी ऐसा सुनने में आ रहा है कि क्षेत्र के ब्राह्मण मतदाताओं ने सपा प्रत्याशी को भी वोट दिया है।

हिन्दू युवा वाहिनी की निष्क्रियता और भाजपा में भीतरघात

बीजेपी में भितरघात की बात की भी अनदेखी नहीं की सकती है। सभी को पता है कि उपेंद्र शुक्ल योगी की पसंद नहीं थे। फिर भी उनके नाम की घोषणा के बाद योगी तो मैदान में उतरे लेकिन उनके पसंद का प्रत्याशी ना होने से योगी के धुर समर्थक चुनाव से पूरी तरह जोड़ नहीं पाए और मतदान के दिन भी उदासीन ही रहे। पार्टी में एक धड़ा इस मत का भी था कि उपेंद्र शुक्ल जैसे मजबूत नेता के सांसद बन जाने के बाद उनको फिर 2019 में हटाना बहुत मुश्किल होगा। ऐसे में योगी के अधिपत्य वाली एक सीट पर मंदिर का कब्ज़ा नहीं रह जाता जो भविष्य को ध्यान में रखते हुए योगी की राजनीति के लिए ठीक नहीं होता। दूसरी ओर योगी द्वारा बनाये गए संगठन हिन्दू युवा वाहिनी की इस चुनाव में पूरी तरह से निष्क्रियता ने भी भाजपा को नुक्सान पंहुचाया। यहाँ एक बात ध्यान रखने की जरुरत है कि यह हिन्दू युवा वाहिनी ही था जो योगी के चुनाव लड़ने के समय उनके पक्ष में गली-गली और मोहल्लों-मोहल्लों में माहौल बनाता था। कई बार आखिरी वक़्त में मतों के धृवीकरण में भी यह संगठन बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। वैसे तो बीते विधान सभा चुनाव में ही योगी ने तत्कालीन हिन्दू युवा वाहिनी के अध्यक्ष सुनील सिंह को उनकी औकात बता दी थी। लेकिन संगठन पूरी तरह से निष्क्रिय योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुआ। योगी का अपना काम हो गया था और अब हाई कमांड पर दबाव बनाने के लिए उन्हें वाहिनी जैसे उग्र संगठन की जरुरत भी नहीं थी। ऐसा नहीं है कि योगी अगर इस चुनाव में प्रत्याशी होते तभी भी हिन्दू युवा वाहिनीं निष्क्रिय होता। लेकिन ऐसी स्थिति थी नहीं और वाहिनी के लिए वही हाल था कि ‘कोई नृप होय हमें का हानि’।

मतदान का कम प्रतिशत

मतदान का प्रतिशत कम होना भाजपा की हार का एक बड़ा कारण रहा। बता दें कि गठबंधन और सटीक जातीय समीकरण के बाद भी सपा प्रत्याशी ने भाजपा प्रत्याशी को मात्र 21000 वोटों से पराजित किया। यह बात अब किसी से छुपी नहीं है कि भाजपा के परंपरागत शहरी मतदाता उपचुनाव के प्रति उदासीन रहे। इस बात की ताकीद शहर विधान सभा में पड़े मतों का प्रतिशत भी कर रहा है। गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पाँचों विधान सभा में से सबसे कम वोट शहर विधान सभा में ही पड़ा। शहर में कुल 434 360 मतदाताओं में से मात्र 165268 वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। गौरतलब है कि इससे पहले हुए सभी चुनावों में भाजपा को शहर विधान सभा से अपराजेय बढ़त मिल जाती थी। आमतौर पर शहर विधान सभा से भाजपा प्रत्याशी को 50000 से एक लाख तक की बढ़त मिल जाती थी। यहाँ तक की 2017 में हुए विधान सभा चुनाव में गोरखपुर शहर से भाजपा उमीदवार राधामोहन दास अग्रवाल ने 60000 से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी। यदि शहर में एक से दो प्रतिशत की पोलिंग और हो गयी होती तो नतीजा कुछ और होता। वहीँ गोरखपुर में मतदान के दौरान बहुत से क्षेत्रों में ईवीएम मशीन खराब हो गई थी। जिसके कारण वोटर घर वापस लौट गए। कहीं ना कहीं अधिकारियों की लापरवाही भी एक वजह है। सरकार द्वारा चलाया गया मतदाता जागरूकता अभियान भी मतदाताओं को रिझा नहीं पाया।

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