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गोरखपुर उपचुनाव: चिन्मयानन्द, रवि किशन नहीं बल्कि कोई स्थानीय नेता ही होगा BJP का प्रत्याशी

गोरखपुर उपचुनाव:  कोई स्थानीय नेता ही होगा BJP का प्रत्याशी

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: सदर लोक सभा सीट से गोरखपुर उपचुनाव तिथि की घोषणा होते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवारों को लेकर अटकलों का बाजार पूरी तरह गर्म है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस सीट का रास्ता यहाँ पर स्थित प्रसिद्द गोरखनाथ मंदिर से होकर गुजरता है। पहली बार मंदिर का कोई महंत चुनाव मैदान में नहीं उतरेगा।

बीते एक महीने में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानन्द से लेकर बॉलीवुड और भोजपुरी फिल्मों के बड़े स्टार रवि किशन शुक्ल सहित कई बड़े नाम सामने आये। स्वामी चिन्मयानन्द ने यह ऐलान तक कर दिया कि सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने उन्हें गोरखपुर उपचुनाव लोक सभा सीट से लड़ने का न्योता दे दिया है। वहीँ दिनों गोरखपुर महोत्सव में आये रवि किशन ने भी यह सन्देश दिया कि वो भी चुनाव लड़ने को पूरी तरह तैयार हैं।

वैसे पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानी जाये तो योगी आदित्यनाथ द्वारा खाली की गयी इस प्रतिष्ठित सीट पर कोई बाहरी नहीं बल्कि कोई स्थानीय नेता ही भाजपा के टिकट पर चुनाव में उतरेगा। नाम ना छापने की शर्त पर पार्टी के एक बड़े नेता ने बताया कि भाजपा अन्य पार्टियों द्वारा प्रत्याशी उतार देने के बाद ही अपने पत्ते खोलेगी।
पार्टी इस बार बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। सूत्र के अनुसार भाजपा की सबसे ज्यादा नजर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी पर है।

आपको बता दें कि सपा की तरफ से जो एक नाम सामने आ रहा है वो है रामभुआल निषाद का। वैसे सपा निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ संजय निषाद के भी संपर्क में है। यह बात तो तय है कि सपा यदि रामभुआल को अपना प्रत्याशी बनाती है तो डॉ संजय निषाद भी अपने पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ेंगे और ऐसे में निषाद वोटों का बटना तय है। वैसे भी बीते विधान सभा चुनाव मसे डॉ संजय निषाद ही निषादों के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे हैं। आपको बता दें कि इस लोक सभा सीट पर निषाद वोटरों की संख्या 4 लाख से ज्यादा है।

सूत्र के अनुसार सपा और भाजपा दोनों ही पार्टियों ने डॉ संजय निषाद पर अपनी नजर गड़ा रखी है। सपा चाहती है कि डॉ निषाद अपनी पार्टी का विलय कर सपा के टिकट पर चुनाव लड़ें लेकिन इस बात के लिए संजय निषाद तैयार नहीं हो रहे हैं। वहीँ भाजपा ने अपनी तरफ से हर जुगत लगा रखी है कि डॉ संजय निषाद सपा के टिकट पर चुनाव ना लड़ें। भाजपा उनको समझाने की कोशिश में है कि अगर वो पार्टी की बात मान लेते हैं तो सांसद या विधायक तो भविष्य में कभी भी बन सकते हैं।

सूत्र के अनुसार यदि डॉ संजय निषाद अपनी पार्टी का विलय सपा में नहीं करते हैं तो ऐसे में अखिलेश यादव उनसे किनारा कर लेंगे और ऐसे में रामभुआल पार्टी के प्रत्याशी होंगे। ऐसी स्थिति में भाजपा का काम आसान हो जायेगा क्यूंकि तब संजय निषाद भी मैदान में कूद जाएंगे और निषाद वोटों के बटवारे के कारण भाजपा की राह आसान हो जाएगी।

यह भी संभावना बन सकती है कि डॉ संजय निषाद अपनी पार्टी का विलय कर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ जाएँ। भाजपा उस परिस्थिति के लिए भी तैयार बैठी है। सूत्र के अनुसार यदि सपा रामभुआल को मना कर डॉ संजय निषाद को मैदान में उतार देती है तब भाजपा चुनावी मैदान में किसी निषाद नेता को ही उतारेगी। वैसे निषाद मतदाता परंपरागत रूप से भाजपा के वोटर रहे हैं। लेकिन पहली बार समाजवादी पार्टी के नेता जमुना निषाद ने 1998 भाजपा के निषाद वोट में सेंध लगायी थी। उसके बाद 1999 के गोरखपुर उपचुनाव में तो योगी आदित्यनाथ जमुना निषाद से हारते हारते बचे। 1999 के चुनाव में योगी ने मात्र 7000 वोटों से जीत दर्ज की थी वो भी चुनाव के अंतिम समय में हिंदुत्व कार्ड खेलकर।

ऐसे में भाजपा को भी पता है कि इस बार मंदिर के किसी महंत का चुनाव मैदान में ना होना पार्टी के लिए कितनी बड़ी समस्या है। यही कारण है कि केंद्र और राज्य दोनों जगह राज करने वाली भारतीय जनता पार्टी अपनी चाल चलने से पहले दूसरों के पत्ते देख लेना चाहती है।

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